गाजियाबाद के हरीश राणा को एम्स नई दिल्ली में भर्ती करा दिया गया है और यहां सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार इच्छामृत्यु की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है. हरीश राणा के भोजन के बाद पानी भी बंद कर दिया गया है और डॉक्टर उनकी नब्ज पर नजर रख रहे हैं. हालांकि एम्स जाने से पहले हरीश राणा को उनके घर से अंतिम विदाई दी गई थी, जिसमें माता-पिता परिजनों के अलावा दो महिलाएं उन्हें विदाई दे रही थीं और कुछ ऐसे शब्द बोल रही थीं, जो आज भी लोगों के कानों में गूंज रहे हैं. इस घटना का वीडियो भी सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रहा है. ऐसे में हर कोई यह जानना चाहता है कि वीडियो में दिखाई दे रही ये महिलाएं कौन हैं और वे क्या बोल रही हैं? तो आइए जानते हैं..
हरीश राणा के घर से अंतिम विदाई देने वाली ये महिला ब्रम्हाकुमारी सिस्टर लवली दीदी हैं, जो उन्हें अंतिम विदा करने के लिए उनके गाजियाबाद स्थित घर पहुंचीं. News18 India ने ब्रह्माकुमारी संस्था की सिस्टर लवली से बात की है जिसमें उन्होंने हरीश राणा की जिंदगी, उनके परिवार के संघर्ष और इच्छामृत्यु के फैसले से जुड़े भावुक पहलुओं के बारे में बताया है.
13 साल की तपस्या और एक कठिन फैसला
सिस्टर लवली ने बताया कि हरीश राणा को अंतिम विदाई देने का ये फैसला इतना आसान नहीं था. पिता अशोक राणा की हिम्मत जवाब दे गई थी लेकिन मां निर्मला देवी ने सभी डॉक्यूमेंट पर हत्याक्षर का फैसला किया और बेटे के लिए इस पीड़ा से मुक्ति मांगी.
सिस्टर लवली ने बताया कि हरीश राणा को परोक्ष इच्छामृत्यु देने के लिए उनकी मां निर्मला देवी ने जरूरी दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए. उन्होंने कहा कि हरीश एक बेहद महत्वाकांक्षी और सक्रिय युवक थे, लेकिन एक हादसे के बाद उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल गई.
आध्यात्मिक है परिवार, संस्था से जुड़ा है..
हरीश का परिवार पिछले 18 सालों से ब्रह्मकुमारी संस्था से जुड़ा रहा है. पहले वे दिल्ली में रहते थे, लेकिन इलाज की कठिनाइयों के कारण 5 साल पहले गाजियाबाद के राजनगर एक्सटेंशन में शिफ्ट हो गए. इसके बावजूद उनका आध्यात्मिक जुड़ाव लगातार बना रहा.
हरीश जब दुनिया से जाएं तो…
सिस्टर लवली ने आगे कहा, ‘हम यही चाहते हैं कि हरीश जब इस दुनिया से जाएं तो उनके मन में कोई दुख या अपराधबोध न रहे आत्मा शरीर में कैद होते हुए भी सब कुछ महसूस करती है, इसलिए उन्हें माफी और शांति का संदेश दिया गया है.
उन्होंने तिलक के महत्व को समझाते हुए कहा कि यह विजय और शांति का प्रतीक है. चंदन का तिलक ठंडक देता है और सकारात्मक ऊर्जा फैलाता है, जिससे आत्मा को आगे की यात्रा के लिए शक्ति मिलती है.
चमत्कार की उम्मीद जागी लेकिन…
सिस्टर लवली ने बताया कि कभी-कभी मन में चमत्कार की उम्मीद जागती है, लेकिन डॉक्टरों की राय और हकीकत को देखकर परिवार ने इस सच्चाई को स्वीकार किया.
उन्होंने इसे जीवन के एक बदलाव के रूप में समझाने की कोशिश करते हुए कहा, जैसे हम कपड़े बदलते हैं, वैसे ही आत्मा भी शरीर बदलती है. इसे उसी नजर से देखना चाहिए.
परिवार ने किया संघर्ष
परिवार की संघर्षभरी कहानी भी सामने आई. हादसे के बाद 11 साल तक इलाज और देखभाल जारी रही, लेकिन जब कोई सुधार नहीं हुआ तो मां ने अपने बेटे की मुक्ति के लिए कठिन निर्णय लिया. पिता अशोक राणा एक समय पीछे हटे, लेकिन बाद में पूरे परिवार ने इस फैसले का साथ दिया.
हरीश के इलाज के दौरान परिवार को काफी आर्थिक और मानसिक परेशानियों का सामना करना पड़ा. दिल्ली का तीन मंजिला मकान तक बेचना पड़ा, ताकि बेहतर इलाज हो सके. लंबे समय तक फीडिंग ट्यूब और अन्य मेडिकल प्रक्रियाओं के सहारे उनकी देखभाल की गई.
सिस्टर लवली ने अंत में अपील की कि लोग हरीश की आत्मा की शांति के लिए सकारात्मक ऊर्जा और प्रार्थना करें. उन्होंने कहा, अगर आत्मा खुद को कैद या बोझ महसूस कर रही है, तो हमारी सकारात्मक सोच और प्रार्थनाएं उसे शक्ति देंगी और उसकी नई यात्रा को आसान बनाएंगी.

