Agniveer News: अग्निपथ योजना के तहत तीनों सेनाओं में अग्निवीर बने युवाओं को बड़ी खुशखबरी मिलने वाली है. सरकार और सेना इस योजना में व्यापक बदलाव करने की योजना पर काम कर रहे हैं. इससे अग्निवीर बने करीब 50 से 75 फीसदी युवाओं को तीनों सेना में नौकरी पक्की हो सकती है. अगर यह हो जाता है तो अग्निवीरों की एक बहुत बड़ी मांग पूरी हो जाएगी. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक थल सेना, वायु सेना और नौसेना तीनों ने सरकार से इस योजना में व्यापक बदलाव की सिफारिश कर दी है. तीनों सेनाओं का मानना है कि अग्निवीरों की ट्रेनिंग पर काफी मेहनत किया गया है. ऐसे में 75 फीसदी अग्निवीरों को मात्र चार साल की सेवा के बाद बाहर करना व्यावहारिक तौर पर मुफीद नहीं है.
दरअसल, अग्निपथ योजना लागू होने के बाद से ही विवादों में रहा है. विपक्ष के साथ सेना के जानकार सवाल उठाते रहे हैं कि केवल चार साल की सेवा के बाद युवाओं को रिटायर करना कहीं से भी मुफीद नहीं है. विपक्ष के लगातार सवाल उठाने के कारण पहले भी योजना प्रावधानों में कई बदलाव किए गए हैं. अब ऐसा लगता है कि तीनों सेना भी इस तर्क से सहमत हो गई है. इंडियन एक्सप्रेस लिखता है कि तीनों सेनाओं ने प्रस्ताव भेज दिया है. अगर ये प्रस्ताव हो जाते हैं तो हजारों अग्निवीरों के लिए सेना में लंबा करियर बनाने का रास्ता पहले की तुलना में कहीं ज्यादा आसान हो जाएगा.
अभी क्या है नियम?
कितना बदलाव चाहती है तीनों सेनाएं
इंडियन एक्सप्रेस सूत्रों के हवाले से लिखता है कि नौसेना करीब 75 फीसदी अग्निवीरों को स्थायी सेवा में रखने के पक्ष में है. वहीं थल सेना और एयरफोर्स लगभग 50 फीसदी तक रिटेंशन चाहती है. हालांकि, अभी तक इस पर अंतिम फैसला नहीं हुआ है. तीनों सेनाओं और रक्षा मंत्रालय के अधीन डिपार्टमेंट ऑफ मिलिट्री अफेयर्स (DMA) के बीच चर्चा होनी बाकी है.
आखिर तीनों सेनाओं का रुख क्यों बदला?
सबसे बड़ा कारण है ऑपरेशन सिंदूर से मिले अनुभव. सूत्रों के मुताबिक ऑपरेशन के दौरान अग्निवीरों ने शानदार प्रदर्शन किया. उन्होंने हर जिम्मेदारी को अच्छी तरह निभाया, लेकिन कुछ ऐसे मौके भी आए जब अनुभवी सैनिकों ने ज्यादा तेजी और बेहतर तरीके से परिस्थितियों को संभाला. युद्ध या सैन्य अभियान में केवल शारीरिक क्षमता ही नहीं, बल्कि अनुभव भी बहुत बड़ी भूमिका निभाता है. कई बार अलग-अलग इलाकों में तैनाती, अनेक सैन्य अभ्यास और वर्षों की फील्ड सर्विस सैनिकों को ऐसे फैसले लेने में मदद करती है, जो केवल प्रशिक्षण से नहीं सीखे जा सकते. इसी अनुभव ने सेनाओं को यह सोचने पर मजबूर किया कि यदि अधिक अग्निवीर लंबे समय तक सेवा में बने रहें, तो सेना की युद्ध क्षमता और मजबूत हो सकती है.
आधुनिक हथियारों ने भी बढ़ाई जरूरत
एक और बड़ा कारण तेजी से बदलती सैन्य तकनीक है. ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत ने कई आधुनिक हथियारों, हाईटेक प्लेटफॉर्म और नई सैन्य प्रणालियों की खरीद की प्रक्रिया तेज की है. इन अत्याधुनिक हथियारों को चलाने के लिए सैनिकों को लंबी और विशेष ट्रेनिंग की जरूरत होती है. यदि कोई जवान चार साल बाद ही सेवा छोड़ देता है, तो उसके प्रशिक्षण और अनुभव का पूरा लाभ सेना को नहीं मिल पाता. यह जरूरत खासकर नेवी और एयरफोर्स में ज्यादा महसूस की जा रही है, जहां सैनिक अत्यधिक तकनीकी उपकरणों, मिसाइल सिस्टम, रडार और युद्धपोतों पर काम करते हैं. ऐसे सिस्टम को पूरी तरह समझने और उसमें दक्ष होने में कई साल लग जाते हैं.
वाराणसी में ट्रेनिंग के बाद पासिंग आउट परेड में अग्निवीर जवान. फोटो- पीटीआई
जवानों के बीच बेहतर तालमेल भी अहम वजह
सेना का मानना है कि लंबे समय तक साथ काम करने वाले सैनिकों के बीच बेहतर तालमेल और भरोसा विकसित होता है. सीमा पर कठिन परिस्थितियों में साथ रहने, सैन्य अभ्यास करने और जोखिम भरे अभियानों में भाग लेने से एक मजबूत टीम बनती है. यही तालमेल युद्ध के दौरान बड़ा अंतर पैदा करता है. अगर बड़ी संख्या में जवान हर चार साल में बदलते रहेंगे, तो अनुभवी टीम तैयार करना मुश्किल हो सकता है.
अगर 50 या 75 फीसदी की मंजूरी नहीं मिली तो?
सूत्रों का कहना है कि एक दूसरा विकल्प भी विचाराधीन है. यदि सरकार कुल रिटेंशन प्रतिशत बढ़ाने की मंजूरी नहीं देती, तो कुछ विशेष यूनिटों में ज्यादा अग्निवीरों को स्थायी सेवा दी जा सकती है. उदाहरण के लिए सेना की नई भैरव बटालियन जैसी विशेष इकाइयों में अनुभवी अग्निवीरों की संख्या सामान्य इन्फैंट्री बटालियनों की तुलना में अधिक रखी जा सकती है. इससे कुल रिटेंशन 25 फीसदी ही रहेगा, लेकिन जिन यूनिटों में अनुभव की सबसे ज्यादा जरूरत है, वहां ज्यादा स्थायी सैनिक उपलब्ध होंगे.
जवानों की कमी भी एक वजह
इस चर्चा के पीछे एक और महत्वपूर्ण कारण सेना में मैनपावर की जरूरत भी मानी जा रही है. हर साल बड़ी संख्या में सैनिक सेवानिवृत्त होते हैं. यदि केवल 25 फीसदी अग्निवीर ही सेवा में बने रहते हैं, तो कुछ समय के लिए सैनिकों की संख्या में कमी आ सकती है. हालांकि, सेना का कहना है कि यह अस्थायी स्थिति है और आने वाले वर्षों में भर्ती बढ़ाकर इस अंतर को पूरा कर लिया जाएगा. पिछले प्रशिक्षण चक्र में अकेले भारतीय सेना के लगभग 70 हजार अग्निवीर प्रशिक्षण ले रहे थे. अगले प्रशिक्षण वर्ष में करीब 90 हजार रिक्तियों पर भर्ती की तैयारी की जा रही है ताकि सैनिकों की कमी धीरे-धीरे दूर की जा सके.
क्या अग्निपथ योजना में बदलाव तय है?
फिलहाल ऐसा नहीं कहा जा सकता. इससे पहले भी अधिक रिटेंशन का प्रस्ताव रक्षा मंत्रालय के पास भेजा गया था, लेकिन उसे दोबारा समीक्षा के लिए वापस कर दिया गया था. यानी अभी यह केवल विचार के स्तर पर है. अंतिम फैसला सरकार और रक्षा मंत्रालय को लेना है.
पूर्व सेना प्रमुख ने क्या कहा?
पूर्व सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने हाल ही में कहा था कि अग्निपथ योजना को केवल चार साल की नौकरी के नजरिए से नहीं देखना चाहिए. उनके मुताबिक यह भारतीय सेना को ज्यादा युवा, ऊर्जावान, अनुशासित और भविष्य की जरूरतों के अनुरूप बनाने का बड़ा सुधार है. उन्होंने यह भी कहा कि योजना अभी शुरुआती दौर में है. पहले बैच की चार साल की सेवा भी पूरी नहीं हुई है. इसलिए भविष्य में यदि किसी तरह का बदलाव या सुधार किया जाता है, तो वह वास्तविक अनुभव, सैन्य अभियानों से मिले फीडबैक और संस्थागत समीक्षा के आधार पर होगा.

