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Gyanesh Kumar Case In Kerala: मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ केरल सरकार ने दो दशक पुराना केएसटीपी भ्रष्टाचार मामला फिर खोला है. विपक्ष के इस्तीफे की मांग के बीच विजिलेंस नए सबूतों की जांच कर रही है. लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इस मामले में कोई नया सबूत हाथ लगा है क्या जिसके आधार पर मामले को फिर से खोला जाए. इतना ही नहीं अगर यह मामला आगे बढ़ता है तो उस वक्त की एके एंटनी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार पर सवाल उठेंगे.
ज्ञानेश कुमार केरल कैडर के आईएएस हैं. अब राज्य सरकार उनके खिलाफ पुराने केस को फिर से खोल रही है.
Gyanesh Kumar Case In Kerala: निर्वाचन आयोग के कामकाज को लेकर सवालों में घिरे मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार से विपक्ष इस्तीफे की मांग कर रहा है. विपक्ष का आरोप है कि ज्ञानेश कुमार मनमाने ढंग से आयोग के फैसले ले रहे हैं जो संविधान और नीति सम्मत नहीं है. पिछले दिनों इंडियन एक्सप्रेस अखबार ने इसको लेकर एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसके बाद आयोग के भीतर अनबन की बात सामने आई थी. इसी के बाद मुख्य निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ विपक्ष आक्रामक है. इस बीच कांग्रेस शासित केरल में ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कथित भ्रष्टाचार का एक पुराना मामला खोला गया है. ज्ञानेश कुमार केरल कैडर के आईएएस अधिकारी हैं. वह केंद्र प्रतिनियुक्ति पर आने से पहले केरल में कई अहम विभागों में सचिव पद कार्यरत रहे हैं.
केरल के मुख्यमंत्री वीडी सतीशन की सरकार ने करीब दो दशक पुरानी फाइल खोली है. पूरा मामला केरल स्टेट ट्रांसपोर्ट (केएसटीपी) के एक प्रोजेक्ट से जुड़ा है. उस वक्त ज्ञानेश कुमार लोकनिर्माण विभाग के सचिव थे. आरोप है कि प्रोजेक्ट से जुड़े ठेकेदार को भुगतान में ज्ञानेश कुमार के विभाग ने देरी की. इससे तंग आकर ठेकेदार ने आत्महत्या कर ली. उसने सुसाइड नोट में भी ज्ञानेश कुमार का नाम लिया था. लेकिन, बाद में विजिलेंस की जांच के बाद पूरा मामला बंद कर दिया. विजिलेंस ने कहा कि सबूतों के अभाव में जांच को आगे बढ़ाना संभव नहीं था. फिर अब दो दशक बाद केस खोलने के बाद नए सबूत कहां से आएंगे. ये बड़ा सवाल है. क्या केरल सरकार कोर्ट में यह साबित कर पाएगी कि उसके नए सबूत आए हैं जिसके आधार पर वह केस खोलना चाहती है. तीसरी बात यह कि उस वक्त केरल में एके एंटनी के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी. ऐसे में इस पूरे मामले की आंच अन्य किसी पर भी आ सकती है.
दो दशक बाद फिर क्यों खुली फाइल?
द डेक्कन हेराल्ड अखबार की एक रिपोर्ट के मुताबिक सरकार और विजिलेंस से जुड़े सूत्रों ने कहा कि केएसटीपी से जुड़े मामलों की जांच वर्षों पहले पूरी हो चुकी थी. अब विजिलेंस पहले यह पता लगाएगी कि क्या कोई नया सबूत या नया तथ्य सामने आया है, जिसके आधार पर जांच आगे बढ़ाई जा सकती है. यानी अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि ज्ञानेश कुमार के खिलाफ भ्रष्टाचार साबित करने की प्रक्रिया शुरू हो गई है. फिलहाल जांच का पहला सवाल ही यही है कि पुराने मामले को दोबारा खोलने का आधार क्या है.
क्या है ज्ञानेश कुमार से जुड़ा आरोप?
केएसटीपी में ठेके देने और भुगतान में देरी को लेकर आरोप लगाए गए थे. इसी प्रोजेक्ट से जुड़े एक मलेशियाई कंपनी अधिकारी ली सी बीन का भी मामला सामने आया था, जिसने 2006 में मलेशिया में आत्महत्या की थी. रिपोर्टों में दावा किया गया कि उसने सुसाइड नोट में ज्ञानेश कुमार का नाम लिया था. हालांकि, उपलब्ध जानकारी के मुताबिक केरल की जांच एजेंसियों के पास इस सुसाइड नोट को लेकर कोई औपचारिक जानकारी होने की पुष्टि नहीं है. इसलिए इस दावे को स्थापित तथ्य की तरह नहीं देखा जा सकता. पुरानी जांच में भी आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं मिले थे.
अब सबसे बड़ा सवाल- नया सबूत कहां है?
करीब दो दशक बाद जांच फिर खोलने की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि नए सबूत कहां से आएंगे. अगर कोई नया दस्तावेज, गवाह या अन्य महत्वपूर्ण सामग्री सामने आई है तो उसकी विश्वसनीयता और पुराने जांच निष्कर्षों पर उसके असर को साबित करना होगा. यही तय करेगा कि मामला वास्तव में आगे बढ़ता है या फिर शुरुआती जांच के बाद ही बंद हो जाता है.
कांग्रेस के लिए कैसे उल्टा पड़ सकता है दांव?
इस फैसले में कांग्रेस सरकार के लिए राजनीतिक जोखिम भी है. अगर जांच में ज्ञानेश कुमार के खिलाफ ठोस सबूत मिलते हैं तो कार्रवाई का आधार मजबूत होगा. लेकिन अगर नए सबूत नहीं मिलते या पुराने आरोप ही दोहराए जाते हैं तो सरकार पर राजनीतिक बदले की कार्रवाई के आरोप लग सकते हैं. दूसरा खतरा इससे बड़ा है. अगर केएसटीपी में अनियमितताओं के नए सबूत मिलते हैं तो सवाल सिर्फ ज्ञानेश कुमार तक सीमित नहीं रहेगा. प्रोजेक्ट से जुड़े दूसरे अधिकारियों और उस समय के राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका की जांच की मांग भी उठ सकती है. उस वक्त केरल में एके एंटनी के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार थी और एमके मुनीर लोक निर्माण मंत्री थे. प्रोजेक्ट को लेकर उनके खिलाफ भी आरोप लगे थे. यानी पुरानी फाइल खोलने का फैसला अगर आगे बढ़ता है तो इसकी आंच कई दूसरे लोगों तक पहुंच सकती है.
नजर विजिलेंस की प्रारंभिक जांच पर
फिलहाल विजिलेंस यह देखेगी कि मामले को दोबारा खोलने के लिए पर्याप्त नया आधार मौजूद है या नहीं. आगे की कार्रवाई उसी पर निर्भर करेगी. इसलिए फिलहाल सबसे अहम सवाल ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आरोप नहीं, बल्कि दो दशक पुराने मामले में नया क्या मिला है—यह है. अगर नया सबूत मजबूत है तो जांच आगे बढ़ सकती है. अगर ऐसा नहीं है तो यही मामला कांग्रेस सरकार के लिए कानूनी और राजनीतिक चुनौती बन सकता है.
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पत्रकारिता की दुनिया में करीब 23 साल का अनुभव. देश-दुनिया से लेकर कारोबार तक की खबरों पर लगातार नजर. खबर को सिर्फ सूचना के तौर पर नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपी कहानी और उसके असर के साथ समझने की कोशिश. यही पहचान है…
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