नरेंद्र मोदी ने 2024 के लोकसभा चुनाव में सीटें घटने के बाद से जो कमबैक किया है, उसमें महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली, असम, बिहार, बंगाल… सब सेट कर दिया. लेकिन अब उनके सामने सबसे बड़ा चैलेंज है उत्तर प्रदेश. और यूपी चुनाव के ठीक पहले योगी-शाह की तस्वीरों से मेसेज क्लीयर दे दिया गया है कि बीजेपी में कोई अंदरुनी लड़ाई ना है और ना चलेगी. सबको मिलकर यूपी जीतने पर फोकस करना है. यानी बीजेपी एक टीम की तरह लड़ने को तैयार है, लेकिन इंडी की दिक्कत ये है कि ये बातें तो बड़ी बड़ी करते हैं, लेकिन चुनाव आता है तो एक टीम होकर लड़ ही नहीं पाते. यूपी चुनाव आते कांग्रेस-सपा भिड़ने लगे हैं. हालांकि अखिलेश का पीडीए रथ मैदान में आ चुका है, लेकिन उसका पहिया कांग्रेस की सियासी चाल के गड्ढे में ना फंस जाए इसका भी डर है. उधर ओवैसी से लेकर मायावती तक अलग तैयारी कर रहे है. एक चैलेंज वैसे और है. इस हफ्ते राज्यसभा की 10 सीटों के चुनाव का ऐलान हुआ, 16 अक्टूबर को वोटिंग होगी और उसके ठीक बाद 11 MLC सीटों का चुनाव भी होना है. यानी विधानसभा चुनाव से पहले ही यूपी में नंबर गेम और गठबंधन का टेस्ट शुरू हो चुका है.
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है. देश की सबसे बड़ी सियासी प्रयोगशाला यानी यूपी में सत्ता की चाबी पाने के लिए भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी , बहुजन समाज पार्टी और ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन अपने-अपने दांव पेंच के साथ रणभूमि में उतर चुके हैं. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कुछ घंटे पहले प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी से मिल चुके हैं. इसके अलावा सीएम योगी का अमित शाह के साथ मीटिंग करना, जेपी नड्डा के साथ यूपी चुनाव 2027 को लेकर तैयारियों पर बात करना. ये सब साबित करता है कि 2024 के लोकसभा नतीजों के बाद बीजेपी ने यूपी में अपनी रणनीति पूरी तरह बदल दी है. पार्टी का मुख्य ध्यान किसी भी तरह के आंतरिक मतभेद को खत्म कर एक जुट होकर मैदान में उतरना है. वहीं समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव रायबरेली से अपने PDA रथ को हरी झंडी दिखाकर मैदान संभाल चुके हैं. मायावती 2027 में 2007 वाले अपने उस फॉर्मूले को दोहराना चाहती हैं. उधर असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM यूपी के चुनावी समर में तीसरा या चौथा कोण बनाने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है. हम शुरुआत करते बीजेपी से जिसने तैयारी, रणनीती और चुनाव के माइक्रो मैनेजमेंट में बाकी दलों को पछ़ाड़ना शुरू कर दिया है.
2027 का महासंग्राम शुरू, तैयारियों को लेकर तैयार त्रिमूर्ति!
दिल्ली के 7 लोक कल्याण मार्ग पर हुई ताजा बैठक केवल एक औपचारिक मुलाकात नहीं थी. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आमने-सामने की बातचीत ने 2027 के महासमर की पहली चाल तय कर दी है. इसके साथ ही गृह मंत्री अमित शाह और जेपी अड्डा के साथ योगी की बैठकों का दौर ये साफ संदेश देता है कि बीजेपी के भीतर किसी भी तरह का आंतरिक मतभेद ना तो है और न ही बर्दाश्त किया जाएगा. एक टीम, एक एजेंडा और एक ही लक्ष्य लखनऊ पर फिर से भगवा परचम फहराना.
सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा, ‘जो लोग दंगा करवाते थे, दंगाइयों और माफियाओं के सामने घुटने टेकते थे. दंगाइयों को मुख्यमंत्री आवास पर बुलाकर सम्मानित करते थे. जिनके लोग पहले वसूली में मस्त रहते थे, वो इसको बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे और इसीलिए आपसे मैं कह रहा हूं, ये फिर से समाज को बांटने का काम करेंगे.’
PM मोदी से मिले योगी, 2027 का मास्टर प्लान तैयार?
दिल्ली में प्रधानमंत्री आवास पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ये उच्चस्तरीय बैठक केवल एक औपचारिक मुलाकात नहीं थी. ये उत्तर प्रदेश की राजनीति में आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव और उससे ठीक पहले होने वाले दो बड़े चुनावी टेस्ट के लिए मास्टर प्लान तैयार करने की बैठक थी.
2024 के लोकसभा नतीजों के बाद यूपी को लेकर बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व कोई भी जोखिम लेने के मूड में नहीं है. इस लंबी बैठक में आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव की रणनीतिक योजना के साथ-साथ तुरंत होने जा रहे राज्यसभा की 10 सीटों और विधान परिषद यानि MLC की 11 सीटों के चुनावों पर विस्तृत मंथन हुआ है. यह बैठक ये साफ संदेश देती है कि 2027 की लड़ाई के लिए बीजेपी की शीर्ष कमान हर चाल को दिल्ली से लखनऊ तक पूरी तरह से समन्वय के साथ आगे बढ़ा रही है.
2027 से पहले पहला बड़ा टेस्ट?
राज्यसभा चुनाव की पूरी टाइमलाइन और सीटों का गणित को समझ लीजिए. 2027 के रण से पहले उत्तर प्रदेश में नंबर गेम का पहला बड़ा लिटमस टेस्ट 16 अक्टूबर को होने जा रहा है. राज्यसभा चुनाव की पूरी समय-सीमा और आंकड़े समझिए…
- चुनाव अधिसूचना- 29 सितंबर 2026
- नामांकन की अंतिम तिथि – 6 अक्टूबर 2026
- नामांकन वापसी की तारीख- 9 अक्टूबर 2026
- मतदान एवं मतगणना- 16 अक्टूबर 2026
सीटों का मौजूदा समीकरण
खाली हो रही 10 सीटों में से 8 सीटें भारतीय जनता पार्टी, 1 सीट समाजवादी पार्टी और 1 सीट बहुजन समाज पार्टी के पास हैं. बीजेपी के जिन प्रमुख नेताओं का कार्यकाल खत्म हो रहा है. उनमें हरदीप सिंह पुरी, अरुण सिंह, नीरज शेखर, बृजलाल, बीएल वर्मा, गीता शाक्य और सीमा द्विवेदी शामिल हैं. इसके अलावा डॉ. दिनेश शर्मा द्वारा अंडमान-निकोबार का उपराज्यपाल बनाए जाने के बाद इस्तीफा देने से एक अतिरिक्त सीट खाली हुई है.
संख्याबल के हिसाब से बीजेपी के पास 7 से 8 सीटें निकालने का स्पष्ट बहुमत है, लेकिन 10वीं सीट पर क्रास वोटिंग और विपक्षी दलों की चालों को बेअसर करने पर पीएम मोदी और सीएम योगी के बीच ठोस रणनीति बनी है. राज्यसभा के ठीक बाद उत्तर प्रदेश की 11 विधान परिषद यानी MLC सीटों पर भी चुनाव की घोषणा हो चुकी है, जिसके बाद चुनाव आयोग ने संबंधित इलाकों में तत्काल प्रभाव से आचार संहिता लागू कर दी है.
यूपी सरकार के मंत्री मनोज पांडेय ने कहा, ‘ये मुलाकात ही उत्तर प्रदेश को और विकास की ओर लेना जाने का है. ये मुलाकात है भारत के प्रधानमंत्री जी और माननीय मुख्यमंत्री जी की, मुख्यमंत्री जी ने कहा कि समाजवादी पार्टी गिनती जाए कि हम कितने नौजवानों को नौकरियां देंगे.’
MLC चुनाव की टाइमलाइन और आंकड़े भी 2027 के चुनावी गणित में अपना गहरा असर दिखा सकते हैं. इन 11 सीटों का वर्तमान गणित ये है कि इनमें से 8 सीटों पर बीजेपी का कब्जा है और 3 सीटें समाजवादी पार्टी के पास हैं. बीजेपी ने पहले ही अपने 5 प्रत्याशियों के नामों पर काम तेज कर दिया है. स्नातक और शिक्षक कोटे की ये सीटें सीधे तौर पर राज्य के पढ़े-लिखे युवाओं, शिक्षकों और मध्यम वर्ग का मूड तय करेंगी- जो 2027 के चुनाव से पहले बीजेपी के लिए अपना प्रभाव साबित करने की बड़ी कसौटी है.
BJP के खिलाफ अखिलेश का दांव
अक्टूबर में होने वाले इन दोनों चुनावों में 100% सफलता हासिल करके बीजेपी विपक्ष के नैरेटिव और मनोबल को तोड़ना चाहती है. दिल्ली से मिले इस नए रोडमैप के बाद अब यूपी में संगठन और सरकार मिलकर 2027 की निर्णायक जंग को फतह करने के लिए पूरी ताकत झोंकने जा रहे हैं. लेकिन इस बीच अखिलेश यादव को लगता है कि अगर साल 2027 में उनका फॉर्मुला 27000 वोट हिट हुआ, तो बाजी पलटी जा सकती है. लेकिन इसके लिए सबसे जरूरी है कि जेन-जी वोटरों को कौन ज्यादा लुभा पाता है.
अखिलेश यादव का PDA रथ मैदान में जरूर उतर चुका है, लेकिन इस रथ की राह में चुनौतियां कम नहीं हैं. सबसे बड़ा डर यह है कि कहीं कांग्रेस की सियासी महत्वाकांक्षा और सीट-शेयरिंग के पेंच में इस रथ का पहिया न फंस जाए. अखिलेश का 27,000 वोट प्रति सीट का गणित तब तक काम नहीं कर सकता, जब तक विरोधी वोटों का बिखराव पूरी तरह न रुके. कांग्रेस नेता और एसपी नेता इस मुद्दे पर बिल्कुल अलग-अलग दावे कर रहे हैं.
सपा सांसद इकरा हसन कहती हैं, ‘अगर उत्तर प्रदेश में कोई व्यक्ति ऐसा है, जो BJP को हरा तो वो सिर्फ अखिलेश यादव जी हैं, कांग्रेस अपने दम पर कुछ कर नहीं पाएगी.’ वहीं कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने इस पर कहा, ‘ठीक है न, न करें, न कौन कह रहा है. हम क्या भीख मांग रहे हैं किसी से. जिसको जो करना है, वो करे भाई. क्या है न, जब बारात चलती है, बहुत सारे ढोल बजाने वाले भी होते हैं, नाचने-गाने वाले भी होते हैं.’
अब ऐसे हालात में एसपी औऱ कांग्रेस बीजेपी से कैसे मुकाबला करेंगे. ये वाकई में देखना वाला नजारा होगा. फिलहाल बीजेपी ने एसपी के सभी फॉर्मुलों का काट निकालना शुरू कर दिया है और एसपी-कांग्रेस के गठबंधन को लेकर जोर-अजमाइश हो रही है, उस पर भी बीजेपी ने पलटवार शुरू कर दिए हैं.
इधर दूसरी तरफ घटते वोट शेयर के बीच मायावती 2027 में 2007 वाले अपने उस फॉर्मूले को दोहराना चाहती हैं, जिसने उन्हें अपने दम पर पूर्ण बहुमत दिलाया था. बीएसपी का मुख्य एजेंड़ा सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय, बसपा शासनकाल की कानून-व्यवस्था का दौर और दलितों-वंचितों के अधिकारों की रक्षा करन है. बीएसपी का तर्क है कि नातो बीजेपी और ना ही सपा दलितों और पिछड़ों की असली हमदर्द हैं.
सपा के शासन में गुंडागर्दी और बीजेपी में दलित उत्पीड़न बढ़ने का आरोप बसपा लगाती है. किसी बड़े गठबंधन या शोर-शराबे वाले मोर्चे के बिना मायावती कैडर मीटिंग्स और आकाश आनंद की युवा केंद्रित मुहिम से अपने पारंपरिक वोट बैंक यानि जाटव दलित को एकजुट रख रही हैं. सतीश चंद्र मिश्रा के जरिये ब्राह्मण समाज को एक बार फिर बसपा के पाले में लाने की कोशिश और मुस्लिम-दलित-ब्राह्मण का नया समीकरण गढ़ना.
कुल मिलाकर अब देखना होगा कि बीजेपी 2027 के चुनाव से पहले राज्यसभा और एमएलसी चुनाव में अपने विरोधियों को चारों खाने चित कैसे करती है और विपक्ष को ये साबित करना होगा कि उसने बीजेपी से मिल रही लगातार हारों से बहुत कुछ सीख लिया है, और वो बाजी पलट सकती है.

