नई दिल्ली: वंदे मातरम पर कांग्रेस ने जिस तरह दो स्टैंजा तक अपनी बात सीमित की, उससे विवाद खत्म होने के बजाय और फैल गया. पार्टी शायद यह सोच रही थी कि 1937 के फैसले और स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत का हवाला देकर मामला संभल जाएगा. लेकिन राजनीति में कुछ फैसले कागज पर जितने आसान दिखते हैं, जमीन पर उतने ही उलझ जाते हैं. खासकर तब, जब सामने राष्ट्रगीत जैसा भावनात्मक मुद्दा हो. कांग्रेस के भीतर से ही अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या पार्टी ने खुद को ऐसे मुद्दे में फंसा लिया, जहां बीजेपी को हमला करने का आसान मौका मिल गया. इसी बीच राहुल गांधी का पैलेट गन मामले में पीड़ित छात्र साहिल के साथ थाने पहुंचना चर्चा का नया केंद्र बन गया है.
यहां सवाल पैलेट गन की जांच की जरूरत पर नहीं है. अगर किसी छात्र को चोट लगी है तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी ही चाहिए और जिम्मेदारी तय होनी चाहिए. असली राजनीतिक सवाल यह है कि कांग्रेस के लिए यह मुद्दा अभी इतना जरूरी क्यों हो गया? संसद में राहुल गांधी पहले ही इस मामले को उठा चुके थे. लेकिन वंदे मातरम को लेकर पार्टी की घेराबंदी के तुरंत बाद सड़क से थाने तक इसका नया राजनीतिक फ्रेम सामने आया. यही टाइमिंग विपक्ष की रणनीति पर सवाल खड़े करती है. क्या कांग्रेस राष्ट्रगीत की बहस से निकलकर ऐसा मुद्दा चाहती है, जिसमें सरकार से जवाब मांगना उसके लिए ज्यादा आसान हो?
वंदे मातरम पर कांग्रेस का दांव उलटा पड़ा?
कांग्रेस ने अपने रुख के पीछे इतिहास का तर्क दिया. पार्टी ने 1937 के कांग्रेस कार्यसमिति के प्रस्ताव का हवाला दिया और कहा कि सार्वजनिक कार्यक्रमों में पहले दो अंतरों तक सीमित रहना स्वतंत्रता आंदोलन की परंपरा से जुड़ा है. तर्क अपनी जगह है, लेकिन मौजूदा राजनीति में संदेश ज्यादा तेजी से फैलता है. बीजेपी ने इसे तुरंत कांग्रेस की राष्ट्रवाद वाली राजनीति पर सवाल उठाने के मौके के रूप में इस्तेमाल किया. पार्टी के भीतर भी कुछ नेताओं को लगा कि इस मुद्दे को इतना बड़ा बनाने की जरूरत नहीं थी.
पैलेट गन पर राहुल का फोकस क्यों?
राहुल गांधी के लिए पैलेट गन का मुद्दा सरकार को घेरने का पुराना हथियार है. जंतर-मंतर प्रदर्शन में घायल छात्र साहिल को साथ लेकर थाने जाना इसे और धार देता है. शिकायत, मेडिकल जांच और FIR की मांग लोकतांत्रिक रूप से जायज सवाल हैं. लेकिन राजनीति में मुद्दे का असर सिर्फ मांग से नहीं, उसकी टाइमिंग से भी तय होता है. वंदे मातरम विवाद के बीच यह कदम कांग्रेस को एक नए नैरेटिव की तरफ ले जाता दिखता है.
क्या कांग्रेस को मुद्दा बदलने की जरूरत थी?
कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या यही है कि वह कई बार अपने विरोधी के तय किए हुए मैदान पर खेलने लगती है. वंदे मातरम पर उसे इतिहास, संविधान और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के आधार पर अपनी बात रखनी चाहिए थी. इसके बजाय बहस इतनी बढ़ गई कि पार्टी को सफाई देनी पड़ रही है. अब पैलेट गन का सवाल सामने लाकर ध्यान दूसरी तरफ मोड़ना रणनीतिक रूप से समझ में आता है, लेकिन इससे मूल विवाद खत्म नहीं होगा.
राहुल गांधी के सामने असली चुनौती सिर्फ बीजेपी को जवाब देना नहीं है. उन्हें यह भी तय करना होगा कि कांग्रेस जनता के बीच किस मुद्दे पर अपनी पहचान मजबूत करना चाहती है. छात्र, रोजगार, महंगाई, संस्थागत जवाबदेही और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दे विपक्ष के लिए लगातार उपलब्ध हैं. ऐसे में हर राजनीतिक संकट का जवाब किसी नए विवाद के जरिए देना पार्टी को बैकफुट में ही रख सकता है.
असली परीक्षा अब कांग्रेस की
पैलेट गन मामले में अगर पुलिस निष्पक्ष जांच करती है और साहिल की चोटों की वास्तविक वजह सामने आती है, तो यह गंभीर सार्वजनिक मुद्दा बनेगा. लेकिन कांग्रेस को वंदे मातरम पर भी स्पष्ट और स्थिर राजनीतिक लाइन रखनी होगी. एक मुद्दे से दूसरे मुद्दे पर छलांग लगाने से कुछ समय के लिए सुर्खियां बदली जा सकती हैं, राजनीतिक असहजता नहीं.

