India
oi-Pallavi Kumari
Former
CJI
BR
Gavai:
सुप्रीम
कोर्ट
के
पूर्व
मुख्य
न्यायाधीश
जस्टिस
बीआर
गवई
ने
रिटायरमेंट
के
बाद
25
नवंबर
को
दिए
एक
इंटरव्यू
में
कई
बड़े
मुद्दों
पर
साफ-साफ
बात
रखी
है।
सोशल
मीडिया
पर
फैलाए
गए
आरोपों
से
लेकर
राजनीति
में
आने
की
अटकलों
तक,
उन्होंने
हर
सवाल
का
बेबाक
जवाब
दिया।
सबसे
चर्चित
बयान
रहा-
“मैं
हिंदू
विरोधी
नहीं
हूं।”
उनके
मुताबिक
उन्हें
एंटी-हिंदू
कहना
लोगों
की
गलतफहमी
और
गलत
नैरेटिव
का
नतीजा
था।
हिंदू-विरोधी
कहे
जाने
पर
गवई
का
जवाब:
‘ये
आरोप
पूरी
तरह
गलत’
जस्टिस
गवई
ने
कहा
कि
उनके
खिलाफ
सोशल
मीडिया
पर
जो
‘एंटी-हिंदू’
जैसी
बातें
फैलाई
गईं,
वो
बिल्कुल
आधारहीन
थीं।
उन्होंने
कहा
कि
वे
हमेशा
संविधान
के
तहत
फैसले
लेते
रहे
हैं
और
किसी
धर्म
के
खिलाफ
होना
तो
दूर,
उनके
निर्णयों
को
भी
सोशल
मीडिया
ने
तोड़-मरोड़
कर
पेश
किया।

उन्होंने
बताया
कि
जूता
फेंके
जाने
की
घटना
ने
उन्हें
व्यक्तिगत
तौर
पर
विचलित
नहीं
किया,
लेकिन
उसके
बाद
उन्होंने
कोर्ट
में
टिप्पणियां
करते
समय
और
भी
ज्यादा
सावधानी
बरतनी
शुरू
की।
वजह
ये
कि
सोशल
मीडिया
पर
किसी
भी
बात
को
गलत
तरीके
से
पेश
कर
दिया
जाता
है।
🔵
राजनीति
में
नहीं
आएंगे,
न
ही
सरकार
से
कोई
पद
लेंगे
बी.आर.
गवई
ने
राजनीति
में
आने
की
संभावनाओं
को
साफ
तौर
पर
खारिज
कर
दिया।
उन्होंने
कहा
कि
उनके
पास
राजनीति
में
जाने
का
कोई
इरादा
नहीं
है
और
आगे
भी
ऐसा
कोई
प्लान
नहीं
है।
साथ
ही
उन्होंने
ये
भी
स्पष्ट
किया
कि
वे
रिटायरमेंट
के
बाद
सरकार
से
कोई
भी
पद
या
जिम्मेदारी
स्वीकार
नहीं
करेंगे।
राज्यपाल,
राज्यसभा
या
किसी
ट्रिब्यूनल
में
नियुक्ति
को
लेकर
उन्होंने
साफ
कहा,
“मैं
सरकार
से
कुछ
नहीं
चाहता।
मैं
कोई
पोस्ट-रिटायरमेंट
असाइनमेंट
नहीं
लूंगा।”
उनका
कहना
था
कि
जब
वे
सरकार
से
कुछ
लेना
ही
नहीं
चाहते,
तो
फैसलों
में
भी
किसी
तरह
की
पसंद-नापसंद
का
सवाल
ही
नहीं
उठता।
🔵
न्यायपालिका
की
स्वतंत्रता
पर
बोले-
संविधान
सर्वोच्च
है
जस्टिस
गवई
ने
इंटरव्यू
में
कहा
कि
न
संसद
सर्वोच्च
है,
न
न्यायपालिका।
सर्वोच्च
है
सिर्फ
संविधान।
उन्होंने
कहा
कि
जजों
को
सरकार
की
मर्जी
से
काम
करने
वाला
बताने
वाली
चर्चाएं
गलत
हैं।
उन्होंने
बताया
कि
उनके
पूरे
कार्यकाल
में
न
तो
किसी
मंत्री
या
अधिकारी
ने
फोन
किया
और
न
ही
किसी
तरह
का
दबाव
बनाने
की
कोशिश
की
गई।
न
ट्रांसफर
पर
दखल,
न
नियुक्तियों
में
दखल
कुछ
भी
नहीं
हुआ।
बेंच
फिक्सिंग
के
आरोपों
को
भी
उन्होंने
सिरे
से
खारिज
किया।
🔵
बुलडोजर
जस्टिस,
गवर्नर
की
शक्ति
और
पर्यावरण
मामलों
पर
भी
रखी
राय
जस्टिस
गवई
ने
बुलडोजर
कार्रवाई
पर
कहा
कि
कानून
का
शासन
हर
हाल
में
बुलडोजर
के
शासन
पर
हावी
होना
चाहिए।
लेकिन
उसे
प्रभावी
ढंग
से
लागू
करना
भी
उतना
ही
जरूरी
है।
उन्होंने
स्पष्ट
किया
कि
कई
बार
कंटेम्प्ट
याचिकाओं
या
महत्वपूर्ण
पर्यावरण
मामलों
पर
तुरंत
सुनवाई
न
हो
पाने
की
वजह
केसों
की
भारी
संख्या
और
प्राथमिकता
वाले
मामलों
की
वजह
से
होती
है।
अरावली
और
प्रदूषण
से
जुड़े
मामलों
पर
उन्होंने
अपने
फैसलों
को
लेकर
संतोष
जताया।
गवर्नर
की
शक्तियों,
बिल
रोकने
और
ऑर्डिनेंस
पर
उनके
फैसले
भी
चर्चा
में
रहे।
उन्होंने
याद
दिलाया
कि
अदालत
ने
कई
बार
गवर्नरों
की
सीमाएं
तय
कीं।
🔵
‘बेल,
न
कि
जेल’
सिद्धांत
पर
दिया
जोर
पीएमएलए
और
यूएपीए
जैसे
कड़े
कानूनों
पर
उन्होंने
कहा
कि
‘बेल
इज
द
रूल’
का
सिद्धांत
हर
जगह
लागू
होना
चाहिए।
उन्होंने
चिंता
जताई
कि
निचली
अदालतें
कई
बार
इस
सिद्धांत
को
सही
तरह
से
लागू
नहीं
कर
पातीं।
उन्होंने
कहा
कि
अंडरट्रायल
कैदियों
की
स्थिति
सुधारने
के
लिए
संसद
को
मजबूत
और
स्पष्ट
कानून
बनाने
होंगे।
🔵
हेट
स्पीच
पर
सख्त
कानून
की
जरूरत
सोशल
मीडिया
पर
चल
रही
नफरत
भरे
बयानों
की
बाढ़
को
लेकर
जस्टिस
गवई
ने
कहा
कि
हेट
स्पीच
समाज
को
तोड़ती
है।
इसके
खिलाफ
संसद
को
एक
ठोस
और
सख्त
कानून
बनाना
चाहिए।
साथ
ही
उन्होंने
कोर्ट
की
टिप्पणियों
के
सोशल
मीडिया
कवरेज
पर
भी
कुछ
नियम
बनाने
की
वकालत
की,
ताकि
न्यायपालिका
की
बातों
को
मनमाने
ढंग
से
तोड़-मरोड़कर
पेश
न
किया
जा
सके।
🔵
रिटायरमेंट
के
बाद
क्या
करेंगे
बीआर
गवई?
उन्होंने
बताया
कि
अब
वे
किसी
सरकारी
पद
को
नहीं
अपनाएंगे,
बल्कि
सामाजिक
कार्यों
में
समय
देना
चाहेंगे।
पूर्व
जस्टिस
गवई
के
इन
खुले
और
बेबाक
बयानों
ने
न
सिर्फ
उनकी
सोच
बल्कि
भारतीय
न्यायपालिका
की
कई
जटिलताओं
को
भी
नई
रोशनी
में
सामने
रखा
है।
-

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