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Nirjala Ekadashi Special: यह प्राचीन और अनूठा मंदिर धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र माना जाता है. विशेष रूप से निर्जला ग्यारस के अवसर पर यहां प्रदेश के विभिन्न जिलों से बड़ी संख्या में महिलाएं दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचती हैं. मंदिर से जुड़ी मान्यताओं के अनुसार यहां श्रद्धा से की गई प्रार्थना और व्रत से सुख, समृद्धि तथा परिवार की खुशहाली का आशीर्वाद प्राप्त होता है. यही कारण है कि हर वर्ष निर्जला ग्यारस पर यहां श्रद्धालुओं का विशाल जनसमूह उमड़ता है. मंदिर की प्राचीन वास्तुकला, ऐतिहासिक महत्व और धार्मिक परंपराएं इसे अन्य मंदिरों से अलग पहचान देती हैं. यह स्थल केवल पूजा-अर्चना का केंद्र नहीं, बल्कि राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का भी प्रतीक है.
भीलवाड़ा: आमतौर पर आपने राजस्थान में कई देवियों के मंदिर देखे होंगे लेकिन आज हम आपको निर्जला एकादशी के दिन एक ऐसी देवी मां के मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जो भीलवाड़ा में सबसे प्राचीन और इकलौता ग्यारस माता मंदिर है. पूरे साल में केवल एक दिन ऐसा आता है जब भीलवाड़ा ही नहीं बल्कि पूरे राजस्थान से श्रद्धालु, विशेष तौर पर महिलाएं, ग्यारस माता के दर्शन करने के लिए पहुंचती हैं. भीलवाड़ा में निर्जला एकादशी के अवसर पर प्राचीन ग्यारस माता मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखने को मिल रही हैं. महिलाओं ने पूरे दिन निर्जल रहकर व्रत किया और फल, छाता, नारियल औऱ जल से भरे मिट्टी के कलश माता को अर्पित कर पूजा-अर्चना की. मंदिर परिसर में कलश स्थापना के साथ दान-पुण्य, ठंडाई वितरण और धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए गए.
मंदिर पुजारी दीपक पराशर ने में बताया कि निर्जला एकादशी है यह एकादशी पूरे साल भर में एक बार आती है. इस एकादशी को 24 एकादशी के समान माना जाता है. मान्यता है कि निर्जला एकादशी रखने से साल भर की ग्यारस का लाभ एक साथ मिल जाता है. निर्जला एकादशी के दिन महिलाएं पूरे दिन निर्जल रहकर व्रत करती है और ग्यारस माता मंदिर में फल, छाता, पंखा, मिट्टी का कलश में पानी भरकर और नारियल लेकर आती है और माता रानी को अर्पित करती है. महिलाओं द्वारा आज के दिन दान पुण्य का कार्य भी किया जाता है. निर्जला एकादशी करने से 12 महीने के एकादशी का फल प्राप्त होता है. महिलाओं को जीते जी सुख शांति धन की प्राप्ति होती है और मरने के बाद मोक्ष की प्राप्ति होती है.
महिलाएं परिक्रमा करती हुई नजर आती
यह राजस्थान का सबसे पुराना प्राचीन मंदिर है. यहां पर पूरे राजस्थान से श्रद्धालु दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं यहां पर जयपुर, दूदू, जोधपुर, बारा, कोटा, किशनगढ़, अजमेर, उदयपुर लगभग पूरे राजस्थान से श्रद्धालु पहुंचते हैं. आज के दिन कलश स्थापना की गई है और मंदिर परिसर में ही दान पुण्य और ठंडाई वितरण का कार्य किया जा रहा है. मंदिर परिसर में एक अग्निकुंड बना हुआ है जहां पर अखंड ज्योति जलती रहती है. मान्यता है कि इस अग्निकुंड की परिक्रमा करने से महिलाओं की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं इसलिए यहां पर महिलाएं परिक्रमा करती हुई नजर आती हैं.
वहीं दूसरी तरफ श्रद्धालु एकता पाराशर और शकुंतला देवी ने कहा कि निर्जला एकादशी हिंदू का सबसे बड़ा त्योहार माना जाता है. यह एक ऐसी एकादशी है, जिसमें साल भर की 24 ग्यारस का लाभ एक निर्जला एकादशी में मिलता है. इस दिन महिलाएं निर्जल रहकर माता की उपासना करती है और कथा सुनती है जिस घर में सुख समृद्धि और शांति बनी रहती है.
जलदान और सेवा का विशेष महत्व
निर्जला एकादशी पर जल, शरबत, मटका, छाता, पंखा, फल औऱ अन्य शीतल पेय पदार्थों का दान अत्यंत पुण्यकारी माना गया है. मान्यता है कि इस दिन किया गया दान अक्षय फल प्रदान करता है औऱ भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है. गर्मी के मौसम में प्यासे लोगों को जल पिलाना और जरूरतमंदों की सेवा करना भी इस व्रत का महत्वपूर्ण अंग माना गया है.
क्यों कहलाती है भीमसेनी या पांडव एकादशी
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार महाभारत काल में पांडवों में भीमसेन नियमित रूप से सभी एकादशी व्रत नहीं रख पाते थे. तब महर्षि वेदव्यास ने उन्हें केवल ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की निर्जला एकादशी का व्रत रखने का उपदेश दिया. इसी कारण यह एकादशी भीमसेनी एकादशी, भीम एकादशी और पांडव एकादशी के नाम से भी प्रसिद्ध है.
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