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Basmati Rice Dispute: बासमती की वजह से क्यों अटका यूरोपीय यूनियन से भारत का फ्री ट्रेड एलायंस, जानिए पाकिस्तान से क्या है विवाद

HawkNewsBy HawkNewsSeptember 16, 2025No Comments6 Mins Read
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Basmati Rice Dispute: बासमती चावल को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से विवाद चल रहा है. इसी वजह से बासमती चावल को लेकर भारत यूरोपीय संघ के साथ व्यापार समझौता नहीं कर पा रहा है. दोनों देश दुनिया में इस अनाज के सबसे बड़े उत्पादक हैं और दोनों ही बासमती नाम के इस्तेमाल पर विशेष अधिकार का दावा करते हैं. जिसकी वजह से ‘बासमती’ शब्द का इस्तेमाल केवल एक निश्चित क्षेत्र में उगाए जाने वाले चावल तक ही सीमित हो जाता है. इससे उत्पादकों को ज्यादा कीमत वसूलने का मौका मिलता है. ये दोनों दुश्मन पड़ोसी बासमती चावल के दुनिया के केवल दो निर्यातक हैं. अकेले भारत में बासमती की 34 किस्में हैं, जबकि पाकिस्तान में 24 किस्में हैं.

भारत ने 2020 में यूरोपीय संघ (EU) में बासमती चावल के लिए जीआई टैग का आवेदन किया था. भारत का दावा है कि बासमती चावल की उत्पत्ति हिमालय की तलहटी में स्थित भारत-गंगा के मैदानी इलाकों में हुई है, जो भारत के कुछ राज्यों (पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश) में फैला हुआ है. भारत का तर्क है कि बासमती चावल अपनी सुगंध, स्वाद और लंबे दाने के लिए जाना जाता है. और ये सभी गुण इस विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र से जुड़े हुए हैं. जीआई टैग एक तरह का बौद्धिक संपदा अधिकार है जो किसी उत्पाद को उसकी विशिष्ट भौगोलिक उत्पत्ति और उस क्षेत्र के कारण मिलने वाली खास विशेषताओं के लिए दिया जाता है. इसका मतलब है कि सिर्फ उसी क्षेत्र में पैदा होने वाला उत्पाद उस नाम का इस्तेमाल कर सकता है, जैसे, दार्जिलिंग चाय.

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पाकिस्तान को किस बात पर आपत्ति
बासमती चावल के लिए जीआई टैग के लिए भारत के इस आवेदन का पाकिस्तान ने इसका विरोध किया. पाकिस्तान का तर्क है कि बासमती चावल भारत और पाकिस्तान दोनों का एक संयुक्त उत्पाद है. विभाजन से पहले यह चावल अविभाजित पंजाब प्रांत में उगाया जाता था, जो अब दोनों देशों के बीच विभाजित है. पाकिस्तान का कहना है कि अगर भारत को बासमती का जीआई टैग मिल जाता है तो यह अंतरराष्ट्रीय बाजार में उसके बासमती निर्यात को बुरी तरह प्रभावित करेगा. भारत के आवेदन के बाद पाकिस्तान ने 2020 में अपना खुद का जियोग्राफिकल इंडिकेशन एक्ट बनाया और 2021 में अपने बासमती चावल को जीआई टैग दिया. पाकिस्तान ने यह कदम यूरोपीय संघ में भारत के दावे का मुकाबला करने के लिए उठाया था.

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यूरोपीय यूनियन में क्या है स्थिति
यूरोपीय संघ में भारत का जीआई टैग आवेदन अभी भी विचाराधीन है. पाकिस्तान ने इस पर औपचारिक रूप से आपत्ति दर्ज करायी है. दोनों देशों के बीच इस मुद्दे पर बातचीत भी हुई है, लेकिन अभी तक कोई समझौता नहीं हो पाया है. इस विवाद का असर केवल यूरोपीय संघ तक सीमित नहीं है. ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे अन्य देशों में भी बासमती को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच इसी तरह के विवाद चल रहे हैं. इस  विवाद की वजह से भारत का यूरोपीय संघ के साथ व्यापार समझौता नहीं हो पा रहा है. भारतीय अधिकारियों ने बताया कि व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए नई दिल्ली आए यूरोपीय संघ के वार्ताकारों से भारत के बासमती चावल के नामकरण के अधिकार को स्वीकार करने के लिए कहा जा रहा है. एक अधिकारी ने कहा, “लेकिन इससे इस्लामाबाद के साथ कूटनीतिक मतभेद पैदा हो सकते हैं, इसलिए ब्रुसेल्स किसी तरह के फैसले के लिए समय ले रहा है.”

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पाकिस्तान ने भी किया आवेदन
एफटी के अनुसार, भारत ने यूरोपीय संघ के बाजार में बासमती शब्द की सुरक्षा के लिए अपने आवेदन को मान्यता मिलने के लिए सात साल इंतजार किया है. लेकिन अब उसकी बेताबी बढ़ती जा रही है. 2023 में, पाकिस्तान ने चावल के उत्पादन क्षेत्र और विधियों को परिभाषित करने के लिए अपना आवेदन दायर किया, जिसमें पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) के चार जिले भी शामिल हैं. यूरोपीय संघ के अधिकारियों का कहना है कि पाकिस्तान के दावे को मंजूरी देने का मतलब होगा कि उन जमीनों पर उसकी संप्रभुता के दावे को वास्तविक मान्यता मिल जाएगी, जिससे नई दिल्ली नाराज होगा.

भारत है सबसे बड़ा निर्यातक
भारत दुनिया में बासमती चावल का सबसे बड़ा निर्यातक है. जो कुल निर्यात का लगभग 65 फीसदी हिस्सा है. शेष बाजार में पाकिस्तान की हिस्सेदारी है. दोनों देशों के लिए बासमती चावल एक महत्वपूर्ण निर्यात वस्तु है. यह विवाद अब केवल व्यापारिक नहीं रहा, बल्कि एक कानूनी लड़ाई का रूप ले चुका है. दिल्ली हाई कोर्ट में ‘सुपर बासमती’ नाम के निर्यात को लेकर भी पाकिस्तानी संस्थाओं ने मुकदमा दायर किया था. जिसे बाद में खारिज कर दिया गया. 2024-25 में भारत ने ईरान को 6,374 करोड़ रुपये का बासमती चावल निर्यात किया था. जो 2024-25 में भारत के कुल बासमती निर्यात का 12.6 फीसदी था. पाकिस्तान स्थित यूरोपीय संघ के प्रतिनिधिमंडल ने एक बयान में कहा, “भारत और पाकिस्तान दोनों के आवेदनों से संबंधित कार्यवाही समानांतर रूप से चल रही है.” भारत के वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने शुक्रवार को यूरोपीय संघ के एक व्यापार प्रतिनिधिमंडल के दौरे के बाद कहा कि उनका देश एक मुक्त व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के लिए यूरोपीय संघ के साथ काम कर रहा है जिससे दोनों पक्षों के व्यवसायों और उपभोक्ताओं को लाभ होगा.

क्या होता है मुक्त व्यापार समझौता
मुक्त व्यापार समझौता (FTA) दो या दो से अधिक देशों के बीच किया गया एक समझौता है, जिसका उद्देश्य आपस में व्यापार को आसान बनाना और बढ़ाना होता है. जब दो देश FTA करते हैं, तो वे एक-दूसरे के बीच आयात-निर्यात होने वाले उत्पादों पर लगने वाले टैरिफ (आयात शुल्क) और गैर-टैरिफ बाधाओं (जैसे कोटा, सख्त मानक) को काफी हद तक कम या खत्म कर देते हैं. इसका सीधा सा मतलब है कि एक देश का सामान दूसरे देश में कम कीमत पर और बिना किसी बड़ी बाधा के बिक पाएगा. भारत और यूरोपीय संघ के बीच FTA की बातचीत लंबे समय से चल रही है, और यह दोनों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है.

यूरोपीय संघ भारत के लिए बड़ा बाजार
यूरोपीय संघ एक बड़ा और समृद्ध बाजार है जिसमें 27 सदस्य देश शामिल हैं. भारत के लिए यह एक बड़ा अवसर है कि वह अपने उत्पादों, जैसे कपड़ा, चमड़े का सामान, ऑटोमोबाइल पार्ट्स, कृषि उत्पाद और आईटी सेवाओं को बिना किसी बड़े शुल्क के वहां बेच सके. FTA होने से दोनों क्षेत्रों में निवेश को बढ़ावा मिलेगा. यूरोपीय कंपनियां भारत में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित होंगी, जिससे रोजगार के अवसर पैदा होंगे. इसी तरह, भारतीय कंपनियां भी यूरोप में व्यापार और निवेश बढ़ा सकेंगी. यह समझौता भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने में मदद करेगा. वर्तमान में, भारत से यूरोपीय संघ को निर्यात होने वाले कई उत्पादों पर उच्च टैरिफ लगते हैं. FTA होने पर ये टैरिफ कम हो जाएंगे या खत्म हो जाएंगे, जिससे भारतीय निर्यातकों को अधिक फायदा होगा.

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