सीकर. कहते हैं कि जब सेवा में सच्ची श्रद्धा जुड़ जाए तो वह सिर्फ मदद नहीं रहती, बल्कि पूजा का रूप ले लेती है. सीकर जिले के नीमकाथाना में ऐसा ही एक आश्रम है. इस आश्रम में भगवान के सामने अगरबत्ती और दीपक ही नहीं जलाया जाता है. इसके साथ साथ हर सुबह एक चिट्ठी भी लिखी जाती है. यह कोई आम चिट्ठी नहीं होती है, बल्कि उन 89 लोगों की जरूरतों की सूची होती है. जिन्हें अपना परिवार छोड़ चुका है या जिन्हें समाज के सहारे की जरूरत है. आश्रम परिवार का विश्वास है कि ठाकुरजी के नाम लिखी इस चिट्ठी में दर्ज जरूरतें समाज के किसी न किसी भामाशाह के सहयोग से पूरी हो जाती हैं.
नीमकाथाना स्थित श्री ज्ञानचंद मोदी अपना घर आश्रम में सुबह की शुरुआत एक अलग परंपरा से होती है. आश्रम में रहने वाले प्रभुजनों की रोजमर्रा की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए एक चिट्ठी तैयार की जाती है. आश्रम अध्यक्ष अशोक शर्मा ने बताया कि इसमें देशी घी, रिफाइंड, सरसों का तेल, आटा, दालें, मसाले, सूजी, दलिया, बिस्किट, मौसमी फल और दूसरी दैनिक उपयोग की वस्तुओं की मांग की जाती है. चिट्ठी तैयार होने के बाद आश्रम परिवार उसे ठाकुरजी के चरणों में समर्पित करता है.
89 प्रभुजनों के लिए रोज चलती है सेवा
इसके बाद शुरू होता है समाज के सहयोग का सिलसिला. अशोक शर्मा का कहना है कि जरूरत चाहे छोटी हो या बड़ी, चिट्ठी में लिखी सामग्री किसी न किसी रूप में उपलब्ध हो जाती है. यही विश्वास अब आश्रम की सेवा व्यवस्था का हिस्सा बन चुका है. आश्रम में वर्तमान में 89 प्रभुजन रह रहे हैं. इनमें 67 असामान्य व्यवहार वाले, 6 मंदबुद्धि, 2 अंगविहीन, 4 मूक-बधिर, 1 मिर्गी रोगी और 4 अन्य गंभीर बीमारियों से पीड़ित प्रभुजन शामिल हैं. इनके लिए आश्रम में सिर्फ रहने की व्यवस्था ही नहीं, बल्कि भोजन, देखभाल और दैनिक जरूरतों की पूर्ति का भी इंतजाम किया जाता है.
पिता की पुण्य स्मृति में दिया काउंटर
सबसे खास बात यह है कि यहां प्रतिदिन दो यूनिट भोजन सेवा संचालित होती है. यानी कई लोग अपने परिवार के विशेष अवसरों, पुण्यतिथि या अन्य मौकों को आश्रम के प्रभुजनों के साथ भोजन सेवा के रूप में मनाते हैं. बढ़ते जनविश्वास का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि श्राद्ध पक्ष की भोजन सेवा के लिए भी अग्रिम बुकिंग पहले ही हो चुकी है. हाल ही में सेवा के इसी भाव की एक और तस्वीर आश्रम में देखने को मिली. मुकेश रत्नाका और उनकी पत्नी कविता ने अपने पिता दिवंगत बजरंगलाल रत्नाका की पुण्य स्मृति में आश्रम के प्रभुजनों को भोजन करवाया. इसके साथ ही उन्होंने आश्रम को एक काउंटर भी भेंट किया.
10 गद्देदार कुर्सियां और भोजन सेवा भी दी
अशोक शर्मा ने बताया कि गुंगारा निवासी राकेश धीवा और उनकी पत्नी संतरा देवी ने भी आश्रम में सेवा का हाथ बढ़ाया. दंपती ने 10 गद्देदार कुर्सियां और एक यूनिट भोजन सेवा का सहयोग दिया. यहां के लोगों का मानना है कि सेवा का संस्कार केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता. जब परिवार साथ मिलकर किसी जरूरतमंद के लिए कुछ करता है तो सेवा की भावना अगली पीढ़ी तक पहुंचती है.
पांच प्रभुजन लौट चुके हैं सामान्य जीवन में
आश्रम की कहानी यहां रहने वाले प्रभुजनों की संख्या नहीं, बल्कि उनकी जिंदगी में आया बदलाव है. आश्रम के अनुसार यहां रह चुके पांच प्रभुजन पूरी तरह स्वस्थ होकर सामान्य जीवन में लौट चुके हैं. यानी यह स्थान केवल भोजन और आश्रय देने तक सीमित नहीं है. यहां किसी बेसहारा व्यक्ति को सम्मान, देखभाल और फिर से सामान्य जीवन की ओर लौटने का अवसर देने की कोशिश की जाती है. यही वजह है कि आश्रम से जुड़ी सेवा धीरे-धीरे सामाजिक जिम्मेदारी का रूप लेती जा रही है. आश्रम अध्यक्ष अशोक शर्मा ने कहा कि प्रभुजनों की सेवा समाज के सहयोग से ही लगातार आगे बढ़ रही है. आश्रम की जरूरतें बड़ी हैं, लेकिन समाज से मिलने वाला सहयोग इस सेवा को मजबूती देता है.

