राजस्थान का प्रसिद्ध लोकगीत ‘आगे-आगे कोतल घोड़लो’ केवल एक गीत नहीं, बल्कि राजपूताना के इतिहास, शौर्य और अनोखी युद्धनीति की कहानी भी समेटे हुए है. कहा जाता है कि जोधपुर के महाराजा अभय सिंह ने जयपुर को बेचे गए 600 घोड़ों को पहले ही ढोल की थाप पर नाचने का प्रशिक्षण दे दिया था. युद्ध के दौरान ढोल बजते ही घोड़े लड़ने के बजाय नाचने लगे, जिससे जयपुर की सेना की रणनीति कमजोर पड़ गई. इसी ऐतिहासिक प्रसंग ने ‘कोतल घोड़ा’ को शाही परंपरा और राजस्थान की लोक संस्कृति में विशेष पहचान दिलाई.
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