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ECI-SIR Row: चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर हालिया विवाद के बीच अब मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया भी सुप्रीम कोर्ट के सवालों के घेरे में है. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में तीन सदस्यीय आयोग के भीतर फैसलों को लेकर मतभेद और दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों का जिक्र हुआ, जिसके बाद आयोग ने सभी फैसलों को पूर्ण आयोग की सर्वसम्मत मंजूरी से लिया गया बताया. इसी बीच 2023 के नियुक्ति कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की पीठ में मतभेद सामने आया. जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कानून में कार्यपालिका की भूमिका और चुनाव आयोग की स्वतंत्रता से जुड़े सवाल उठाए, जबकि जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने मामले को बड़ी बेंच के पास भेजने का पक्ष लिया.
चुनाव आयोग के अंदर मतभेद की खबर सामने आने के बाद ज्ञानेश कुमार विपक्ष के निशाने पर हैं. (फोटो -पीटीआई)
अगर मतदाता सूची में आपका नाम दो जगह है तो आपने दो बार मतदान किया होगा और कानूनी अपराध किया होगा. मेरे सारे मतदाताओं को अपराधी बताना और चुनाव आयोग शांत रहे. संभव नहीं है. हलफनामा देना होगा या देश से माफी मांगनी होगी, तीसरा विकल्प नहीं है. यही कहते हुए ज्ञानेश कुमार गरजे थे जब महाराष्ट्र के नतीजों के बाद राहुल गांधी ने आरोप लगाया था कि जहां भी चुनाव होते हैं वहां अचानक वोटर कैसे बढ़ जाते हैं. वही ज्ञानेश कुमार अब शांत हैं. चुनाव आयोग के कामकाज पर इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के बाद लगातार दबाव बढ़ता जा रहा है. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट से ये सामने आया कि कैसे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार अपने बाकी दो चुनाव आयुक्तों की सुनते तक नहीं. जब खबर आग की तरह फैली तो एक शांत प्रेस नोट आया कि ये अंदरूनी लोकतंत्र की खूबसूरती है और सारे फैसले मिलजुल कर हुए. इस रिपोर्ट के अगले ही दिन सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल उठा दिए. जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ आपस में सहमत नहीं हुई. मामले को चीफ जस्टिस सीजेआई सूर्यकांत के पास भेज दिया, जहां से ये शायद संवैधानिक पीठ के पास चला जाए लेकिन जस्टिस दत्ता ने पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठा दिए. उन्होंने पूरे चार चोटें की हैं पूरी व्यवस्था पर और ये एक तरह से केंद्र सरकार पर हैं. सुप्रीम कोर्ट 2023 के उस कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी जिसके तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की जाती है.
सारा का सारा मामला इस पर है कि कैसे मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति सिर्फ और सिर्फ केंद्र सरकार कर सकती है. क्योंकि इसमें जो मीटिंग्स होती हैं उसमें प्रधानमंत्री के द्वारा एक चुना हुआ मंत्री केंद्रीय मंत्री और लोकसभा में विपक्ष का नेता होता है. ऐसे में तो विपक्ष का नेता अकेला पड़ जाएगा. मंत्री और प्रधानमंत्री हमेशा साथ होंगे. और नियुक्ति में हमेशा सरकार की चलेगी. जस्टिस दीपांकर दत्ता का मानना था कि इसको पांच जजों की पीठ के पास भेजने की जरूरत ही नहीं है. ये दो जजों की पीठ भी सुन सकती है. लेकिन सतीश चंद्र शर्मा ने कहा कि नहीं-नहीं, इसको बड़ी बेंच के पास भेजा जाए.
चुनाव आयोग के मसले पर जस्टिस दत्ता के सवाल (एआई)
जस्टिस दीपांकर दत्ता का फैसला
खैर जस्टिस दीपांकर दत्ता का फैसला थोड़ा सा महत्वपूर्ण है और यह सीधे सरकार पर हमला करती है. जस्टिस दत्ता ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने 2023 के अनूप बरनवाल मामले में यह तय कर दिया कि चुनाव आयोग की नियुक्तियों पर सरकार का एकछत्र अधिकार नहीं होगा. अब अदालत को केवल यह देखना था कि क्या 2023 का कानून इस सिद्धांत का पालन करता है या नहीं करता. इसके लिए पांच जजों के संविधान पीठ की जरूरत ही नहीं है. वर्तमान पीठ भी इस पर सुनवाई कर सकती है. और जो चयन समिति का ढांचा है उस पर जस्टिस दत्ता ने चार सवाल उठाए.
- कैबिनेट मंत्री कैसे निष्पक्ष हो सकता है. कैबिनेट मंत्री तो अपने प्रधानमंत्री के खिलाफ जाकर फैसला ही नहीं ले सकता. क्योंकि वो सामूहिक जिम्मेदारी के नियम से बंधा हुआ है.
- विपक्ष का नेता केवल यहां दिखावा है क्योंकि दो- एक का बहुमत सरकार के पास है और विपक्ष के नेता की मौजूदगी एक दिखावा होकर रह जाती है. उन्होंने क्रिकेट के अंपायर का उदाहरण दिया. समझाया कि जैसे क्रिकेट मैच में अगर जीतने वाली टीम का कप्तान अंपायर चुनेगा तो अंपायर कैसे फैसला देगा? उसका हर फैसला संदेह की छाया में रहेगा.
- परसेप्शन टेस्ट- यह भी कभी नहीं होना चाहिए कि जनता को लगे कि हमारा जो चुनाव आयोग संवैधानिक व्यवस्था के तहत बना हुआ मजबूत स्तंभ है, वो एकतरफ़ा कोई काम करता है.
- जस्टिस दत्ता ने कॉलेजियम प्रणाली से तुलना को भी खारिज किया. उन्होंने बताया कि जजों की नियुक्ति में कई एजेंसियां काम करती है. खुफिया रिपोर्ट सरकार देती है. सरकार नाम आगे बढ़ाती है. तो यह कहना कि जज ही जज नियुक्त करते हैं, ठीक नहीं है. और दूसरी बात जजों की नियुक्ति में और पूरे देश के लोकतंत्र को चलाने वाली संस्था में नियुक्ति की तुलना ज्यादा करना ठीक नहीं है.
सीईसी की नियुक्ति कैसे होती है?
अब सवाल उठता है कि चुनाव आयोग में कमिश्नर्स और चीफ इलेक्शन कमिश्नर की नियुक्ति होती कैसे है? तो संविधान के अनुच्छेद 324 में इसकी व्यवस्था की गई है और कहा गया कि संसद इसके लिए कानून बनाए लेकिन 1950 से लेकर और 2023 तक 73 साल में कोई कानून नहीं बना और वही बरनवाल मामला है जिसकी सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 2023 में अंतरिम व्यवस्था बनाई. इसके तहत चीफ जस्टिस, पीएम और विपक्ष के नेता चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करेंगे. ये व्यवस्था तभी तक कायम रहनी थी जब तक कि केंद्र सरकार संविधान की व्यवस्था के मुताबिक कानून न बना ले.
1993 में चुनाव आयोग बहु सदस्यीय कैसे बना था. इसे ग्राफ से समझ सकते हैं. (एआई)
लेकिन जब सरकार ने दिसंबर 2023 में कानून बनाया, तो चयन समिति से चीफ जस्टिस की छुट्टी हो गई और मंत्री की एंट्री हो गई. इसी के खिलाफ कोर्ट में याचिका दाखिल की गई है. इसमें कोई दो राय नहीं कि पहले भी कांग्रेस की सरकारों ने चुनाव आयोग का बेजा इस्तेमाल किया. टीएन शेषन जो बाद में मुख्य चुनाव आयुक्त बने उन्होंने इंटरव्यू में बोला था कि जब वह कैबिनेट सेक्रेटरी थे तो राजीव गांधी बताते थे कि चुनाव कब होंगे और आयोग वही घोषणा करता था.
टीएन सेशन का दौर
वही टीएन सेशन जब चुनाव आयुक्त के तौर पर 1993 में अपनी मर्जी से और स्वतंत्रता से काम करना शुरू करते हैं तो पीवी नरसिंह राव सरकार को दिक्कत हो जाती है. एक अध्यादेश के जरिए चुनाव आयुक्तों की संख्या तीन कर दी जाती है. एक मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्त. अगर मतभेद हों तो बहुमत से फैसला किया जाए. तब जीवीजी कृष्णमूर्ति और एमएस गिल नए चुनाव आयुक्त बनाए गए थे. मुख्य चुनाव आयुक्त और बाकी आयुक्तों का पद वेतन और शक्तियां भी बराबर रखी गई थी. तो इस लिहाज से आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण है कि अदालत की कसौटी पर यह जो ढांचा है और ज्ञानेश कुमार का जो एकतरफ़ा राज चल रहा है वह कितना न्यायसंगत बैठता है.
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Alok Kumar is a senior journalist and digital media leader with over two decades of experience across television, radio, and digital news platforms. He currently serves in a leadership role at News18 Hi…
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