Last Updated:
India Monsoon Crisis: विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने अल नीनो को लेकर बड़ा अलर्ट जारी किया है. विशेषज्ञों के मुताबिक इस बार कमजोर मानसून, भीषण गर्मी और सूखे का खतरा बढ़ सकता है. इसका असर खेती, जल संकट और महंगाई पर भी पड़ने की आशंका है. केंद्र सरकार ने राज्यों को अलर्ट मोड पर रखते हुए किसानों के लिए विशेष तैयारी शुरू कर दी है. कम पानी वाली फसलों और जल संरक्षण पर खास जोर दिया जा रहा है. (सभी फोटो AP)
El Nino Effect: देश में इस बार भीषण गर्मी ने हालत खराब कर दी है. ऊपर से मानसून भी लेट है. भारत में मानसून सिर्फ मौसम नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की जिंदगी की धड़कन माना जाता है. खेतों में हरियाली हो, बांधों में पानी हो या शहरों में बिजली उत्पादन, सब कुछ मानसून की चाल पर टिका रहता है. लेकिन इस बार आसमान से आने वाली खबरें डर बढ़ा रही हैं. विश्व मौसम विज्ञान संगठन यानी WMO ने चेतावनी दी है कि प्रशांत महासागर में तेजी से बन रहा अल नीनो आने वाले महीनों में दुनिया भर के मौसम को उलट-पुलट सकता है. भारत के लिए इसका सबसे बड़ा खतरा कमजोर मानसून और लंबी गर्मी है. यही वजह है कि किसानों से लेकर सरकार तक हर कोई सतर्क हो गया है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अल नीनो मजबूत हुआ तो जून से सितंबर तक बारिश सामान्य से कम रह सकती है. इसका असर सीधे खेती, जल संकट और खाद्य कीमतों पर पड़ सकता है.
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार WMO की ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि जून से अगस्त के बीच अल नीनो बनने की संभावना 80 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है. यही वह दौर होता है जब भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून सक्रिय रहता है. पिछले साल भी अल नीनो ने वैश्विक तापमान को रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई थी. अब डर इस बात का है कि कहीं 2026 में भी सूखे, हीटवेव और अनियमित बारिश का खतरनाक कॉम्बिनेशन देखने को न मिल जाए. भारतीय मौसम विभाग पहले ही सामान्य से कम बारिश की संभावना जता चुका है. ऐसे में खरीफ फसलों की बुआई, जलाशयों का स्तर और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ना तय माना जा रहा है. हालांकि सरकार ने भी समय रहते तैयारी शुरू कर दी है और राज्यों को अलर्ट मोड पर रखा गया है.
सबसे ज्यादा चिंता किसानों को लेकर है. धान, मक्का, दालें और गन्ने जैसी फसलें समय पर बारिश पर निर्भर करती हैं. अगर मानसून कमजोर रहा तो बुआई में देरी होगी और उत्पादन घट सकता है. यही कारण है कि कृषि मंत्रालय ने राज्यों के साथ बैठक कर जिला स्तर तक कंटीजेंसी प्लान लागू करने के निर्देश दिए हैं. केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने साफ कहा है कि किसानों को घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन सभी राज्यों को पूरी तैयारी रखनी होगी ताकि खरीफ सीजन प्रभावित न हो.
Add News18 as
Preferred Source on Google
सरकार अब कम पानी में होने वाली फसलों पर जोर बढ़ा रही है. मोटे अनाज यानी मिलेट्स, सूखा सहने वाली बीज किस्में और आधुनिक सिंचाई तकनीक को बढ़ावा दिया जा रहा है. मौसम आधारित कृषि सलाह सेवाओं को भी मजबूत किया जा रहा है ताकि किसानों को समय रहते बारिश और तापमान की जानकारी मिल सके. विशेषज्ञों का मानना है कि बदलते मौसम के दौर में पारंपरिक खेती मॉडल से बाहर निकलना जरूरी हो गया है.
जल संकट को लेकर भी चिंता बढ़ी है. अगर मानसून कमजोर रहा तो कई राज्यों में जलाशयों का स्तर तेजी से गिर सकता है. हालांकि फिलहाल सरकार का दावा है कि देश के बड़े जलाशयों में सामान्य से 127 प्रतिशत तक पानी मौजूद है. लेकिन मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर बारिश लंबे समय तक कम रही तो यह स्थिति तेजी से बदल सकती है. खासकर मध्य भारत और दक्षिण भारत में इसका असर ज्यादा दिखाई दे सकता है.
अल नीनो प्रशांत महासागर के पानी के असामान्य रूप से गर्म होने की स्थिति है. इसका असर दुनिया भर के मौसम सिस्टम पर पड़ता है. भारत में इसका सीधा संबंध कमजोर मानसून से माना जाता है. जब अल नीनो मजबूत होता है तो मानसूनी हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं. इससे बारिश कम होती है और गर्मी बढ़ जाती है. यही कारण है कि मौसम विभाग और वैज्ञानिक इस बार की स्थिति को बेहद गंभीर मान रहे हैं.
केंद्र सरकार ने राज्यों को जिला स्तर तक आपदा और खेती प्रबंधन योजना तैयार करने को कहा है. इसमें कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा, जल संरक्षण, सिंचाई प्रबंधन और समय पर बीज उपलब्ध कराने पर फोकस किया जा रहा है. मौसम आधारित एडवाइजरी सिस्टम को गांवों तक पहुंचाने की भी तैयारी है. सरकार चाहती है कि किसान मौसम के अनुसार फसल और बुआई का फैसला लें ताकि नुकसान कम हो.
IMD के मुताबिक दक्षिण-पश्चिम मानसून केरल में करीब 4 जून के आसपास दस्तक दे सकता है. सामान्य तौर पर मानसून 1 जून तक या उससे पहले केरल पहुंच जाता है. मौसम विभाग ने इस बार सामान्य से कम बारिश का अनुमान जताया है. साथ ही 60 प्रतिशत संभावना ‘डिफिशिएंट मानसून’ की बताई गई है. अगर ऐसा हुआ तो देश के कई हिस्सों में सूखे जैसी स्थिति पैदा हो सकती है.

