नई दिल्ली. साल 1975 था, देश की पहली महिला आईपीएस अधिकारी किरण बेदी जब दिल्ली के प्रतिष्ठित दिल्ली जिमखाना क्लब की मेंबर बनीं तो वहां का एक कड़वा और दकियानूसी सच उनके सामने आया. उस दौर में इस हाई-प्रोफाइल क्लब में महिलाओं को वोट देने का अधिकार तक नहीं था. पुरुषों के इस गढ़ में महिलाओं की हैसियत दोयम दर्जे की थी. लेकिन अन्याय के खिलाफ हमेशा आवाज उठाने वाली देश की सुपरकॉप किरण बेदी ने इस लैंगिक भेदभाव को बर्दाश्त नहीं किया. उन्होंने इस रूढ़िवादी नियम को न सिर्फ सीधे चुनौती दी बल्कि क्लब के इतिहास को हमेशा-हमेशा के लिए बदल कर रख दिया. देश के सबसे रसूखदार क्लबों में से एक जिमखाना क्लब को लेकर किरण बेदी ने आउटलुक से बातचीत के दौरान अपने उस ऐतिहासिक संघर्ष और क्लब के साथ अपने भावनात्मक जुड़ाव को याद किया है.
किरण बेदी और जिमखाना क्लब की 5 मुख्य बातें
• 1975 का वो लैंगिक भेदभाव: किरण बेदी ने बताया कि जब उन्होंने 1975 में एक महिला सदस्य के रूप में क्लब जॉइन किया, तब वहां महिलाओं को वोटिंग राइट्स नहीं थे. उन्होंने इस खुले भेदभाव के खिलाफ मोर्चा खोला और अंततः नियमों को बदलवाकर ही दम लिया.
• क्लब से अचानक बेदखली का दर्द: क्लब की मौजूदा स्थिति और प्रशासनिक बदलावों पर बात करते हुए उन्होंने इविक्शन (बेदखली) शब्द का इस्तेमाल किया. उन्होंने कहा कि यह ऐसा था जैसे किसी को बिना नोटिस उसके उस घर से निकाल दिया जाए जिसने उसकी पहचान बनाई हो.
• अरुण जेटली का वो योगदान: किरण बेदी ने याद किया कि कैसे दिवंगत पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कुछ साल पहले क्लब में एक और ओपन-एयर पूल बनवाने में मदद की थी, जिससे बच्चों को बहुत फायदा हुआ.
• पेंशनभोगियों और मिडिल क्लास का ठिकाना: जिमखाना क्लब केवल अमीरों का नहीं बल्कि हमेशा से पेंशनभोगियों, वरिष्ठ नागरिकों और मध्यम वर्गीय सरकारी परिवारों के एक बहुत बड़े समुदाय की सेवा करता आया है, जहां खाना और बेकरी बेहद किफायती दरों पर मिलती थी.
• कड़े नियम और ग्रीन कार्ड व्यवस्था: क्लब में प्रवेश के नियम हमेशा से बहुत कड़े रहे हैं. यहां ग्रीन कार्ड के जरिए आश्रितों (Dependents) को सदस्यता मिलती है, यही वजह है कि नए सदस्यों की प्रतीक्षा सूची हमेशा सीमित रही है.
रूढ़िवादिता पर प्रहार और क्लब का बदलता स्वरूप
किरण बेदी का यह बयान केवल एक क्लब के नियमों की कहानी नहीं है बल्कि यह स्वतंत्र भारत में महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई का एक जीवंत दस्तावेज है. दिल्ली जिमखाना क्लब जैसी संस्थाएं ब्रिटिश काल के ढर्रे और सामंतशाही सोच पर चलती थीं, जहां महिलाओं को केवल डिपेंडेंट या मनोरंजन का साधन माना जाता था, निर्णय लेने की प्रक्रिया से उन्हें दूर रखा जाता था. 1975 में किरण बेदी द्वारा उठाए गए कदम ने इस पुरुष-प्रधान मानसिकता की नींव हिला दी. उनके संघर्ष का ही नतीजा था कि क्लब काउंसिल से जेंडर बायस यानी लैंगिक पूर्वाग्रह को हमेशा के लिए खत्म कर दिया गया और बाद में उन्होंने खुद क्लब काउंसिल में सेवाएं भी दीं.
सवाल-जवाब
किरण बेदी ने जिमखाना क्लब में महिलाओं के अधिकारों को लेकर क्या ऐतिहासिक बदलाव कराया?
साल 1975 में जब किरण बेदी क्लब की सदस्य बनीं, तब वहां महिला सदस्यों को वोट देने का कोई अधिकार नहीं था. किरण बेदी ने इस संस्थागत लैंगिक भेदभाव (Gender Discrimination) को कड़ी चुनौती दी. उनके पुरजोर विरोध और कानूनी-प्रशासनिक दखल के बाद क्लब को अपने रूढ़िवादी नियम बदलने पड़े, महिलाओं को वोटिंग अधिकार मिला और क्लब से हमेशा के लिए जेंडर बायस खत्म हुआ.
किरण बेदी ने बातचीत के दौरान ‘इविक्शन’ (बेदखली) शब्द का इस्तेमाल किस संदर्भ में किया और उनका दर्द क्या है?
किरण बेदी के लिए जिमखाना क्लब सिर्फ एक मनोरंजन की जगह नहीं, बल्कि एक ऐसा घर रहा है जिसने उनके व्यक्तित्व के विकास और पहचान को आकार दिया. हालिया घटनाक्रमों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि बिना किसी पूर्व सूचना के अचानक क्लब से दूर कर दिया जाना ऐसा महसूस कराता है जैसे किसी को अपने ही घर से बेदखल कर दिया गया हो और दोबारा अंदर आने की अनुमति न हो.
आम धारणा से अलग, किरण बेदी के अनुसार जिमखाना क्लब का असली मिजाज और इसकी सदस्यता प्रणाली कैसी रही है?
आम तौर पर लोग इसे केवल वीवीआईपी और रईसों का क्लब मानते हैं, लेकिन किरण बेदी के अनुसार यह क्लब हमेशा से रिटायर्ड अधिकारियों, पेंशनभोगियों और मध्यम वर्गीय सरकारी परिवारों का पसंदीदा ठिकाना रहा है. यहाँ की बेकरी और भोजन आम सदस्यों के बजट में होते थे. इसके अलावा, यहाँ ग्रीन कार्ड के जरिए कड़े नियमों के तहत ही आश्रितों को एंट्री मिलती थी, ताकि क्लब की गरिमा और सीमित संख्या बनी रहे.

