नई दिल्लीः क्या कोई पत्नी जो बिना किसी वाजिब वजह के अपने पति को छोड़ देती है, वह उस अवधि के लिए पिछला मेंटेनेंस पाने की हकदार हो सकती है? इस अहम सवाल पर केरल हाईकोर्ट ने एक ऐसा फैसला दिया है, जो आने वाले समय में मेंटेनेंस और तलाक से जुड़े कई मामलों की दिशा तय कर सकता है.
केरल हाई कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा है कि अगर यह साबित हो जाए कि पत्नी ने बिना किसी उचित कारण के अपने पति को छोड़ दिया, तो वह उस अवधि के लिए पिछला मेंटेनेंस मांगने की हकदार नहीं है, जब वह पति से अलग रह रही थी.
फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द
यह फैसला जस्टिस सतीश निनन और जस्टिस पी. कृष्णा कुमार की डिवीजन बेंच ने सुनाया है. कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें पति को अपनी पत्नी को पिछला मेंटेनेंस देने का निर्देश दिया गया था, जबकि उसी फैमिली कोर्ट ने पत्नी द्वारा पति को छोड़ने के आधार पर तलाक भी मंजूर किया था. हाई कोर्ट ने कहा कि जब यह स्थापित हो चुका है कि पत्नी ने बिना किसी वजह के अपने पति को छोड़ दिया, तो ट्रायल कोर्ट को उसे पिछला मेंटेनेंस नहीं देना चाहिए था.
‘छोड़ने’ की कानूनी व्याख्या
कोर्ट ने इस फैसले में डिवोर्स एक्ट, 1869 के तहत ‘छोड़ने’ की व्याख्या को भी स्पष्ट किया है. यह कानून ईसाई शादियों पर लागू होता है और इसमें ‘छोड़ने’ का अर्थ है पति या पत्नी की इच्छा के खिलाफ विवाह से अलग रहना है. हालांकि, इस कानून में स्पष्ट रूप से यह नहीं लिखा है कि छोड़ना ‘बिना वजह के’ होना चाहिए, लेकिन कोर्ट ने उद्देश्यपरक व्याख्या अपनाते हुए कहा कि डिवोर्स एक्ट, 1869 के तहत ‘छोड़ने’ का मतलब है बिना किसी सही और वैध वजह के विवाह को त्याग देना.
पत्नी की दलील क्यों नहीं मानी गई?
पत्नी की ओर से दलील दी गई थी कि फैमिली कोर्ट का यह कहना कि उसने पति को छोड़ा इसका मतलब यह नहीं है कि उसने बिना वजह के छोड़ा है. लेकिन हाई कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि अगर ‘छोड़ने’ को बिना वजह के अलगाव से न जोड़ा जाए, तो ऐसे लोग भी दोषी ठहराए जाएंगे जो किसी वैध कारण से अलग रह रहे हों, जो कि संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता) और 21 (जीवन और गरिमा) के खिलाफ होगा. कोर्ट ने कहा कि चूंकि डिवोर्स एक्ट, 1869 संविधान से पहले का कानून है, इसलिए इसकी व्याख्या संविधान की मूल भावना के अनुरूप की जानी चाहिए.
पति और पत्नी की शादी ईसाई रीति-रिवाजों से हुई
शादी के बाद पत्नी गर्भवती हुई और मायके चली गई. दिसंबर 2005 में बच्चे के जन्म के बाद पति उसे वापस लेने नहीं गया. इसके बाद दोनों अलग-अलग रहने लगे. पति ने फैमिली कोर्ट में तलाक की अर्जी दी, जबकि पत्नी ने अपने गहनों और पैसे की वापसी के साथ अपने और नाबालिग बच्चे के लिए पिछले गुजारा भत्ते की मांग की.
फैमिली कोर्ट बनाम हाईकोर्ट
फैमिली कोर्ट ने पति को छोड़ने के आधार पर तलाक दिया. पत्नी को 28 तोला सोना या उसकी कीमत लौटाने का आदेश दिया. पत्नी को ₹25,500 और बच्चे को ₹8,000 पिछला मेंटेनेंस देने को कहा तो इस पर हाईकोर्ट ने सोने के गहने लौटाने का आदेश बरकरार रखा. कोर्ट ने पत्नी को पिछला मेंटेनेंस देने का आदेश रद्द कर दिया है. हाई कोर्ट ने साफ कहा कि जब यह साबित हो चुका है कि पत्नी ने बिना किसी वाजिब वजह के पति को छोड़ा, तो वह पिछला मेंटेनेंस पाने की हकदार नहीं है.

