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क्‍वाड इज बैक… अमेरिका को समझ आ गई भारत की अहमियत, चीन-पाक के लिए इशारा हैं मार्को रूबियो की ये बातें

HawkNewsBy HawkNewsOctober 21, 2026No Comments6 Mins Read
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भारत और अमेरिका के रिश्तों में पिछले कुछ समय से रूस से तेल खरीद, टैरिफ और ट्रेड डील को लेकर खींचतान दिखाई देती रही है. ऐसे समय में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो का भारत दौरा कई अहम संकेत देता है. नेटवर्क18 के एडिटर-इन-चीफ राहुल जोशी को दिए इंटरव्यू में रूबियो ने एक तरफ भारत को अमेरिका के लिए बेहद महत्वपूर्ण देश बताया, तो दूसरी तरफ क्वाड के अगले शिखर सम्मेलन को बड़ी बात कही है. उन्होंने यह भी कहा कि भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौता महीनों नहीं, बल्कि कुछ हफ्तों में पूरा हो सकता है.

इस पूरे घटनाक्रम को सिर्फ एक व्यापार समझौते या कूटनीतिक मुलाकात के तौर पर देखना काफी नहीं होगा. इसके पीछे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक सहयोग, चीन की बढ़ती भूमिका, तेल-गैस सप्लाई की सुरक्षा और वैश्विक शक्ति संतुलन जैसे बड़े मुद्दे हैं. रूबियो की बातों से एक बात को साफ है कि अमेरिका इन सभी क्षेत्रों में भारत के साथ रिश्तों को आगे बढ़ाना चाहता है. अमेरिकी विदेश मंत्री ने कुछ ऐसी बातें कहीं है, जिसे चीन-पाकिस्तान के लिए साफ इशारे की तरह देखा जा रहा है.

क्वाड की वापसी के संकेत, मनीला में जुट सकते हैं चारों देश

नेटवर्क18 को दिए इंटरव्यू में रूबियो ने क्वाड को लेकर बेहद अहम बयान दिया. उन्होंने उम्मीद जताई कि क्वाड नेताओं का शिखर सम्मेलन 2026 के अंत से पहले हो जाएगा. उनके मुताबिक, बैठक फिलीपींस की राजधानी मनीला में आसियान सम्मेलन के दौरान आयोजित करने पर सहमति बनी है. हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि बैठक की तारीख अभी तय नहीं हुई है.

क्वाड यानी क्वाड्रिलैटरल सिक्योरिटी डायलॉग भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया का समूह है. इसका रणनीतिक महत्व हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा, स्वतंत्र नौवहन, महत्वपूर्ण तकनीकों, सप्लाई चेन और क्षेत्रीय सहयोग से जुड़ा है. यह कोई पारंपरिक सैन्य गठबंधन नहीं है, लेकिन चारों लोकतांत्रिक देशों के बीच समन्वय इसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाता है.

रूबियो ने इंटरव्यू में याद दिलाया कि अमेरिकी विदेश मंत्री के रूप में शपथ लेने के बाद उनकी पहली बैठक भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ क्वाड को लेकर ही हुई थी. उन्होंने कहा कि इसके बाद भी दोनों देशों के बीच कई स्तरों पर बातचीत और बैठकें हुई हैं. उनके मुताबिक, अब क्वाड सिर्फ बैठकों और साझा घोषणाओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसके जरिए ठोस कदम सामने आने चाहिए. यही बात इस बयान को महत्वपूर्ण बनाती है. अगर अगला क्वाड शिखर सम्मेलन होता है और उसमें ठोस पहलों की घोषणा की जाती है, तो इससे समूह की व्यावहारिक भूमिका को गति मिल सकती है.

नेटवर्क18 के एड‍िटर इन चीफ राहुल जोशी को मार्को रूब‍ियो ने एक्‍सक्‍लूस‍िव इंटरव्‍यू दिया

चीन के लिए क्या है इस संकेत का मतलब?

क्वाड का रणनीतिक महत्व समझने के लिए हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. चीन की आर्थिक और सैन्य शक्ति, समुद्री गतिविधियां और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया की अपनी-अपनी चिंताएं हैं. ऐसे में क्वाड इन देशों को आपसी सहयोग बढ़ाने और क्षेत्रीय मुद्दों पर साझा दृष्टिकोण विकसित करने का मंच देता है.

अगर क्वाड की अगली बैठक में ठोस सहयोग की घोषणा होती है, तो यह चीन को संकेत दे सकता है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चारों देशों के बीच समन्वय जारी है. खास तौर पर समुद्री क्षेत्र में जानकारी साझा करने, महत्वपूर्ण तकनीकों, सुरक्षित आपूर्ति श्रृंखलाओं और आर्थिक सहयोग के क्षेत्रों में प्रगति का व्यापक रणनीतिक असर हो सकता है.

भारत के लिए क्वाड का महत्व इसलिए भी है कि वह अमेरिका के साथ सहयोग बढ़ाते हुए अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखना चाहता है. भारत के अपने आर्थिक और सुरक्षा हित हैं और वह अलग-अलग देशों के साथ अपने संबंधों को उन्हीं हितों के आधार पर आगे बढ़ाता है. क्वाड में सक्रिय भागीदारी इसी व्यापक विदेश नीति का एक हिस्सा है.

भारत के लिए टैरिफ पर राहत की उम्मीद

रूबियो ने भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर भी सकारात्मक संकेत दिए. उन्होंने कहा कि बातचीत अब कुछ तकनीकी बारीकियों तक पहुंच गई है और समझौते को पूरा होने में महीनों के बजाय कुछ हफ्ते लगने की उम्मीद है. उन्होंने यह भी साफ किया कि किसी समझौते की घोषणा तभी होनी चाहिए, जब दोनों पक्ष उसके सभी विवरणों और कानूनी भाषा पर सहमत हों.

यह टिप्पणी इसलिए अहम है, क्योंकि ट्रेड और टैरिफ के मुद्दे हाल के महीनों में दोनों देशों के रिश्तों में तनाव का कारण रहे हैं. भारत चाहता है कि अमेरिकी बाजार में उसके निर्यात को प्रतिस्पर्धी परिस्थितियां मिलें, जबकि अमेरिका भी भारतीय बाजार में अपने उत्पादों और कंपनियों के लिए अधिक अवसर चाहता है.

रूबियो ने कहा कि व्यापार समझौते का उद्देश्य मौजूदा परिस्थितियों से बेहतर दरें हासिल करना होना चाहिए. साथ ही उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि लंबे समय तक टिकने वाला समझौता दोनों देशों के हित में होना जरूरी है. इसका अर्थ है कि समझौते की सफलता केवल टैरिफ में कटौती से नहीं, बल्कि बाजार तक पहुंच, कारोबार की स्थिरता और दोनों पक्षों को मिलने वाले लाभ से भी तय होगी.

रूस से तेल खरीद पर क्या बोले रूबियो?

भारत-अमेरिका संबंधों में रूस से तेल खरीद का मुद्दा भी महत्वपूर्ण रहा है. नेटवर्क18 के एडिटर इन चीफ राहुल जोशी ने जब इंटरव्यू में सवाल उठाया कि अमेरिका रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर टैरिफ और प्रतिबंधों का दबाव डालता है, जबकि खुद अमेरिका भी ऊर्जा कीमतों और घरेलू जरूरतों को देखते हुए फैसले लेता है.

तो रूबियो ने जवाब में कहा कि रूस पर प्रतिबंध लगाना केवल रूस को प्रभावित नहीं करता, बल्कि उन देशों पर भी असर डाल सकता है जो उसके साथ कारोबार करते हैं. उन्होंने बताया कि अमेरिकी प्रशासन को यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में दबाव बनाने और उसके वैश्विक आर्थिक प्रभावों के बीच संतुलन साधना पड़ता है. उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने हालिया विधायी प्रावधानों के तहत राष्ट्रीय सुरक्षा छूट का इस्तेमाल किया, ताकि प्रस्तावित अतिरिक्त टैरिफ और प्रतिबंध तत्काल लागू न हों.

इससे संकेत मिलता है कि अमेरिकी प्रशासन भी प्रतिबंधों के आर्थिक परिणामों को ध्यान में रख रहा है. भारत जैसे बड़े ऊर्जा उपभोक्ता के लिए तेल की उपलब्धता, कीमत और आपूर्ति के स्रोतों में विविधता बेहद महत्वपूर्ण हैं. वहीं, अमेरिका रूस पर आर्थिक दबाव बनाए रखने के अपने उद्देश्य को भी छोड़ना नहीं चाहता.

अमेरिका को समझ आ गई भारत की अहमियत

भारत को लेकर कही गई रूबियो की बातें यह जरूर दिखाती हैं कि अमेरिका भारत के साथ संबंधों को केवल एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रखना चाहता. व्यापार, ऊर्जा, हिंद-प्रशांत सहयोग और उच्चस्तरीय कूटनीति… इन सभी क्षेत्रों में आगे बढ़ने की इच्छा दिखाई देती है.

रूबियो ने भारत को बड़े और महत्वपूर्ण देश के रूप में वर्णित किया और कहा कि अमेरिका को भारत के विभिन्न क्षेत्रों को समझने के लिए यहां बार-बार आना चाहिए. उन्होंने मुंबई को भारत की वित्तीय धड़कन बताते हुए कहा कि यहां कई ऐसी कंपनियां हैं जो अमेरिका के साथ निवेश और कारोबार करती हैं. यह टिप्पणी भारत के आर्थिक महत्व को लेकर अमेरिकी नजरिये को भी सामने लाती है.

यह भी गौर करने वाली बात है कि रूबियो ने जयशंकर के साथ अपने कामकाजी संबंधों को सकारात्मक और मजबूत बताया. उनके मुताबिक, दोनों नेताओं ने कई संवेदनशील मुद्दों पर बातचीत की है और आपसी संवाद से आगे बढ़ने का रास्ता बनाया है.

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