लखीमपुर खीरीः जिले में किसान और युवा अब पारंपरिक खेती के साथ-साथ बागवानी की ओर भी तेजी से रुख कर रहे हैं.बागवानी किसानों के लिए आय का एक बेहतर विकल्प बन रही है. खासकर अमरूद की खेती कम जमीन में भी की जा सकती है और उचित देखभाल के साथ किसान इससे अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं.हालांकि, कई बार किसानों को अमरूद की उन्नत किस्मों, पौधों के बीच सही दूरी, खाद-पानी और रोग प्रबंधन की जानकारी नहीं होती. इसके चलते पौधों का विकास प्रभावित होता है और उत्पादन कम मिलने से किसानों को नुकसान उठाना पड़ता है.
ऐसे में अगर किसान अमरूद की सही प्रजातियों का चयन करें और वैज्ञानिक तरीके से बागवानी करें, तो बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं. आज हम आपको अमरूद की तीन प्रमुख किस्मों के बारे में बता रहे हैं, जिनकी मदद से किसान अपनी आमदनी बढ़ाने की दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं.
अमरूद की ये तीन किस्में हैं प्रमुख
बातचीत करते हुए जनार्दन मिश्रा बताते हैं कि अमरूद की इलाहाबादी सफेदा, ताइवान पिंक और एल-49 (L-49) प्रमुख किस्मों में शामिल हैं. किसान अपनी जमीन, स्थानीय जलवायु, बाजार में मांग और उपलब्ध सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए इन किस्मों का चयन कर सकते हैं. पहला इलाहाबादी सफेदा- अमरूद की यह लोकप्रिय किस्म अपने सफेद गूदे, स्वाद और सुगंध के लिए जानी जाती है। ताजे फल के रूप में इसकी मांग रहती है। किसान व्यावसायिक बाग लगाने से पहले अपने क्षेत्र के बाजार और पौधों की प्रमाणिक उपलब्धता की जानकारी जरूर लें.
दूसरा प्रमखु किस्म है ताइवान पिंक, इस किस्म के फलों का गूदा गुलाबी रंग का होता है. आकर्षक रंग और स्वाद के कारण यह किस्म किसानों के लिए एक विकल्प हो सकती है. ताइवान पिंक की डिमांड बाजारों में अधिक रहती है. वर्ष में तीन बार फल आसानी से किसान प्राप्त कर सकते हैं अगर बात की जाए तो एक फल का वजन 100 ग्राम से लेकर 200 ग्राम तक रहता है.
वहीं तीसरी किस्म है एल, इसे सरदार अमरूद के नाम से भी जाना जाता है। यह व्यावसायिक बागवानी में प्रचलित किस्म है। इसके फल सामान्यतः अच्छे आकार और सफेद गूदे वाले होते हैं। उचित देखभाल और पोषण प्रबंधन से किसान बेहतर उत्पादन प्राप्त करने का प्रयास कर सकते हैं।
कितनी दूरी पर लगाएं अमरूद के पौधे
अमरूद की बागवानी में पौधों के बीच उचित दूरी रखना बेहद जरूरी है. इससे पौधों को पर्याप्त धूप और हवा मिलती है, शाखाओं का विकास बेहतर होता है और बाग में निराई-गुड़ाई, खाद डालने तथा छंटाई जैसे काम आसानी से किए जा सकते हैं. सामान्य बागवानी पद्धति में अमरूद के पौधों को 5 मीटर × 5 मीटर की दूरी पर लगाया जा सकता है. इस दूरी पर एक हेक्टेयर में लगभग 400 पौधे लगाए जा सकते हैं. वहीं, 6 मीटर × 6 मीटर की दूरी रखने पर एक हेक्टेयर में लगभग 278 पौधे लगेंगे. वास्तविक संख्या खेत की बनावट, रास्तों और सिंचाई व्यवस्था के अनुसार कुछ कम हो सकती है.
यदि किसान सघन बागवानी करना चाहते हैं, तो उन्हें किस्म, पौधों की बढ़वार, छंटाई और उपलब्ध तकनीक के अनुसार विशेषज्ञ की सलाह लेकर दूरी तय करनी चाहिए. बिना उचित प्रबंधन के पौधों को बहुत पास लगाने से आगे चलकर शाखाओं के फैलाव, धूप और हवा की कमी जैसी समस्याएं आ सकती हैं.
अमरूद की खेती के लिए जरूरी मिट्टी
अमरूद की खेती के लिए अच्छी जल निकासी वाली दोमट मिट्टी उपयुक्त मानी जाती है खेत में लंबे समय तक पानी जमा रहने से पौधों की जड़ों को नुकसान पहुंच सकता है. इसलिए बाग लगाने से पहले खेत की मिट्टी की जांच कराना और जल निकासी की व्यवस्था करना फायदेमंद रहता है. पौधे लगाने के लिए स्वस्थ और प्रमाणित नर्सरी से पौधे खरीदने चाहिए. इससे सही किस्म मिलने की संभावना बढ़ती है और पौधों की शुरुआती बढ़वार बेहतर हो सकती है. बाग लगाने से पहले मिट्टी की जांच के आधार पर खाद और उर्वरकों की योजना तैयार करनी चाहिए.
पौधों की देखभाल में इन बातों का रखें ध्यान
अमरूद के पौधों को शुरुआती समय में नियमित सिंचाई की जरूरत होती है. हालांकि, खेत में जरूरत से ज्यादा पानी नहीं भरना चाहिए. पौधों के आसपास खरपतवार को नियंत्रित रखें और सूखी, रोगग्रस्त या अनावश्यक शाखाओं की उचित समय पर छंटाई करें. समय-समय पर पौधों की पत्तियों, तनों और फलों का निरीक्षण करते रहें. यदि किसी प्रकार के कीट या रोग के लक्षण दिखाई दें, तो कृषि विशेषज्ञ की सलाह से ही उपचार करें. बिना पहचान के कीटनाशकों का छिड़काव करने से बचना चाहिए.
इसके साथ ही किसानों को बाग में फल लगने के समय, स्थानीय बाजार की मांग और बिक्री की व्यवस्था पर भी ध्यान देना चाहिए. केवल अधिक पौधे लगा देने से मुनाफा सुनिश्चित नहीं होता. अच्छी किस्म, उचित दूरी, संतुलित पोषण, रोग प्रबंधन और सही बाजार का चुनाव मिलकर खेती की सफलता तय करते हैं.
हो सकती है बंपर कमाई
अमरूद की बागवानी से होने वाली कमाई पौधों की किस्म, उम्र, फल उत्पादन, मौसम, देखभाल और बाजार में मिलने वाले भाव पर निर्भर करती है. शुरुआती वर्षों में बाग तैयार करने, पौधे खरीदने, सिंचाई और देखभाल पर खर्च होता है. बाजारों में अमरूद की डिमांड अधिक रहती है इस समय अमरुद बाजार में ₹80 प्रति किलो के हिसाब से बिक रहा है जिससे किसान कम समय में अधिक मुनाफा बागवानी से कमा सकते हैं.
