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काला जीरा ठंडी जलवायु में उगाई जाने वाली एक लाभदायक मसाला फसल है. उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में इसकी खेती कम लागत में अच्छी आय का जरिया बन रही है. जानिए इसकी बुवाई, देखभाल, कटाई, बाजार भाव और खेती से जुड़ी जरूरी जानकारी.
काला जीरा ठंडी जलवायु में अच्छी तरह उगता है. उत्तराखंड के 1500 से 2800 मीटर तक की ऊंचाई वाले क्षेत्र इसकी खेती के लिए बेहतरीन माने जाते हैं. बागेश्वर, पिथौरागढ़, चमोली, उत्तरकाशी और रुद्रप्रयाग जैसे जिलों में इसकी खेती अच्छी मात्रा में होती है, हल्की धूप, ठंडा मौसम और अच्छी जल निकासी वाली भूमि पौधों के लिए अच्छी मानी जाती है. अधिक गर्मी या लंबे समय तक जलभराव फसल को नुकसान पहुंचा सकता है. इसलिए खेत का चयन सोच-समझकर करना चाहिए.
स्थानीय जानकार विमला दानू बताती है कि काला जीरा की खेती के लिए भुरभुरी और जैविक पदार्थों से भरपूर मिट्टी सबसे बेहतर रहती है. बुवाई से पहले खेत की 2 से 3 बार अच्छी तरह जुताई करनी चाहिए, ताकि मिट्टी मुलायम हो जाए, खेत में सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट मिलाने से उत्पादन बढ़ता है. पहाड़ी क्षेत्रों में इसकी बुवाई सितंबर से नवंबर के बीच की जाती है. बीजों को कतारों में उचित दूरी पर बोने से पौधों का विकास अच्छा होता है, निराई-गुड़ाई करने में भी आसानी रहती है.
काला जीरा ऐसी फसल है, जिसे बहुत अधिक पानी की जरूरत नहीं होती है. बुवाई के बाद मिट्टी में नमी बनाए रखना जरूरी है, लेकिन जलभराव बिल्कुल नहीं होना चाहिए. जरूरत के अनुसार हल्की सिंचाई पर्याप्त रहती है. समय-समय पर खरपतवार हटाना और खेत की सफाई करना जरूरी है, ताकि पौधों को पर्याप्त पोषण मिल सके. यदि पौधों में किसी प्रकार का रोग दिखाई दे, तो कृषि विशेषज्ञों की सलाह लेकर जैविक उपाय अपनाने चाहिए.
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काला जीरा की फसल 4 से 5 महीने में तैयार हो जाती है. जब पौधों के बीज पूरी तरह पककर गहरे रंग के दिखाई देने लगें, तब कटाई करनी चाहिए. कटाई के बाद पौधों को छाया में अच्छी तरह सुखाया जाता है, फिर बीज अलग किए जाते हैं. सही तरीके से सुखाने के बाद भंडारण करने से मसाले की गुणवत्ता बनी रहती है. अच्छी गुणवत्ता वाला काला जीरा बाजार में अधिक कीमत में बिकता है, और किसानों को अतिरिक्त लाभ मिलता है.
काला जीरा की मांग मसाला उद्योग, आयुर्वेदिक दवाओं और घरेलू उपयोग के चलते लगातार बनी रहती है. स्थानीय बाजारों के अलावा ऑनलाइन और थोक मंडियों में भी इसकी बिक्री होती है. गुणवत्ता के आधार पर इसकी कीमत लगभग 250 रुपये से 600 रुपये प्रति किलोग्राम तक मिल सकती है. यदि किसान साफ-सुथरी पैकिंग और ग्रेडिंग करें, तो उन्हें और बेहतर मूल्य मिल सकता है.
डॉ ऐजल पटेल बताते हैं कि काला जीरा केवल मसाला ही नहीं बल्कि औषधीय गुणों से भी भरपूर माना जाता है. इसमें एंटीऑक्सीडेंट, आयरन, कैल्शियम और कई उपयोगी पोषक तत्व पाए जाते हैं. इसका उपयोग पाचन सुधारने, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और कई पारंपरिक घरेलू नुस्खों में किया जाता है. इसकी मांग पूरे साल बनी रहती है. हालांकि किसी भी स्वास्थ्य समस्या के उपचार के लिए इसका उपयोग करने से पहले उचित सलाह लेनी जरूरी है.
काला जीरा की खेती में अन्य कई नगदी फसलों की तुलना में लागत कम आती है. यदि किसान अच्छी गुणवत्ता वाले बीज, जैविक खाद और वैज्ञानिक खेती की तकनीक अपनाएं, तो उत्पादन और मुनाफा दोनों बढ़ सकते हैं. पहाड़ी क्षेत्रों की छोटी जोत वाले किसान भी सीमित भूमि में इसकी खेती कर ज्यादा आय प्राप्त कर सकते हैं. कृषि विभाग समय-समय पर मसाला फसलों से संबंधित प्रशिक्षण और तकनीकी सलाह देता रहता है.
नई फसल की खेती शुरू करने से पहले स्थानीय कृषि विभाग, कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विशेषज्ञों से जानकारी लेना जरूरी है. अपने क्षेत्र की जलवायु, मिट्टी और उपलब्ध संसाधनों के अनुसार खेती की योजना बनानी चाहिए. प्रमाणित बीज का उपयोग, समय पर बुवाई, संतुलित पोषण और उचित भंडारण से बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है. यदि किसान समूह बनाकर उत्पादन और विपणन करें तो उन्हें बाजार में अधिक लाभ मिलने की संभावना रहती है.

