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Maha Ashtami Lathi Khela Bagbazar Sarbojanin History: नवरात्रि की महाअष्टमी के दिन जहां एक तरफ पूरे देश में पंडालों में मां दुर्गा की आरती, शंखध्वनि और मंत्रोच्चार गूंजते हैं, वहीं देश के एक कोने में नजारा बिल्कुल युद्ध मैदान जैसा हो जाता है. यहां ढोल-नगाड़ों की थाप के बीच दनादन लाठियां चलती हैं और हवा में नंगी तलवारें लहराती हैं. यह कोई मामूली प्रदर्शन नहीं, बल्कि एक 108 साल पुराना ‘लाठी-जंग’ का अखाड़ा है, जिसका सीधा कनेक्शन देश के महान स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस से है. आइए जानते हैं दुर्गा अष्टमी के दिन होने वाले इस हैरान कर देने वाले शौर्य प्रदर्शन के पीछे का वो जांबाज इतिहास, जिसे जानकर आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे.
दुर्गा अष्टमी पर यहां लाठी-तलवार चलाने की परंपरा क्यों? 108 साल पुराना इतिहास और नेताजी का खास कनेक्शन जानिए.
Bagbazar Durga Puja Veerashtami Kolkata: मां दुर्गा की महाअष्टमी के पावन मौके पर जहां पूरा भारत मां दुर्गा की भक्ति में डूबा है और पंडालों में घंटियों की गूंज सुनाई देती है. वहीं हमारे देश में एक ऐसी जगह भी है जो इस पावन दिन अचानक रणभूमि में तब्दील हो जाती है. यहां मंत्रों की जगह तलवारों की खनक हवा में तैरती है और शंखनाद के बीच लाठियों की दनादन गड़गड़ाहट रोंगटे खड़े कर देती हैं. शौर्य का यह अद्भुत संगम कोई साधारण खेल नहीं, बल्कि स्वाभिमान का वो अखाड़ा है जिसने इतिहास का रुख मोड़ दिया था. यह कोई एक दिन की कहानी नहीं है. यह पूरे 108 सालों की विरासत है. जिसकी जड़ें सीधे तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा का नारा बुलंद करने वाले महानायक नेताजी सुभाष चंद्र बोस से जुड़ी हैं. आइए, अतीत के पन्नों को पलटते हैं और जानते हैं मां के दरबार में छिड़े इस ऐतिहासिक शस्त्र-संग्राम की हैरान करने वाली कहानी.
महाष्टमी के दिन लाठी खेल की परंपरा निभाई
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, दुर्गा पूजा में आपने मां दुर्गा के दर्शन, धुनुची नृत्य और सिंदूर खेला के बारे में खूब सुना होगा. लेकिन क्या आप जानते हैं कि पश्चिम बंगाल में एक ऐसा पूजा पंडाल भी है, जहां महाष्टमी के दिन लाठी खेल की परंपरा निभाई जाती है? यह जगह कोलकाता का बागबाजार है. यहां की सार्वजनिक दुर्गा पूजा 108 साल पुरानी है. इसका इतिहास स्वतंत्रता आंदोलन और नेताजी सुभाष चंद्र बोस से भी जुड़ा है.
कहां निभाई जाती है लाठी खेल की परंपरा?
कोलकाता के उत्तरी हिस्से में स्थित बागबाजार सार्वजनिक दुर्गा पूजा में महाष्टमी की सुबह वीराष्टमी मनाई जाती है. इस मौके पर लाठी खेल और शारीरिक अभ्यास से जुड़ी परंपराओं को महत्व दिया जाता है. यह आयोजन पूजा की ऐतिहासिक पहचान का हिस्सा है. बागबाजार की पूजा केवल धार्मिक आयोजन के लिए ही नहीं, बल्कि बंगाल की सांस्कृतिक विरासत और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े इतिहास के लिए भी जानी जाती है.
क्रांतिकारियों के अभ्यास से जुड़ा है इतिहास
बागबाजार में लाठी खेल की परंपरा का संबंध स्वतंत्रता आंदोलन के दौर से बताया जाता है. उस समय क्रांतिकारी शारीरिक अभ्यास के लिए लाठी और तलवार चलाने का प्रशिक्षण लेते थे. इसी परंपरा को पूजा से जोड़ा गया. वीराष्टमी के आयोजन में इस इतिहास की झलक मिलती है. इस तरह महाष्टमी पर होने वाला यह आयोजन धार्मिक आस्था के साथ-साथ शारीरिक प्रशिक्षण और देश के स्वतंत्रता संघर्ष की याद भी दिलाता है.
108 साल पुरानी है बागबाजार की पूजा
बागबाजार सार्वजनिक दुर्गा पूजा की शुरुआत 1919 में हुई थी. शुरुआती दौर में इसे नेबूबागान बारोयारी दुर्गा पूजा कहा जाता था. बाद में पूजा का स्थान बदला और इसका स्वरूप भी विकसित हुआ. 1926 में इसके संगठन को व्यवस्थित रूप मिला. साल 1930 में पूजा का नाम बागबाजार सार्वजनिक दुर्गोत्सव और प्रदर्शनी रखा गया. साल 2026 में यह पूजा अपने 108वें वर्ष में है.
नेताजी सुभाष चंद्र बोस का क्या है कनेक्शन?
बागबाजार की दुर्गा पूजा का संबंध नेताजी सुभाष चंद्र बोस से भी रहा है. पूजा समिति के आधिकारिक इतिहास के मुताबिक, नेताजी ने 1930 में पूजा के लिए जगह की अनुमति देने में भूमिका निभाई थी. उस समय वह कोलकाता के मेयर थे. उन्होंने आयोजन के लिए 500 रुपये का योगदान भी दिया था. वर्ष 1938-39 में नेताजी इस पूजा समिति के अध्यक्ष भी रहे. यही वजह है कि बागबाजार की पूजा का इतिहास धार्मिक परंपरा के साथ स्वतंत्रता आंदोलन की यादों से भी जुड़ा हुआ है.

