जैसे ही एप्पल ने आईफोन-18 लांच किया. भारत में इसे लेने के लिए रात से ही युवाओं की लाइनें एप्पल स्टोरों के बाहर लग गईं. लोग इतने भक्ति-भाव से लाइनों में लगे रहे जैसे किसी देवता के दर्शन के लिए जाते हैं और बस एक ही लक्ष्य होता है कि आईफोन की लेटेस्ट सीरीज हाथ में आए और वे उसका फोटो खींचकर सोशल मीडिया पर अपलोड करें. जेन जी और कुछ मिलेनियल्स का ये व्यवहार क्या सच में किसी बीमारी का शिकार हो गया है, या फिर बात सिर्फ इतनी है कि, हाय राम! मेरा पड़ोसी न पहले खरीद ले, सबसे पहले बस मेरे हाथ में आईफोन आए….
इस बारे में न्यूज18 हिंदी ने दिल्ली के जाने माने साइकेट्रिस्ट और इहबास के प्रोफेसर डॉ. ओमप्रकाश से बात की है. उन्होंने बड़े साफ शब्दों में युवाओं की इस दीवानगी का सच उजागर किया है. आइए पढ़िए उन्होंने युवाओं में आईफोन के इस क्रेज और पागलपन को लेकर क्या बताया है.
आईफोन-18 के लिए लाइनें देखकर इतना आश्चर्य क्यों है. हर पीढ़ी में ये चीजें होती हैं. हर जेनरेशन में किसी न किसी चीज के लिए अलग क्रेज देखने को मिलता है. आपको शायद याद हो या नहीं, लेकिन एक समय था जब साइकिल के लिए भी ऐसा ही क्रेज था लोगों में. कई ब्रांडों की साइकिलें खरीदने के लिए दुकानों के बाहर लंबी लाइनें ही नहीं लगती थीं बल्कि लोग कई कई दिनों तक चक्कर काटते रहते थे, तब जाकर चीजें पाते थे.
इसके बाद मारुति कार का भी ऐसा ही रोमांच लोगों में देखने को मिला. फिर टाइटन की घड़ियों का दौर आया. लोग दीवानों की तरह टाइटन की घड़ियां खरीदने के लिए उतावले रहते थे. टाइटन की दुकानें सीमित होती थीं लेकिन लोगों की भारी मांग के चलते लंबा इंतजार भी करना पड़ता था.
घरों में टेलीफोन लगवाने के लिए भी ऐसा ही मंजर था. कनेक्शन लेने के लिए लंबी लाइनों में हम भी लगे हैं. घरवालों से बात करने के लिए एसटीडी बूथ के बाहर की लंबी कतारें तो मिलेनियल्स को याद ही होंगी. तो यह तय इससे होता है कि आपके लिए क्या कीमती है, क्या महत्वपूर्ण है, किसे आप अपने जीवन में सबसे ज्यादा महत्व दे रहे हैं. उसके प्रति क्रेज होना लाजिमी है.
नव धनाड्य वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित
डॉ. ओमप्रकाश कहते हैं कि नए-नए पैसे वाले बने युवाओं में आईफोन ही नहीं बल्कि ब्रांडेड और एक से एक महंगे शूज आदि को लेकर भी जबर्दस्त क्रेज है. ये बहुत ही दिलचस्प है कि जेन जी कहें या जेन जी से थोड़ी सी पहले की जेनरेशन जो उसी लाइन पर खड़ी होती है, उसमें यह खासतौर पर देखा जा रहा है.
70 के दशक से चालू हुआ था ये क्रेज
चीजों के प्रति क्रेज 70 के दशक के आसपास शुरू हुआ था, जब मध्यम वर्ग का अपर स्टेज आया, यानि मध्यम वर्ग के जिस हिस्से में पैसा आया, वहां से ये शौक बनना शुरू हो गए. घड़ी, गाड़ी, ब्रांडेड चीजें जो अब जेन जी में आईफोन जैसे क्रेज की तरफ बढ़ गया है.
आज सोशल मीडिया भी बढ़ा रहा ये चीजें
आज ट्विटर आदि पर ट्रेंड चलते हैं. लोग आईफोन लेकर सेल्फी डालते हैं और इसमें खुशी महसूस करते हैं कि जो किसी के पास अभी नहीं है, वे उनके पास है. यानि वही दीवानगी और एक तरह का क्षणिक सुख वे इसमें महसूस करते हैं.
क्या युवाओं को कोई बीमारी है?
डॉ. ओमप्रकाश कहते हैं कि असल में आईफोन के इस क्रेज में कोई बड़ी साइकोलॉजी या साइकेट्रिक फैक्टर नहीं है, बल्कि यह एक परिपाटी है या लोगों का स्वभाव है जो थ्रिल और रोमांच की तरफ तेजी से आकर्षित हो रहा है. आईफोन 18 एक थ्रिल है जो कंपनी हर साल लांच करके और सीमित मात्रा में लोगों को देकर इसे बनाए रखती है और इसमें युवा आ ही जाते हैं क्योंकि यह मानव स्वभाव है. यह सामान्य व्यवहार है कि वे ऐसी चीजों की तरफ आकर्षित होते हैं. कंपनियां इसी परिपाटी का फायदा उठाकर चलती हैं.
आजादी के समय अलग ही थी कहानी
डॉ. बताते हैं कि उनकी दादी कहती थीं कि जैसा आज हाल है, ऐसा ही हाल आजादी के समय में एक रुपये के सिक्के के लिए था. जैसे ही बाजार में एक रुपये का सिक्का आया, लोग उसे बचाकर रखते थे, सालों तक खर्च ही नहीं करते थे. यह भी एक तरह का थ्रिल था कि लोग उसे अपने पास रखकर सुख लेते थे और खर्च नहीं करते थे.
तो यह जेन जी की कोई बीमारी नहीं है. सिर्फ चीजें बदल गई हैं. लोगों के शौक और क्रेज वही हैं और ऐसा आगे भी चलता रहेगा. कल को कुछ और चीजें आएंगी और उनका क्रेज होगा. समय है ये बढ़ता जाएगा.

