लखनऊ के अलीगंज में सोमवार को जो भयावह फायर हादसा हुआ, वो बहुत दर्दनाक है. 15 युवा स्टूडेंट्स की मौत हो गई. बेशक अभी ये मामला कुछ दिनों तक गर्म रहे लेकिन ऐसे बड़े हादसों में भी न्याय की रफ्तार सुस्त होती चली जाती है. आमतौर पर निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक अंतिम फैसला आने में इतना लंबा समय लग जाता है कि न्याय का मतलब ही खत्म हो जाता है. गुजरात के सूरत में 7 साल पहले एक कोचिंग सेंटर में आग से 22 बच्चों की मौत हो गई. तब पूरा देश इससे हिल गया, अब शायद ही किसी को वो अग्निकांड याद हो.
सूरत तक्षशिला कोचिंग सेंटर में सात साल पहले जिस तरह से भीषण आग में 22 छात्रों की मौत हो गई थी. उस खबर ने तब पूरे देश को हिलाकर रख दिया था. मीडिया में ये हादसा खूब छाया रहा. सूरत का तक्षशिला अग्निकांड भारत के इतिहास की सबसे दर्दनाक घटनाओं में एक है. पीड़ित परिवार आज भी इंसाफ के लिए निचली अदालत के चक्कर काट रहे हैं
24 मई 2019 को सूरत के एक कोचिंग सेंटर में शॉर्ट सर्किट से आग लगी, जिसमें 22 छात्रों की मौत हो गई. 7 साल बाद भी स्थानीय अदालत में अभी केस का ट्रायल (सुनवाई) चल रहा है. पीड़ित माता-पिता न्याय के लिए भटक रहे हैं. उन्होंने थक-हारकर अदालती कार्यवाही को तेज करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका तक दायर की है. सभी आरोपी जमानत पर बाहर हैं. ऐसे केसों में देरी के पीछे कानूनी दांव-पेंच तो होते ही हैं. गवाह मुकर जाते हैं.
अग्निकांड के बाद क्या हुआ
हादसे के बाद देशभर में भारी आक्रोश फैला, पुलिस और प्रशासन ने कड़ी कार्रवाई शुरू की. सूरत पुलिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए 4,271 पन्नों की एक विशाल चार्जशीट कोर्ट में दाखिल की.
पुलिस ने इस मामले में कुल 14 मुख्य आरोपियों को गिरफ्तार किया था. इनमें कोचिंग क्लास का संचालक, बिल्डिंग के बिल्डर्स मालिक, सूरत नगर निगम और बिजली विभाग के 8 सरकारी अधिकारी शामिल थे, जिन्होंने रिश्वत लेकर या लापरवाही बरतते हुए इस अवैध निर्माण को हरी झंडी दी थी.
जांच में सामने आया कि बिल्डिंग की चौथी मंजिल पर प्लास्टिक के डोम (गुंबद) और टायरों का इस्तेमाल करके अवैध रूप से कोचिंग चलाई जा रही थी. आग लगने पर नीचे उतरने वाली सीढ़ी भी लकड़ी की बनी थी, जिसने तुरंत आग पकड़ ली और बच्चों के भागने का रास्ता बंद हो गया.
आरोपी जेल से बाहर कैसे आए
कानूनी प्रक्रिया के तहत, भारत में किसी भी आरोपी को ट्रायल पूरा होने तक अनिश्चितकाल के लिए जेल में नहीं रखा जा सकता. बशर्ते मामला आतंकवाद या देशद्रोह का न हो. गिरफ्तारी के कुछ महीनों और सालों के भीतर सभी 14 आरोपी एक-एक करके गुजरात हाई कोर्ट और स्थानीय अदालतों से जमानत पर बाहर आ गए.
पीड़ित परिवारों का सबसे बड़ा दर्द ये भी रहा कि जो भ्रष्ट सरकारी अधिकारी इस अवैध बिल्डिंग को चलाने के लिए जिम्मेदार थे, वो ना केवल जमानत पर बाहर हैं, बल्कि उनमें से कई को सरकारी नौकरी पर वापस बहाल भी कर दिया गया.
ये मामला अब तक ट्रायल में ही क्यों लटका
सूरत की अदालत में इस केस की कछुआ चाल के पीछे कई बड़े कारण हैं, जो हमारे कानूनी सिस्टम की खामियों को उजागर करते हैं.
1. फास्ट ट्रैक कोर्ट’ का न होना – पीड़ित माता-पिता ने शुरुआत से ही मांग की थी कि 22 बच्चों की मौत के इस संवेदनशील मामले को ‘फास्ट ट्रैक मोड’ में चलाया जाए और रोजाना सुनवाई हो. इस केस को सामान्य अदालत में ही चलाया जा रहा है, जहां हर सुनवाई के बीच एक-एक महीने का लंबा अंतराल होता है.
2. मुख्य गवाहों और जांच अधिकारियों की अनुपस्थिति – हालिया अदालती कार्यवाहियों में ये बात सामने आई है कि पुलिस जांच टीम के कई महत्वपूर्ण अधिकारी और सरकारी गवाह तय तारीखों पर कोर्ट में पेश ही नहीं हो रहे हैं. गवाहों के न आने से सुनवाई बार-बार टल जाती है. हाल ही में कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए पेश न होने वाले पुलिस अफसरों के खिलाफ जमानती वारंट तक जारी किए.
3. गवाहों की लंबी सूची – 4,000 से अधिक पन्नों की चार्जशीट में सैकड़ों गवाह हैं. कोर्ट ने पहले मृत बच्चों के माता-पिता और चश्मदीदों के बयान दर्ज किए, जिसमें सालों लग गए. अब जाकर सरकारी अधिकारियों और जांच दल के बयान दर्ज होने की प्रक्रिया शुरू हो पाई है.
4. कानूनी दांव-पेंच – आरोपियों के महंगे वकीलों ने शुरुआत में खुद को बरी कराने के लिए ‘डिस्चार्ज याचिकाएं’ दायर कीं. जब वे याचिकाएं खारिज हुईं, तो उन्होंने ऊपरी अदालतों का रुख किया. इन अपीलों और कानूनी बारीकियों के चक्कर में मुख्य ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही लंबे समय तक थमी रही.
न्याय के लिए माता-पिता की आखिरी लड़ाई
थक-हारकर, अपनी बेटी को खोने वाले एक पीड़ित पिता दिनेश केवडिया ने दिसंबर 2025 में देश की सर्वोच्च अदालत में एक जनहित याचिका दायर की. इस याचिका में उन्होंने मांग की है कि तक्षशिला जैसे मामले जिनमें सामूहिक मौतें होती हैं, उनके लिए समय-बद्ध सुनवाई की सीमा तय की जाए. पूरे देश में ‘नेशनल बिल्डिंग कोड’ और ‘डिजास्टर मैनेजमेंट प्रोटोकॉल’ को सख्ती से लागू किया जाए.
सुप्रीम कोर्ट ने इस पर गुजरात सरकार को नोटिस भी जारी किया लेकिन जमीनी स्तर पर सूरत की कोर्ट में आज भी केस की रफ्तार बेहद धीमी है. ये हालत दिखाती है कि हादसों के बाद प्रशासनिक मुस्तैदी और नेताओं के बड़े-बड़े वादे तो तुरंत देखने को मिलते हैं, लेकिन जब बात कोर्ट में दोषियों को सजा दिलाने की आती है, तो पीड़ित परिवार सिस्टम के आगे बिल्कुल अकेले पड़ जाते हैं.
दिल्ली उपहार सिनेमा कांड (1997)
अंतिम फैसला आने में 18-20 साल लगे. घटना 13 जून 1997 को बॉर्डर फिल्म के शो के दौरान ट्रांसफॉर्मर में शॉर्ट सर्किट से आग लगी, जिसमें 59 लोगों की मौत हुई थी. निचली अदालत ने 10 साल बाद 2007 में फैसला सुनाया. हाई कोर्ट का फैसला 2008 में आया. सुप्रीम कोर्ट से मुख्य दोषियों की सजा और जुर्माने पर अंतिम मुहर लगते-लगते 2015-2017 आ गया. यानी पीड़ितों को इंसाफ के लिए 18 से 20 साल लड़ना पड़ा.
मुंबई कमला मिल्स पब फायर (2017)
9 साल बाद भी केस लंबित है. ये घटना दिसंबर 2017 में रूफटॉप रेस्टोरेंट में आग लगने से हुई, जिसमें 14 लोगों की मौत हो गई. घटना के 9 साल बीत जाने के बाद भी केस के आरोपी कानूनी बारीकियों का फायदा उठाकर जमानत पर बाहर घूम रहे हैं और केस में गवाहियों और आरोपों को तय करने की प्रक्रिया में ही बरसों निकल गए.
अदालतों में मामला इतना लंबा क्यों खिंचता है?
– तारीख पर तारीख. जांच रिपोर्ट दाखिल होने के बाद आरोपी पक्ष के वकील कभी गवाहों की गैरमौजूदगी, तो कभी दस्तावेजों की स्क्रूटनी के नाम पर लगातार नई तारीखें मांगते हैं.
– डिस्चार्ज एप्लिकेशन. ट्रायल शुरू होने से पहले ही आरोपी अदालत में अर्जी लगा देते हैं कि उनके खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं है, इसलिए उन्हें केस से बरी कर दिया जाए. इस अर्जी पर सुनवाई और फैसले में ही 2-3 साल बर्बाद हो जाते हैं.
– अगर निचली अदालत आरोपियों की जमानत याचिका खारिज करती है या उनके खिलाफ आरोप तय करती है, तो वे तुरंत हाई कोर्ट चले जाते हैं. हाई कोर्ट से राहत न मिलने पर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया जाता है. इस चक्कर में मुख्य ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही महीनों के लिए रुक जाती है.
– सरकारी गवाहों और अफसरों का तबादला. ऐसे मामलों में बिजली विभाग, फायर ब्रिगेड और पुलिस अफसर मुख्य गवाह होते हैं. नौकरी में होने के कारण उनका तबादला दूसरे शहरों में हो जाता है, जिससे उनकी गवाही दर्ज कराने के लिए समन तामील होने में सालों लग जाते हैं.

