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Ubli Ke Balaji Temple: राजस्थान के खींवासर स्थित ऊबली के बालाजी मंदिर में मिठाई की जगह पशुओं के पहले दूध से बने दही का भोग लगाने की पुरानी परंपरा है. इस मंदिर और गांव की आस्था से जुड़ी कई मान्यताएं और विकास से जुड़ी जरूरतें हैं.
झुंझुनूं: राजस्थान में मंदिरों की अपनी-अपनी परंपराएं और मान्यताएं हैं, लेकिन खींवासर का ऊबली का बालाजी मंदिर अपनी अनूठी परंपरा के लिए खास पहचान रखता है. यहां बजरंगबली को मिठाई या अन्य पकवानों की बजाय दही का भोग लगाया जाता है. खास बात यह है कि यह दही पशु के पहले दूध से तैयार किया जाता है. ग्रामीणों की मान्यता है कि बालाजी को दही का भोग लगाने से पशु बीमारियों से सुरक्षित रहते हैं. इसी आस्था के चलते राजस्थान ही नहीं, हरियाणा से भी श्रद्धालु सालभर यहां पहुंचते हैं. करीब 150 से 200 साल पुराने इस मंदिर की पहचान इतनी गहरी है कि इसी के नाम पर गांव का प्रमुख व्यावसायिक केंद्र बालाजी स्टैंड कहलाता है.
दो बीघा जमीन दान देकर गांव के विकास की पहल
खींवासर की कहानी भी करीब 300 साल पुरानी है. पिपराली से आए मूंड गोत्र के खींवाराम जाट ने इस गांव को बसाया था. उन्हीं के नाम पर गांव का नाम खींवासर पड़ा. कभी छऊ पंचायत का हिस्सा रहा यह गांव वर्ष 2020 में राजस्व गांव झाझड़िया की ढाणी के साथ मिलकर नई ग्राम पंचायत बना. इसके बाद बिमला देवी यहां की पहली महिला सरपंच चुनी गईं. पंचायत की जिम्मेदारी संभालते ही उन्होंने पंचायत भवन निर्माण के लिए दो बीघा जमीन दान देकर गांव के विकास की पहल की.
मंदिर के नाम से पहचान, आसपास के गांवों का व्यापारिक केंद्र
खींवासर पंचायत का मुख्यालय गांव में है, लेकिन इसकी ज्यादातर व्यावसायिक गतिविधियों का केंद्र बालाजी स्टैंड है. यहां अनाज मंडी, बैंक, बाजार, सहकारी समिति और आठवीं तक का सरकारी स्कूल संचालित है. बजावा, रावतका, छावसरी और छऊ सहित आसपास के गांवों के लोग भी खरीदारी और अन्य जरूरी कामों के लिए इसी केंद्र पर निर्भर हैं. गांव की पुलिस चौकी भी बालाजी स्टैंड खींवासर के नाम से जानी जाती है. सड़क मार्ग से जुड़ा यह क्षेत्र आसपास के ग्रामीण इलाकों के लिए व्यापारिक गतिविधियों का प्रमुख ठिकाना बन चुका है.
पांच साल बाद भी कृषि और पटवार भवन का इंतजार
पंचायत बने पांच साल बीतने के बावजूद खींवासर में बुनियादी सरकारी सुविधाओं की कमी ग्रामीणों को परेशान कर रही है. यहां आज तक कृषि विभाग का कार्यालय और पटवार भवन नहीं खुला है. किसानों को खाद-बीज संबंधी जानकारी और पटवारी से जुड़े कामों के लिए सात से आठ किलोमीटर दूर छऊ जाना पड़ता है. इससे समय और पैसे दोनों खर्च होते हैं. ग्रामीणों का कहना है कि जब गांव को पंचायत मुख्यालय का दर्जा मिल चुका है तो यहां सरकारी कार्यालय भी शुरू होने चाहिए, ताकि लोगों को छोटे-छोटे कामों के लिए दूसरे गांवों के चक्कर नहीं लगाने पड़ें.
आठवीं के बाद बच्चों को पढ़ाई के लिए जाना पड़ता है बाहर
शिक्षा के क्षेत्र में भी गांव के सामने चुनौती है. खींवासर में सरकारी स्कूल आठवीं कक्षा तक ही है. इसके बाद बच्चों को आगे की पढ़ाई के लिए निजी स्कूलों या छावसरी और बड़ागांव के सरकारी स्कूलों में जाना पड़ता है. ग्रामीण लंबे समय से गांव में सरकारी सीनियर सेकेंडरी स्कूल शुरू करने की मांग कर रहे हैं, ताकि बच्चों को माध्यमिक और उच्च माध्यमिक शिक्षा के लिए दूसरे गांवों पर निर्भर नहीं रहना पड़े.
भोग यहीं बांटते हैं श्रद्धालु, घर नहीं ले जाते प्रसाद
ऊबली का बालाजी मंदिर के पुजारी प्रदीप बताते हैं कि मंदिर करीब 150 से 200 साल पुराना है. यहां दही का भोग लगाने की परंपरा वर्षों से चली आ रही है. मान्यता के अनुसार पशु के पहले दूध से तैयार दही बालाजी को अर्पित किया जाता है, ताकि पशु स्वस्थ रहें और उन्हें बीमारियां नहीं हों. मंदिर के महंत जगदीश प्रसाद शर्मा के अनुसार श्रद्धालु भोग लगाने के बाद बचा हुआ प्रसाद अपने घर नहीं ले जाते, बल्कि मंदिर परिसर में ही लोगों के बीच बांट देते हैं. मनोकामना पूरी होने की आस्था के चलते श्रद्धालु यहां नारियल चढ़ाते हैं और लाल ध्वजा बांधते हैं.
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मेरा नाम जागृति दुबे है. मीडिया और डिजिटल पत्रकारिता की दुनिया में पिछले 6 वर्षों से सक्रिय हूं. पत्रकारिता के प्रति अपने जुनून को मैंने वर्ष 2019 में GBN 24 न्यूज़ चैनल से इंटर्नशिप के साथ शुरुआत देकर एक पेशेव…

