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Delayed Monsoon Paddy Farming Tips: मानसून में देरी से धान की खेती की चिंता सता रही है? कृषि विशेषज्ञों ने राजेंद्र श्वेता, स्वर्ण श्रेया जैसी मध्यम अवधि की किस्में सुझाईं. इनकी नर्सरी 70-75 दिनों में तैयार होती है. समय पर खेत की तैयारी, उचित जल प्रबंधन और वैज्ञानिक तरीके से खेती अपनाकर किसान मानसून की देरी के प्रभाव को काफी हद तक कम कर सकते हैं और अच्छी पैदावार प्राप्त कर सकते हैं.
भोजपुर: अगर इस बार मानसून की देरी ने आपकी धान की खेती की चिंता बढ़ा दी है, तो घबराने की जरूरत नहीं है. कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि किसान समय रहते सही किस्म का चुनाव कर अच्छी पैदावार हासिल कर सकते हैं. आइए जानते हैं ऐसे धान के प्रभेदों के बारे में, जो देर से मानसून आने की स्थिति में भी बेहतर विकल्प साबित हो सकते हैं. मानसून के देर से सक्रिय होने की स्थिति में किसानों को धान की बुवाई की रणनीति बदलने की सलाह दी जा रही है. कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसी परिस्थिति में मध्यम अवधि वाली धान की किस्में किसानों के लिए बेहतर विकल्प हैं.
इन किस्मों की नर्सरी विकल्प के तौर पर करें तैयार
इनमें राजेन्द्र श्वेता, स्वर्ण श्रेया, स्वर्ण समृद्धि, बी.पी.टी. 5204 और सम्पूर्णा जैसी किस्में प्रमुख हैं. किसान इन किस्मों की नर्सरी विकल्प के तौर पर तैयार कर सकते हैं, ताकि बारिश शुरू होते ही समय पर रोपाई की जा सके. इन धान की किस्मों की खास बात यह है कि इनकी नर्सरी लगभग 70 से 75 दिनों में तैयार हो जाती है. यही कारण है कि देर से मानसून आने पर भी किसान खेती का समय संतुलित कर सकते हैं. उत्पादन पर पड़ने वाले असर को काफी हद तक कम कर सकते हैं.
70-75 दिनों में तैयार होगी नर्सरी
इन धान की किस्मों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनकी नर्सरी लगभग 70 से 75 दिनों में तैयार हो जाती है. इससे किसानों को मौसम की अनिश्चितता के बावजूद खेती की योजना बनाने में आसानी होती है. यदि बारिश सामान्य से कुछ सप्ताह देर से भी होती है, तब भी इन किस्मों की मदद से बेहतर उत्पादन की संभावना बनी रहती है. विशेषज्ञों का कहना है कि नर्सरी तैयार करते समय बीज उपचार, संतुलित उर्वरक का प्रयोग और समय-समय पर सिंचाई एवं खरपतवार प्रबंधन का विशेष ध्यान रखना चाहिए. इससे पौधे स्वस्थ और मजबूत बनते हैं तथा रोपाई के बाद खेत में उनकी बढ़वार भी अच्छी होती है.
कृषि विशेषज्ञों से लें सलाह, होगी अच्छी पैदावार
इसके साथ ही किसान अपने क्षेत्र की मिट्टी और जलवायु के अनुसार कृषि विभाग या कृषि विज्ञान केंद्र के विशेषज्ञों से सलाह लेकर ही बीज का चयन करें. प्रमाणित बीजों का उपयोग करने से फसल की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों बेहतर होते हैं. समय पर खेत की तैयारी, उचित जल प्रबंधन और वैज्ञानिक तरीके से खेती अपनाकर किसान मानसून की देरी के प्रभाव को काफी हद तक कम कर सकते हैं और अच्छी पैदावार प्राप्त कर सकते हैं.
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