Last Updated:
Lakhimpur news: लखीमपुर खीरी जिले में स्थित दुधवा नेशनल पार्क अपनी समृद्ध जैव विविधता, घने जंगलों, दलदली क्षेत्रों और दुर्लभ वन्यजीवों के लिए देश-दुनिया में अलग पहचान रखता है. यहां बाघ, तेंदुआ, हाथी, गैंडा, हिरन, बारहसिंगा और सैकड़ों प्रजातियों के पक्षियों के साथ-साथ हजारों छोटे जीव-जंतु भी जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत बनाने में अपनी भूमिका निभाते हैं. दुधवा नेशनल पार्क में दीमक के टीले जंगल के इकोसिस्टम के लिए फायदेमंद हैं. ये मिट्टी की उर्वरता बढ़ाते हैं और सांपों को आश्रय देते हैं.
उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में स्थित दुधवा नेशनल पार्क अपनी समृद्ध जैव विविधता, घने जंगलों, दलदली क्षेत्रों और दुर्लभ वन्यजीवों के लिए देश-दुनिया में अलग पहचान रखता है. यहां बाघ, तेंदुआ, हाथी, गैंडा, हिरन, बारहसिंगा और सैकड़ों प्रजातियों के पक्षियों के साथ-साथ हजारों छोटे जीव-जंतु भी जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत बनाने में अपनी भूमिका निभाते हैं.
दीमक मिट्टी, सूखी लकड़ियों और पेड़-पौधों के अवशेषों को विघटित करने में अहम भूमिका निभाती हैं इससे जैविक पदार्थ मिट्टी में वापस पहुंचते है और मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में मदद मिलती है दीमक द्वारा बनाए गए बिल और सुरंगें मिट्टी में हवा और पानी के आवागमन को भी प्रभावित करती हैं
आमतौर पर घरों, लकड़ी या खेतों में दीमक का नाम आते ही लोग इसे नुकसान पहुंचाने वाले कीट के रूप में देखते हैं लकड़ी के सामान को नुकसान पहुंचाने वाली दीमक से लोग अक्सर परेशान रहते हैं परंतु जंगल की प्राकृतिक परिस्थितियों में दीमक की भूमिका इससे बिल्कुल अलग है,
Add News18 as
Preferred Source on Google
जंगल में हर साल बड़ी मात्रा में पत्तियां, टहनियां, पेड़ों की छाल, सूखी लकड़ियां और दूसरे जैविक पदार्थ जमीन पर गिरते हैं. यदि इन पदार्थों का प्राकृतिक रूप से विघटन न हो तो जंगल की जमीन पर इनका लगातार ढेर बढ़ता जाएगा. दीमक इन जैविक पदार्थों को तोड़ने और उनके विघटन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में मदद करती है. इससे पोषक तत्व धीरे-धीरे मिट्टी में वापस पहुंचते हैं और जंगल के पेड़-पौधों को प्राकृतिक रूप से पोषण मिलता रहता है.
दुधवा के जंगल में दिखाई देने वाले दीमक के टीले केवल दीमकों के रहने की जगह नहीं हैं. इनका निर्माण एक जटिल प्रक्रिया के तहत होता है दीमक मिट्टी, लार और जैविक पदार्थों की मदद से अपनी संरचनाएं तैयार करती हैं इनके भीतर कई सुरंगें, रास्ते और कक्ष होते हैं, जिनमें दीमकों की कॉलोनी रहती हैं. जमीन के ऊपर बना हिस्सा केवल उस संरचना का एक भाग होता है.
दीमक के टीले, यह न सिर्फ देखने में दिलचस्प लगते हैं बल्कि जंगल के पूरे पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) के लिए बेहद फायदेमंद भी साबित हो रहे हैं. दुधवा नेशनल पार्क के अंदर इन टीलों की लंबाई 5 से 20 फीट तक पाई जाती है. दूर से देखने पर ये ठोस पहाड़ी जैसे लगते हैं, लेकिन वास्तव में ये काफी भुरभुरे और हल्के होते हैं. बरसात और आंधी-तूफान में भी ये मजबूती से टिके रहते हैं. इन टीलों की संरचना इस तरह से होती है कि इसके अंदर रहने वाले दीमकों तक हवा और ऑक्सीजन आसानी से पहुंच सके.
बरसात के मौसम में जब जंगल में पानी भर जाता है, तो कई सांप इन टीलों के अंदर शरण ले लेते हैं. इनकी खोखली और सुरक्षित संरचना सांपों के लिए आदर्श घर साबित होती है. यही कारण है कि कई बार सैलानी इन टीलों के आसपास सांपों को भी देख लेते हैं. यह दृश्य पर्यटकों के लिए रोमांच और जिज्ञासा दोनों बढ़ा देता है.

