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किराया कानून : अगर आप कोई संपत्ति किराये पर लेने जा रहे तो इस बात ध्यान रखें कि उसकी लीज डीड को बनवाने के बाद पंजीकृत जरूर कराएं. बिना पंजीकरण वाली लीज डीड को कानूनी दस्तावेज के रूप में मान्यता नहीं दी जाएगी. यह फैसला एनसएलएटी ने एक विवाद में सुनाया है.
लीज डीड को पंजीकृत कराना जरूरी होता है.
नई दिल्ली. अगर आप किराये पर मकान या दुकान लेने जा रहे और उसकी लीज भी बनवा ली है तो एक जरूरी बात हमेशा ध्यान रखनी होगी. राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) ने स्पष्ट कर दिया है कि बिना पंजीकरण के कोई भी लीज मान्य नहीं होगी. साथ ही अपीलीय न्यायाधिकरण ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि किसी कंपनी का लिक्विडेटर बिना किराया नियंत्रण कानून के तहत अलग-अलग कार्यवाही किए भी संपत्तियों पर कब्जा ले सकता है. उसके पास संपत्ति को खाली कराने का अधिकार होता है.
लिक्विडेटर उस व्यक्ति को कहा जाता है, जिसे कोर्ट या एनसीएलटी की ओर से किसी संपत्ति विवाद के निपटारे के लिए नियुक्त किया जाता है. एनसीएलएटी की दो-सदस्यीय पीठ ने लुधियाना की दो कंपनियों ड्यूक फैशन्स और यूवीएंडडब्ल्यू प्रोडक्ट्स की अपील खारिज करते हुए इस मामले में राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) की चंडीगढ़ पीठ के आदेश को बरकरार रखा है.
क्या है अपीलीय न्यायाधिकरण का आदेश
राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) ने कहा है कि किसी कंपनी के लिक्विडेटर को कॉरपोरेट देनदार की संपत्तियों पर कब्जा लेने के लिए किराया नियंत्रण कानून के तहत अलग कार्यवाही करने की जरूरत नहीं है और वह सीधे एनसीएलटी के जरिये संपत्ति खाली करा सकता है.एनसीएलटी ने दोनों कंपनियों को कराबारा और हुसैनपुरा स्थित दो वाणिज्यिक संपत्तियां दो सप्ताह के भीतर खाली करने का निर्देश दिया था.
क्यों नहीं मानी लीज डीड
दोनों कंपनियों ने इस आदेश को अपीलीय न्यायाधिकरण में चुनौती देते हुए कहा था कि 30 साल के पट्टा विलेख (लीज डीड) के तहत उन्हें किरायेदारी का अधिकार हासिल है और बेदखली की कार्यवाही 1949 के ईस्ट पंजाब अर्बन रेंट रिस्ट्रिक्शन एक्ट के तहत किराया नियंत्रक के समक्ष ही की जा सकती है. हालांकि, एनसीएलएटी ने यह दलील खारिज कर दी. उसने कहा कि संबंधित लीज डीड पंजीकृत नहीं थीं, लिहाजा उन्हें साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता. न्यायाधिकरण ने यह भी कहा कि दोनों अपीलकर्ता कंपनियों के निदेशक कॉरपोरेट देनदार के निलंबित निदेशकों के करीबी रिश्तेदार थे.
क्या कहता है आईबीसी कानून
अपीलीय न्यायाधिकरण ने कहा कि दिवाला एवं ऋणशोधन अक्षमता कानून (आईबीसी) की धारा 35 के तहत कॉरपोरेट देनदार की संपत्तियों पर कब्जा लेना परिसमापक का अनिवार्य वैधानिक दायित्व है. आईबीसी की धारा 238 का अन्य कानूनों पर ज्यादा प्रभाव है. यह मामला वीनस गारमेंट्स (इंडिया) से संबंधित है. कंपनी को एनसीएलटी की चंडीगढ़ पीठ ने कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (सीआईआरपी) में लिया था और बाद में 22 जुलाई, 2025 को उसके परिसमापन का आदेश दिया गया था.
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प्रमोद कुमार तिवारी को शेयर बाजार, इन्वेस्टमेंट टिप्स, टैक्स और पर्सनल फाइनेंस कवर करना पसंद है. जटिल विषयों को बड़ी सहजता से समझाते हैं. अखबारों में पर्सनल फाइनेंस पर दर्जनों कॉलम भी लिख चुके हैं. पत्रकारि…
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