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CJI Suryakant News Today: सुप्रीम कोर्ट ने 105 साल के बुजुर्ग हत्या के दोषी रसिक चंद्र मोंडल की बाकी सजा माफ कर उन्हें स्थायी रूप से रिहा करने का ऐतिहासिक फैसला सुनाया. 1988 के मालदा हत्याकांड में 1994 से आजीवन कारावास काट रहे मोंडल ने 99 वर्ष की उम्र में मानवीय आधार पर याचिका लगाई थी. सीजेआई सूर्यकांत की पीठ ने गिरते स्वास्थ्य और अत्यधिक वृद्धावस्था को देखते हुए उनकी अंतरिम जमानत को अंतिम आदेश में बदल दिया.
सीजेआई की बेंच ने उम्रकैद की सजा को खत्म कर दिया.
नई दिल्ली. भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में करुणा और मानवीय संवेदना का एक दुर्लभ उदाहरण पेश करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 105 साल के बुजुर्ग हत्या के दोषी को हमेशा के लिए रिहा करने का आदेश दिया है. अदालत ने अत्यधिक वृद्धावस्था और गिरते स्वास्थ्य को आधार बनाते हुए उनकी आजीवन कारावास की शेष सजा को पूरी तरह से माफ कर दिया है. चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की तीन जजों की पीठ ने अंतरिम जमानत को अंतिम आदेश में बदल दिया और उनके खिलाफ चल रही सभी कानूनी कार्यवाहियों को औपचारिक रूप से बंद कर दिया.
चार दशकों तक चला लंबा कानूनी संघर्ष
यह मामला पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में साल 1988 में हुई एक हत्या से जुड़ा है. दोषी रसिक चंद्र मोंडल का जन्म वर्ष 1920 में हुआ था. उन्हें ट्रायल कोर्ट ने दिसंबर 1994 में दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी. जब उन्हें सजा सुनाई गई थी, तब भी उनकी उम्र 68 वर्ष हो चुकी थी. इसके बाद मोंडल ने अपनी सजा के खिलाफ कानूनी लड़ाई जारी रखी और करीब तीन दशक जेल की सलाखों के पीछे बिताए. साल 2018 में कलकत्ता हाईकोर्ट ने उनकी अपील खारिज कर दी और बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी उनकी याचिका को निरस्त कर उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा था.
99 वर्ष की उम्र में मांगी थी रिहाई, 105 में मिली आजादी
अदालती झटकों के बावजूद मोंडल ने उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा. वर्ष 2020 में जब उनकी उम्र 99 वर्ष हो चुकी थी, तब उन्होंने गंभीर शारीरिक बीमारियों और वृद्धावस्था का हवाला देते हुए मानवीय आधार पर समय से पहले रिहाई के लिए सीधे शीर्ष अदालत में रिट याचिका दायर की. सुप्रीम कोर्ट ने उनके गिरते स्वास्थ्य को देखते हुए नवंबर 2024 में उन्हें अंतरिम जमानत और पैरोल प्रदान की थी. अब, उसी अंतरिम राहत को स्थायी रिहाई में बदलते हुए सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने टिप्पणी की कि 105 वर्ष के बुजुर्ग को वापस जेल में भेजना न तो व्यावहारिक होगा और न ही इसका कोई व्यावहारिक या नैतिक उद्देश्य सिद्ध होगा.
फैसले की मुख्य बातें
• अंतरिम जमानत को बनाया स्थायी: शीर्ष अदालत ने अपने नवंबर 2024 के जमानत आदेश को पूर्ण (Absolute) बनाते हुए रसिक चंद्र मोंडल को पूरी तरह से कानूनी स्वतंत्रता प्रदान की.
• शेष सजा हुई माफ: तीन जजों की पीठ ने इस मामले को औपचारिक रूप से बंद करते हुए उनकी आजीवन कारावास की शेष बची हुई पूरी सजा को निरस्त कर दिया.
• हिरासत में वापस नहीं भेजा जाएगा: चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि भले ही मोंडल ने अपनी आजीवन कारावास की औपचारिक अवधि पूरी न की हो, फिर भी उन्हें दोबारा हिरासत में नहीं लिया जाएगा.
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला यह संदेश देता है कि न्याय प्रणाली में कठोर कानूनी नियमों और मानवाधिकारों के बीच संतुलन बनाने की क्षमता है, जिससे देश के सबसे बुजुर्ग कैदी को जीवन के अंतिम पड़ाव में स्वतंत्र रूप से रहने का अधिकार मिला है.
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पत्रकारिता में 16 वर्षों से अधिक का सुदीर्घ अनुभव रखने वाले संदीप गुप्ता वर्तमान में News18 इंडिया में बतौर चीफ सब-एडिटर होम पेज पर जिम्मेदारी संभाल रहे हैं. जटिल और सामरिक विषयों को बेहद सरल भाषा में पाठकों त…
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