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Agriculture Tips : जयपुर के चिमनपुरा गांव के किसान विक्रम यादव ने कम पानी वाली अजोला घास की खेती से आय बढ़ाई, पशुओं का स्वास्थ्य और दूध उत्पादन सुधरा, यह मॉडल जल संकट क्षेत्रों के लिए प्रेरणा बना. विक्रम बताते हैं कि उनके परिवार की 12 एकड़ कृषि भूमि पर पहले गेहूं, जौ और चना जैसी पारंपरिक फसलें उगाई जाती थीं. लेकिन ट्यूबवेल का जलस्तर लगातार गिरने और सिंचाई की समस्या बढ़ने से उत्पादन प्रभावित होने लगा.
जयपुर. जयपुर जिले के चौमूं क्षेत्र के चिमनपुरा गांव में युवा किसान विक्रम यादव अनोखे तरीके से खेती कर रहे हैं. उन्होंने साबित कर दिया है कि खेती में सफलता केवल बड़े संसाधनों से नहीं, बल्कि सही सोच और नई तकनीक अपनाने से भी हासिल की जा सकती है. विक्रम पशुओं के लिए वरदान मानी जाने वाली अजोला घास की खेती कर रहे हैं. उनका कहना है कि यह खेती पारंपरिक फसलों की तुलना में अधिक आसान और मुनाफेदार है.
उन्होंने बताया कि गांव में लगातार भूजल स्तर गिरता जा रहा था. पारंपरिक खेती में अधिक पानी की जरूरत होती है. इसी समस्या के समाधान की तलाश में उन्होंने यूट्यूब पर अजोला घास की खेती के बारे में देखा और इसे अपनाने का निर्णय लिया. आज उनका यह प्रयोग न केवल उनकी आय बढ़ा रहा है, बल्कि आसपास के किसानों के लिए भी प्रेरणा बन गया है.
एक एकड़ भूमि पर लगाया अजोला घास का प्लांट
विक्रम बताते हैं कि उनके परिवार की 12 एकड़ कृषि भूमि पर पहले गेहूं, जौ और चना जैसी पारंपरिक फसलें उगाई जाती थीं. लेकिन ट्यूबवेल का जलस्तर लगातार गिरने और सिंचाई की समस्या बढ़ने से उत्पादन प्रभावित होने लगा. ऐसे में उन्होंने वर्ष 2022 में एक एकड़ भूमि पर अजोला घास का प्लांट लगाया. शुरुआत में यह एक छोटा प्रयोग था, लेकिन इसके परिणाम उम्मीद से कहीं बेहतर रहे. इससे उनका उत्साह बढ़ा और उन्होंने इसका दायरा बढ़ाना शुरू कर दिया.
अजोला की खेती में पानी की खपत बेहद कम
विक्रम ने बताया कि अजोला की खेती में पानी की खपत बेहद कम होती है. खेत में एक छोटा गड्ढा बनाकर उसमें प्लास्टिक की तिरपाल बिछाई जाती है. इसके बाद मिट्टी और वर्मी कम्पोस्ट का मिश्रण डालकर अजोला विकसित किया जाता है. उन्होंने शुरुआत में केवल 10 किलो बीज खरीदे थे, लेकिन अब हर 15 दिन में 50 किलो से अधिक अजोला तैयार हो रहा है. एक क्यारी तैयार करने में करीब 2 से 3 हजार रुपए की लागत आती है, जबकि इससे तैयार घास को बेचकर 10 हजार रुपए से अधिक की आय प्राप्त हो जाती है.
पशुओं के लिए फायदेमंद है अजोला
विक्रम ने बताया कि अजोला खेती का सबसे बड़ा फायदा पशुपालन में देखने को मिला है. उनके पास 18 से अधिक होल्स्टीन नस्ल की गायें हैं. उनका कहना है कि अजोला खिलाने के बाद पशुओं के स्वास्थ्य में सुधार हुआ है और दूध उत्पादन भी बढ़ा है. पहले जहां पशुओं के लिए अतिरिक्त कैल्शियम और पोषक आहार खरीदना पड़ता था, वहीं अब अजोला उनकी पोषण संबंधी जरूरतों को काफी हद तक पूरा कर रहा है. विक्रम प्रतिदिन करीब 30 किलो अजोला अपनी गायों को खिलाते हैं और शेष उत्पादन बाजार में बेच देते हैं. कम लागत, कम पानी और बेहतर आय के कारण अजोला की खेती अब उनके लिए अतिरिक्त आमदनी का मजबूत स्रोत बन चुकी है. जल संकट वाले क्षेत्रों में यह मॉडल किसानों के लिए लाभदायक विकल्प साबित हो रहा है.
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आनंद पाण्डेय वर्तमान में News18 हिंदी (राजस्थान डिजिटल) में बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. पिछले 5 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाते हुए उन्होंने राजनीति, अपराध और लाइफ…और पढ़ें

