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क्या किसी इंसान का साफ रंग, सुगठित शरीर, घुंघराले बाल या अंग्रेजी में बातचीत करना यह साबित करता है कि वह दलित नहीं हो सकता? मद्रास हाईकोर्ट ने इस बेहद संकीर्ण और रूढ़िवादी सोच को सिरे से खारिज करते हुए एक नजीर पेश करने वाला फैसला दिया है. अदालत ने जिला स्तरीय सतर्कता समिति के उस विवादित फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें कस्टम विभाग के एक रिटायर्ड असिस्टेंट कमिश्नर के हिंदू आदि द्रविड़ जाति प्रमाण पत्र को अमान्य ठहरा दिया गया था.
मद्रास हाईकोर्ट ने सतर्कता समिति के फैसले की धज्जियां उड़ाईं. (एएनआई)
क्या किसी व्यक्ति का गोरा रंग, अच्छी कद-काठी, घुंघराले बाल या फर्राटेदार अंग्रेजी बोलना यह तय कर सकता है कि वह अनुसूचित जाति (एससी) का सदस्य नहीं हो सकता? मद्रास हाईकोर्ट ने इस बेतुके तर्क को सिरे से खारिज करते हुए एक ऐतिहासिक और कड़ा फैसला सुनाया है. अदालत ने जिला स्तरीय सतर्कता समिति के उस विवादित आदेश को पूरी तरह रद्द कर दिया है, जिसमें कस्टम विभाग के एक रिटायर्ड असिस्टेंट कमिश्नर के हिंदू आदि द्रविड़ जाति प्रमाण पत्र को सिर्फ उनके और उनके परिवार के शारीरिक रूप-रंग और भाषा के आधार पर अमान्य घोषित कर दिया गया था.
सतर्कता समिति के तर्कों पर अदालत की दो टूक
जिला सतर्कता समिति ने अपने अजीबोगरीब आदेश में दलील दी थी कि अधिकारी का परिवार दिखने में गोरा है, सदस्य लंबे और सुगठित शरीर वाले हैं, उनके बाल घुंघराले हैं और वे तमिल के साथ अच्छी अंग्रेजी बोलते हैं, इसलिए वे अनुसूचित जाति से नहीं हो सकते.
हाईकोर्ट ने इस सोच को पूरी तरह खारिज करते हुए साफ किया कि किसी की जाति या सामाजिक पहचान को बाहरी रंग-रूप, शारीरिक बनावट या शिक्षा और भाषा के आधार पर नहीं आंका जा सकता. अदालत ने सतर्कता समिति के उस मनमाने फैसले को खारिज करते हुए रिटायर्ड कस्टम अधिकारी के जाति प्रमाण पत्र की वैधता को बरकरार रखा है.
यह फैसला एम. रविकुमार की याचिका पर आया. जस्टिस डी. भास्करथा चक्रवर्ती ने कहा कि जिस तरह से आदेश में कारण बताए गए थे, उन्हें किसी एंथ्रोपोलॉजिस्ट (मानव-विज्ञानी) के मूल्यांकन का आधार नहीं बनाया जा सकता. कमेटी ने यह भी बताया कि याचिकाकर्ता के पिता ईसाई थे और उन्हें ईसाई कब्रिस्तान में दफनाया गया था. हाईकोर्ट ने कहा कि यह बात तो अहम होगी कि “याचिकाकर्ता हिंदू देवी-देवताओं को मानता है या ईसाई धर्म को”, लेकिन बताए गए दूसरे कारणों का “शायद कोई महत्व न हो”. कमेटी को आठ हफ्ते के अंदर जांच करके नया आदेश जारी करने का निर्देश दिया गया.
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राकेश रंजन कुमार को डिजिटल पत्रकारिता में 10 साल से अधिक का अनुभव है. न्यूज़18 के साथ जुड़ने से पहले उन्होंने लाइव हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, ज़ी न्यूज़, जनसत्ता और दैनिक भास्कर में काम किया है. वर्तमान में वह h…
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