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Gurugram Traffic Jam: आज दिल्ली में 85.5 मिमी बारिश हुई लेकिन कम यानी 71.5 मिमी बारिश में ही गुरुग्राम डूब गया. आखिर ऐसा क्यों हुआ? मिलेनियम सिटी के इस तरह टापू बनने के पीछे कंक्रीट के बेतरतीब जंगल, प्राकृतिक जलमार्गों पर अवैध कब्जों और मॉनसून पूर्व नालों की आधी-अधूरी सफाई की इनसाइड स्टोरी सामने आई है. मौसम विभाग ने आगे भी भारी बारिश का अलर्ट जारी किया है, जिससे खतरा और बढ़ गया है.
गुरुग्राम में आज भयंकर जलभराव की स्थिति पैदा हो गई. (PTI)
मानसून 2026 की पहली भारी बारिश ने दिल्ली-एनसीआर को भीषण गर्मी और उमस से तो राहत दे दी लेकिन इसके साथ ही मिलेनियम सिटी गुरुग्राम के दावों की पोल भी खोल कर रख दी. मौसम विभाग के आंकड़ों के मुताबिक इस पहले दौर में जहां दिल्ली में 85.5 मिमी की भारी बारिश दर्ज की गई, वहीं गुरुग्राम में उससे कम यानी 71.5 मिमी बारिश रिकॉर्ड हुई. हैरान करने वाली बात यह है कि दिल्ली के मुकाबले कम बारिश होने के बावजूद गुरुग्राम के कई वीआईपी इलाके, रिहायशी सोसायटियां और मुख्य सड़कें समंदर में तब्दील हो गईं. दिल्ली-जयपुर हाईवे पर 10 किलोमीटर लंबा जाम लगने तक की खबरें सामने आई. यह स्थिति यह सोचने पर मजबूर करती है कि जब आसमान से कम पानी बरसा तो साइबर सिटी में तबाही ज्यादा क्यों नजर आई? पुलिस ने कॉर्पोरेट कंपनियों से कहा है कि ऐसी स्थिति में अपने कर्मचारियों को पूरी तरह वर्क फ्रॉम होम दे दें.
कंक्रीट का जंगल और प्राकृतिक जलमार्गों का खात्मा
गुरुग्राम के इस कदर डूबने के पीछे सबसे बड़ा कारण अनियोजित शहरीकरण है. पिछले तीन दशकों में गुरुग्राम तेजी से कंक्रीट के जंगल में तब्दील हुआ है.
• नेचुरल ड्रेनेज पर कब्जा: अरावली की पहाड़ियों से आने वाले पानी के लिए जो प्राकृतिक रास्ते और तालाब यानी वॉटर बॉडीज थे, उन पर ऊंची-ऊंची इमारतें और सड़कें बना दी गईं.
• सोखने की क्षमता खत्म: मिट्टी की जगह कंक्रीट बिछ जाने के कारण जमीन पानी सोख नहीं पाती है, जिससे 71.5 मिमी की बारिश का पूरा पानी सड़कों पर जमा हो गया.
दिल्ली के मुकाबले कमजोर ड्रेनेज मास्टर प्लान
दिल्ली और गुरुग्राम की भौगोलिक और ढांचागत स्थिति में जमीन-आसमान का अंतर है. दिल्ली में जहां पुराना और व्यापक ड्रेनेज नेटवर्क जैसे नजफगढ़ नाला मौजूद है, वहीं गुरुग्राम का मास्टर ड्रेनेज सिस्टम आज भी आधा-अधूरा है. एक्सप्रेसवे और गोल्फ कोर्स रोड जैसे नए विकसित इलाकों में स्टॉर्म वॉटर ड्रेन (बरसाती नाले) और सीवरेज लाइनें आपस में मिल चुकी हैं. नतीजा यह होता है कि जब भी तेज बारिश होती है तो सीवर बैकअप मारते हैं और सड़कों पर घुटनों तक गंदा पानी जमा हो जाता है.
मानसून से पहले आधी-अधूरी सफाई
हर साल दावों के विपरीत, मानसून की पहली बारिश से पहले नालों की गाद निकालने (डीसिल्टिंग) का काम केवल कागजों तक सीमित रहता है. 71.5 मिमी बारिश के दौरान कचरे और प्लास्टिक की वजह से शहर के प्रमुख ड्रेनेज आउटलेट चोक हो गए. पानी की निकासी सुचारू न होने के कारण इफको चौक, राजीव चौक और सोहना रोड जैसे व्यस्ततम इलाकों में कई फीट पानी भर गया, जिसने भारी ट्रैफिक जाम का रूप ले लिया.
आगे क्या?
मौसम विभाग के अनुसार आने वाले दिनों में भी दिल्ली-एनसीआर में बारिश की गतिविधियां जारी रहने की संभावना है. अगर प्रशासन ने तुरंत पंपिंग सिस्टम और चोक पड़े नालों को दुरुस्त नहीं किया तो अगली बारिश मिलेनियम सिटी की रफ्तार को पूरी तरह ठप कर देगी.
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डिजिटल पत्रकारिता में खबरों की गहरी समझ रखने वाले संदीप गुप्ता वर्तमान में News18 इंडिया में बतौर चीफ सब-एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. 16 वर्षों से सुदीर्घ पत्रकारीय सफर में इन्होंने अपनी कलम से जटिल विषयों को …और पढ़ें

