केंद्र सरकार ने सोमवार को घोषणा की कि ‘महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम’ (मनरेगा) के स्थान पर नया विकसित भारत- रोजगार और आजीविका के लिए गारंटी मिशन (ग्रामीण) (वीबी-जी राम जी) अधिनियम एक जुलाई से पूरे देश में लागू हो जाएगा. इसमें कहा गया है कि नए अधिनियम में एक नया ढांचा होगा जो ग्रामीण परिवारों को 125 दिनों का वैधानिक वैतनिक रोजगार देने का वादा करता है. ग्रामीण विकास मंत्रालय ने एक बयान में इसे भारत की ग्रामीण विकास संरचना में एक ‘ऐतिहासिक परिवर्तन’ बताया है, जो ‘विकसित भारत 2047’ की परिकल्पना के अनुरूप है. मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, यह अधिनियम एक जुलाई से सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लागू हो जाएगा और महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम उसी दिन से समाप्त हो जाएगा.
अधिसूचना में आश्वासन दिया गया है कि मनरेगा से नए ढांचे की ओर परिवर्तन से श्रमिकों के लिए कोई व्यवधान नहीं होगा. अधिसूचना में कहा गया है, ’30 जून तक मनरेगा के तहत जारी कार्यों को सुरक्षित रखा जाएगा और उन्हें बिना किसी रुकावट के नए ढांचे में स्थानांतरित कर दिया जाएगा.’ इसमें कहा गया है कि मौजूदा ई-केवाईसी सत्यापित मनरेगा जॉब कार्ड नए ‘ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्ड’ जारी होने तक वैध रहेंगे, और यह भी कहा गया है कि जॉब कार्ड के बिना श्रमिक ग्राम पंचायत स्तर पर पंजीकरण कराना जारी रख सकते हैं. मंत्रालय ने कहा कि लंबित ई-केवाईसी के कारण श्रमिकों को रोजगार से वंचित नहीं किया जाएगा.
विकसित भारत-जी राम जी का मकसद
विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एवं आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण) अधिनियम, 2025 का उद्देश्य मजदूरी आधारित रोजगार को सतत विकास तथा विकसित भारत@2047 के विजन के साथ जोड़ते हुए ग्रामीण रोजगार ढांचे (फ्रेमवर्क) में परिवर्तन लाना है. यह अधिनियम सभी ग्रामीण परिवारों के लिए प्रत्येक वित्तीय वर्ष में वैधानिक रोजगार गारंटी को 100 दिनों से बढ़ाकर 125 दिन करता है. यह ढांचा परिणामोन्मुख कार्यों तथा डिजिटल रूप से एकीकृत योजना के माध्यम से जल सुरक्षा, ग्रामीण अवसंरचना, आजीविका परिसंपत्तियों और आपदा प्रबंधन की तैयारियों को प्राथमिकता देता है. बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण, जियो-रेफरेंसिंग, डिजिटल निगरानी तथा समयबद्ध मजदूरी भुगतान के माध्यम से प्रौद्योगिकी-सक्षम प्रशासन (गर्वनेंस) का उद्देश्य पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करना है. अनिवार्य सोशल ऑडिट, संरचित निगरानी तंत्र और शिकायत निवारण प्रणाली इसके क्रियान्वयन को और सशक्त बनाते हैं. यह अधिनियम ग्रामीण रोजगार को सतत ग्राम विकास और स्थायी परिसंपत्ति निर्माण के एक उत्पादक प्रेरक के रूप में स्थापित करता है.
देश के सभी ग्रामीण क्षेत्रों में विकसित भारत-जी राम जी अधिनियम का ऐतिहासिक क्रियान्वयन
भारत सरकार ने विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एवं आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण) अधिनियम, 2025 को देश के सभी ग्रामीण क्षेत्रों में 1 जुलाई 2026 से लागू करने की अधिसूचना जारी कर दी है. विकसित भारत-जी राम जी अधिनियम के लागू होने के साथ ही महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (महात्मा गांधी नरेगा), 2005 उसी तिथि से निरस्त हो जाता है. यह भारत के ग्रामीण विकास के फ्रेमवर्क में एक ऐतिहासिक परिवर्तन का प्रतीक है और विकसित भारत@2047 के राष्ट्रीय विजन के अनुरूप एक समेकित(इंटीग्रेटेड), भविष्य उन्मुख एवं उत्पादकता(प्रोडक्टिविटी) आधारित ग्रामीण परिवर्तन के नए युग का शुभारंभ करता है.
इस अधिनियम का लागू होना पूर्ववर्ती महात्मा गांधी नरेगा व्यवस्था से एक आधुनिक ग्रामीण विकास संरचना की ओर ऐतिहासिक ट्रांजिशन का संकेत है, जो आजीविका सुरक्षा, स्थायी परिसंपत्ति निर्माण, प्रौद्योगिकी-सक्षम प्रशासन, कन्वर्जेंस-आधारित योजना और जलवायु अनुकूलनता को एक साथ जोड़ती है.
यह अधिनियम प्रत्येक ग्रामीण परिवार, जिसके वयस्क सदस्य अकुशल शारीरिक श्रम करने के लिए स्वेच्छा से आगे आते हैं, को प्रत्येक वित्तीय वर्ष में 125 दिनों के मजदूरी आधारित रोजगार की वैधानिक गारंटी प्रदान करता है. इस बढ़ी हुई गारंटी से ग्रामीण परिवारों की आय, आजीविका सुरक्षा, ग्राम स्तर की अवसंरचना (इन्फ्रॉस्ट्रक्चर) निर्माण और सतत ग्रामीण विकास को नई गति मिलने की अपेक्षा है. साथ ही, इसका उद्देश्य ऐसी स्थायी और उत्पादक ग्रामीण अवसंरचना का निर्माण करना है, जो जल सुरक्षा, ग्रामीण अवसंरचना, ग्रामीण आजीविका, स्थानीय आर्थिक विकास और जलवायु संबंधी चुनौतियों के विरुद्ध अनुकूलनता को मजबूत करे.
पृष्ठभूमि और सुधार की आवश्यकता
कई दशकों से मजदूरी-आधारित रोजगार कार्यक्रम भारत की ग्रामीण विकास रणनीति का अभिन्न हिस्सा रहे हैं, जिन्होंने अल्प-रोजगार और आजीविका असुरक्षा का सामना कर रहे ग्रामीण परिवारों को आय सहायता प्रदान की है. समय के साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सामाजिक सुरक्षा के विस्तार, भौतिक और डिजिटल संपर्क में सुधार, वित्तीय समावेशन की मजबूती और आजीविका के विविधीकरण के कारण महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं. इन परिवर्तनों ने वर्तमान ग्रामीण रोजगार के फ्रेमवर्क को समकालीन आवश्यकताओं, आकांक्षाओं और विकसित भारत@2047 के राष्ट्रीय विजन के अनुरूप पुनर्संतुलित करने की आवश्यकता उत्पन्न की है.
इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए आजीविका गारंटी के फ्रेमवर्क को मजबूत करने हेतु वैधानिक रोजगार गारंटी को एक वित्तीय वर्ष में 100 दिनों से बढ़ाकर 125 दिन करने का प्रस्ताव किया गया है. इस बढ़ी हुई गारंटी का उद्देश्य ग्रामीण विकास की तीव्र गति को समर्थन देना, अधिक आय सुरक्षा प्रदान करना और विस्तारित रोजगार अवसरों के माध्यम से ग्रामीण परिवारों को सशक्त बनाना है. तदनुसार, विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एवं आजीविका मिशन (ग्रामीण): वीबी–जी राम जी (विकसित भारत-जी राम जी) अधिनियम, 2025 नामक एक नया कानून बनाया गया है, ताकि विकसित भारत@2047 के विजन के अनुरूप आजीविका सुरक्षा को उत्पादकता, कन्वर्जेंस, अनुकूलनता और सतत परिसंपत्ति निर्माण के साथ एकीकृत करने वाला भविष्य-उन्मुख ग्रामीण विकास फ्रेमवर्क स्थापित किया जा सके.
विकसित भारत-जी राम जी अधिनियम, 2025 एक व्यापक विधायी पुनर्संरचना है, जिसे ग्रामीण रोजगार को विकसित भारत@2047 के राष्ट्रीय विजन के अनुरूप बनाने के लिए तैयार किया गया है. संसद द्वारा दिसंबर 2025 में पारित यह अधिनियम दो दशक पुराने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (महात्मा गांधी नरेगा), 2005 का स्थान लेता है. यह ग्रामीण रोजगार को एक स्वतंत्र कल्याणकारी हस्तक्षेप से हटाकर विकास और अनुकूलन आधारित अवसंरचना के एक समेकित साधन के रूप में स्थापित करता है.
बेहतर आजीविका गारंटी और श्रमिक-केंद्रित फ्रेमवर्क
इस अधिनियम की एक केंद्रीय विशेषता सभी ग्रामीण परिवारों के लिए प्रत्येक वित्तीय वर्ष में वैधानिक रोजगार गारंटी को 100 दिनों से बढ़ाकर 125 दिन करना है. यह बढ़ी हुई गारंटी आजीविका सुरक्षा को मजबूत करने, आय की स्थिरता में सुधार करने, ग्रामीण उपभोग को समर्थन देने और कमजोर परिवारों को अधिक आर्थिक अनुकूलनता प्रदान करने के उद्देश्य से है. यह फ्रेमवर्क ‘रोजगार भी, सम्मान भी’ के सिद्धांत पर आधारित है. इसका उद्देश्य केवल मजदूरी आधारित रोजगार उपलब्ध कराना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि ग्रामीण श्रमिक दीर्घकालिक ग्राम विकास में योगदान देने वाली स्थायी और उत्पादक सार्वजनिक परिसंपत्तियों के निर्माण में सक्रिय भागीदार बनें.
महात्मा गांधी नरेगा से नई व्यवस्था में ट्रांजिशन को भी सतत और श्रमिक-अनुकूल बनाया गया है. वर्तमान ई-केवाईसी सत्यापित जॉब कार्ड तब तक मान्य रहेंगे, जब तक ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्ड जारी नहीं हो जाते. जिन श्रमिकों के पास वर्तमान में जॉब कार्ड नहीं हैं, वे ग्राम पंचायत स्तर पर पंजीकरण और नए कार्ड जारी कराने हेतु आवेदन कर सकते हैं. केवल लंबित ई-केवाईसी के कारण किसी भी श्रमिक को रोजगार से वंचित नहीं किया जाएगा, तथा आवश्यक होने पर कार्यस्थलों सहित ई-केवाईसी पूर्ण कराने हेतु सुविधा तंत्र उपलब्ध कराया गया है.
श्रमिक मौखिक रूप से, मौजूदा फॉर्म-6 व्यवस्था के माध्यम से लिखित रूप में अथवा डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से रोजगार की मांग जारी रख सकते हैं. निर्धारित समय-सीमा के भीतर रोजगार उपलब्ध कराया जाएगा; अन्यथा अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार श्रमिक बेरोजगारी भत्ते के हकदार होंगे. बेरोजगारी भत्ता वित्तीय वर्ष के पहले तीस दिनों के लिए अधिसूचित मजदूरी दर के कम-से-कम एक-चौथाई तथा शेष अवधि के लिए कम-से-कम आधी मजदूरी दर के बराबर देय होगा. इससे रोजगार की कानूनी गारंटी और क्रियान्वयन ढांचे की जवाबदेही और मजबूत होगी.
समयबद्ध मजदूरी भुगतान और सुदृढ़ पारदर्शिता
यह अधिनियम समयबद्ध, पारदर्शी और जवाबदेह मजदूरी भुगतान पर विशेष बल देता है. मजदूरी का भुगतान प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) के माध्यम से सीधे श्रमिकों के बैंक अथवा डाकघर खातों में किया जाता रहेगा, जिससे पारदर्शिता मजबूत होगी और विलंब कम होगा.
इस व्यवस्था के अंतर्गत मजदूरी का भुगतान साप्ताहिक आधार पर या किसी भी स्थिति में मस्टर रोल बंद होने के पंद्रह दिनों के भीतर किया जाना है. यदि निर्धारित अवधि से अधिक विलंब होता है, तो अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार श्रमिक विलंब क्षतिपूर्ति (मुआवजा) पाने के पात्र होंगे. अधिनियम में यह भी प्रावधान है कि यदि मस्टर रोल बंद होने की तिथि से पंद्रह दिनों के भीतर मजदूरी का भुगतान नहीं किया जाता, तो मस्टर रोल बंद होने के सोलहवें दिन के बाद प्रत्येक दिन की देरी के लिए श्रमिकों को अवैतनिक मजदूरी का 0.05 प्रतिशत विलंब क्षतिपूर्ति के रूप में प्राप्त होगा. इन प्रावधानों का उद्देश्य मजदूरी भुगतान में जवाबदेही को मजबूत बनाना और श्रमिकों को समय पर भुगतान सुनिश्चित करना है.
कार्यस्थलों पर उपस्थिति एनएमएमएस-सक्षम प्रणाली और फेस ऑथेंटिकेशन आधारित उपस्थिति प्रणाली के माध्यम से दर्ज की जाएगी. साथ ही, तकनीकी या कनेक्टिविटी संबंधी समस्याओं के कारण वास्तविक श्रमिकों को प्रतिकूल प्रभाव से बचाने हेतु उपयुक्त अपवाद (इक्सेप्शन) के प्रबंधन संबंधी प्रावधान भी शामिल किए गए हैं.
सतत ट्रांजिशन: ‘रोजगार भी, सम्मान भी’
सरकार का प्रमुख उद्देश्य ऐसा सुचारु ट्रांजिशन सुनिश्चित करना है, जो अधिनियम के अंतर्गत ग्रामीण श्रमिकों के हितों की रक्षा करे. सभी ग्रामीण क्षेत्रों के लिए अधिसूचना: इस अधिनियम के प्रावधान लागू होने की तिथि से देश के सभी ग्रामीण क्षेत्रों में एक साथ प्रभावी होंगे. साथ ही, महात्मा गांधी नरेगा भी उसी तिथि अर्थात xx/xx/2026 से निरस्त हो जाएगा. महात्मा गांधी नरेगा के अंतर्गत रोजगार विकसित भारत-जी राम जी अधिनियम लागू होने तक निर्बाध और सुचारु रूप से जारी रहेगा. सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता श्रमिकों को समय पर रोजगार उपलब्ध कराना और मजदूरी का शीघ्र भुगतान सुनिश्चित करना है. बिना किसी बाधा के रोजगार के अवसर सुनिश्चित करने हेतु राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को प्राप्त हो रही रोजगार की मांग और क्षेत्रीय आवश्यकताओं के अनुरूप पर्याप्त श्रम बजट उपलब्ध कराया गया है.
श्रमिक निरंतरता: जिन श्रमिकों का ई-केवाईसी पूर्ण है, उनके मौजूदा जॉब कार्ड ट्रांजिशन अवधि के दौरान नए ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्ड जारी होने तक मान्य रहेंगे.
प्रगतिरत कार्य: अधिनियम लागू होने की तिथि पर महात्मा गांधी नरेगा के अंतर्गत चल रहे कार्य नए अधिनियम के अंतर्गत जारी रह सकते हैं.
नए कार्य: यदि चल रहे कार्य रोजगार की मांग पूरी करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं, तो नए अधिनियम की अनुसूची-I के अनुरूप नए कार्य प्रारंभ किए जा सकते हैं.
ऐतिहासिक बजटीय प्रतिबद्धता
भारत सरकार ने देशभर में इस नए फ्रेमवर्क के क्रियान्वयन के लिए व्यापक वित्तीय प्रावधान किए हैं. वित्तीय वर्ष 2026–27 के लिए इस कार्यक्रम में केन्द्रांश के रूप में ₹95,692.31 करोड़ का प्रावधान किया गया है. यह अब तक बजट अनुमान चरण में किसी भी ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम के लिए किया गया सबसे बड़ा आवंटन है. यह प्रावधान स्पष्ट रूप से सरकार की प्राथमिकता, उसका पैमाना और प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जिसके माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और आजीविका के अवसरों को नई गति मिलने की अपेक्षा है.
राज्यों के अनुमानित हिस्से को शामिल करने पर इस कार्यक्रम का कुल परिव्यय ₹1.51 लाख करोड़ से अधिक होने की संभावना है. यह विशाल वित्तपोषण ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बड़े पैमाने पर परिवर्तन लाने, रोजगार सृजन को बढ़ावा देने, ग्राम स्तर पर स्थायी परिसंपत्तियों के निर्माण और ग्रामीण परिवारों की आय में महत्वपूर्ण वृद्धि सुनिश्चित करने के प्रति सरकार की विश्वसनीय प्रतिबद्धता को दर्शाता है.
फिल्ड में कार्यरत कार्मिक: क्षमता, जवाबदेही और दक्षता
कार्यक्रम अधिकारियों (POs), मेट्स, ग्राम रोजगार सेवकों (GRS) तथा अन्य मैदानी अमलों (कार्मिक) की भूमिका विकसित भारत-जी राम जी में सुचारु ट्रांजिशन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है. इस अधिनियम के अंतर्गत प्रशासनिक व्यय को 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 9 प्रतिशत किया गया है, जिससे क्षमता निर्माण, प्रशिक्षण, मानव संसाधन सुदृढ़ीकरण, पारिश्रमिक भुगतान और मैदानी स्तर पर बेहतर क्रियान्वयन को बढ़ावा मिलेगा. यह व्यवस्थित सुधार सुनिश्चित करेगा कि जमीनी स्तर पर कार्यरत अमला अधिक दक्ष और सशक्त बनें.
कार्यों का विस्तारित दायरा: विकास को नई गति
विकसित भारत-जी राम जी अधिनियम, 2025 के अंतर्गत कार्यों के दायरे का उल्लेखनीय विस्तार किया गया है और इसे विकसित भारत@2047 के लक्ष्य के अनुरूप बनाया गया है. कार्यों को चार प्रमुख विषयगत क्षेत्रों में संरचित किया गया है:
जल सुरक्षा हेतु जल संबंधी कार्य
मूलभूत ग्रामीण अवसंरचनाएँ
आजीविका संबंधी अवसंरचनाएँ
प्रतिकूल मौसमीय घटनाओं के प्रभाव को कम करने वाले न्यूनीकरण संबंधी कार्य
इससे क्रियान्वयन में अधिक परिणामोन्मुख और समेकित दृष्टिकोण संभव होगा.
अधिनियम के अंतर्गत अनुमेय कार्य केवल पारंपरिक श्रम-आधारित गतिविधियों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ऐसे बहुआयामी कार्य भी शामिल हैं, जो सीधे ग्रामीण जीवन की गुणवत्ता में सुधार करते हैं और साथ ही ऐसी स्थायी परिसंपत्तियों का निर्माण करते हैं, जो आगे अतिरिक्त आजीविका के अवसर उत्पन्न करें. यह दृष्टिकोण “रोजगार भी, सम्मान भी” के सिद्धांत पर आधारित है, जिसमें श्रमिक विकास प्रक्रिया के सक्रिय भागीदार होते हैं.
कार्य की प्रत्येक दिवस को स्थायी और उत्पादक ग्रामीण अवसंरचना निर्माण में योगदान देने हेतु कार्यों की विषयगत प्राथमिकता तय की गई है.
जल सुरक्षा संबंधी कार्यों के अंतर्गत सिंचाई सहायता, भू-जल पुनर्भरण संरचनाएं, जलागम विकास, जल निकायों का पुनर्जीवन, वनीकरण तथा वर्षा जल संचयन संरचनाएं शामिल होंगी, जिनका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में दीर्घकालिक जल अनुकूलनता को मजबूत करना है.
मूलभूत ग्रामीण अवसंरचना के कार्यों में ग्रामीण सड़कें, सार्वजनिक भवन, विद्यालय अवसंरचना, आंगनवाड़ी केंद्र, स्वच्छता प्रणाली, नवीकरणीय ऊर्जा अवसंरचना, आवास संबंधी कार्य तथा विभिन्न सरकारी योजनाओं के अंतर्गत कार्य शामिल होंगे, जिससे बुनियादी सुविधाओं और सार्वजनिक सेवाओं तक बेहतर पहुंच सुनिश्चित होगी.
आजीविका संबंधी अवसंरचना में ग्रामीण बाजार, भंडारण अवसंरचना, खाद्य प्रसंस्करण इकाइयां, कोल्ड स्टोरेज सुविधाएं, पशुधन अवसंरचना, मत्स्य पालन अवसंरचना, कम्पोस्ट इकाइयां तथा कौशल विकास केंद्र शामिल होंगे. इनके निर्माण से स्थानीय आजीविका मजबूत होगी, ग्रामीण आय में विविधता आएगी और कृषि आधारित आर्थिक गतिविधियों में सहायता मिलेगी.
यह फ्रेमवर्क प्रतिकूल मौसमीय घटनाओं को कम करने और जलवायु अनुकूलन से संबंधित कार्यों को भी प्राथमिकता देता है, जिनमें बाढ़ प्रबंधन संरचनाएं, तटबंध, चक्रवात आश्रय, आपदा उपरांत पुनर्स्थापन तथा वनाग्नि प्रबंधन कार्य शामिल हैं.
इस विषयगत दृष्टिकोण के माध्यम से ग्रामीण रोजगार को सीधे उत्पादक परिसंपत्ति निर्माण, स्थानीय आर्थिक विकास और अनुकूलनता से जोड़ा गया है.
ये सभी कार्य रोजगार सृजन, मूल्य संवर्धन, कृषि आधारित उद्योगों के विस्तार तथा सेवाओं की बेहतर उपलब्धता सुनिश्चित करेंगे, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में स्थिरता आएगी और आय के स्रोतों में विविधता बढ़ेगी.
कृषि मौसम के दौरान संतुलन: किसानों और श्रमिकों दोनों के हितों की सुरक्षा
बुवाई और कटाई के पीक सीजन में कृषि श्रमिकों की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए अधिनियम राज्यों को यह अधिकार देता है कि वे एक वित्तीय वर्ष में 60 दिनों तक की अवधि को ‘विराम अवधि’ के रूप में अधिसूचित कर सकें (धारा 6).
हालांकि, 125 दिनों की रोजगार गारंटी यथावत बनी रहेगी, जिसे शेष अवधि में उपलब्ध कराया जाएगा, ताकि कृषि उत्पादकता और श्रमिकों की सुरक्षा के बीच संतुलित व्यवस्था बनी रहे.
विकसित ग्राम पंचायत योजना (योजना फ्रेमवर्क)
विकसित भारत@2047 के विजन के अनुरूप ग्रामीण भारत एक नए और परिवर्तनकारी चरण में प्रवेश कर रहा है. विकास की दिशा अब केवल मजदूरी आधारित रोजगार तक सीमित नहीं है, बल्कि “रोजगार, आजीविका और उत्पादक परिसंपत्ति निर्माण” के एक समेकित मॉडल की ओर विकसित हो रही है. विकसित भारत-जी राम जी योजना इसी व्यापक और विकेंद्रीकृत दृष्टिकोण को प्रतिबिंबित करती है, जिसमें ग्राम पंचायतों को विकास के केंद्र में रखा गया है और उन्हें योजना निर्माण तथा क्रियान्वयन में वास्तविक अधिकार प्रदान किए गए हैं. विकसित ग्राम पंचायत योजनाओं (VGPP) की तैयारी के माध्यम से ग्राम पंचायतें स्वयं अपने विकास की दिशा निर्धारित करेंगी.
इस फ्रेमवर्क के अंतर्गत योजना निर्माण की प्रक्रिया को नीचे से ऊपर (Bottom-up) दृष्टिकोण के रूप में संरचित किया गया है, जिसमें ग्राम पंचायतें ग्राम सभाओं के माध्यम से स्थानीय आवश्यकताओं के आधार पर कार्यों की पहचान और प्राथमिकता तय करेंगी, तथा इसके बाद विकासखंड, जिला और राज्य स्तर पर उनका समेकन किया जाएगा. यह प्रणाली पीएम गति शक्ति, जीआईएस और डिजिटल प्लेटफॉर्म के साथ एकीकृत होगी, जिससे वैज्ञानिक और स्थानिक योजना सुनिश्चित होगी.
कार्यस्थल सुविधाएं: श्रमिकों की गरिमा और सुरक्षा पर विशेष बल
विकसित भारत-जी राम जी अधिनियम, 2025 की अनुसूची-II के अंतर्गत कार्यस्थल सुविधाओं को कानूनी गारंटी प्रदान की गई है, जिससे यह केवल एक प्रशासनिक व्यवस्था न रहकर श्रम की गरिमा और मानवीय सम्मान का सशक्त प्रतीक बन जाती है. इस प्रावधान के अंतर्गत प्रत्येक कार्यस्थल पर स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता अनिवार्य की गई है. विशेष रूप से ग्रामीण भारत की गर्मी की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए श्रमिकों को गर्मी से बचाने के लिए छाया और विश्राम स्थल की पर्याप्त व्यवस्था सुनिश्चित की गई है. इसके अतिरिक्त, प्रत्येक कार्यस्थल पर प्राथमिक उपचार किट (First Aid Kit) की उपलब्धता भी सुनिश्चित की गई है, ताकि श्रमिकों की सुरक्षा और स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी जा सके.
महिला श्रमिकों की भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए अधिनियम में एक महत्वपूर्ण प्रावधान शामिल किया गया है. ऐसे कार्यस्थल, जहाँ पर पांच वर्ष से कम आयु के पांच या अधिक बच्चे उपस्थित हों, वहां बच्चों की देखभाल के लिए एक महिला श्रमिक नियुक्त की जाएगी और उसे निर्धारित मजदूरी दर के अनुसार भुगतान किया जाएगा. यह व्यवस्था न केवल महिलाओं के कार्य की निरंतरता सुनिश्चित करती है, बल्कि कार्यस्थल को उनकी आवश्यकताओं के प्रति अधिक समावेशी और संवेदनशील भी बनाती है.
इसके अतिरिक्त, श्रमिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए दुर्घटना की स्थिति में निःशुल्क चिकित्सा उपचार का अधिकार प्रदान किया गया है. यदि अस्पताल में भर्ती की आवश्यकता होती है, तो आवास, उपचार, दवाइयों और मजदूरी दर के आधे के बराबर दैनिक भत्ते की व्यवस्था की जाएगी. मृत्यु अथवा स्थायी विकलांगता की स्थिति में प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना के प्रावधानों के अनुसार अनुग्रह सहायता देय होगी. इस प्रकार, यह अधिनियम कार्यस्थल पर सुरक्षा, संवेदनशीलता और सामाजिक सुरक्षा का एक व्यापक ढांचा सुनिश्चित करता है.
कार्यस्थलों पर पारदर्शिता और जवाबदेही को भी मजबूत बनाया जाएगा. इसके लिए अनिवार्य रुप से ‘जनता बोर्ड’ प्रदर्शित किए जाएंगे, जिनमें स्वीकृत कार्यों, श्रम अनुमान, व्यय और सामग्री उपयोग से संबंधित विवरण अंकित होंगे. इसके अतिरिक्त, यह फ्रेमवर्क साप्ताहिक सार्वजनिक प्रकटीकरण प्रणाली, परिसंपत्तियों की जिओ-टैगिंग, रियल-टाइम डैशबोर्ड, मोबाइल आधारित निगरानी और मजबूत सोशल ऑडिट की व्यवस्था प्रदान करता है, ताकि जमीनी स्तर पर पारदर्शिता, सामुदायिक भागीदारी और प्रभावी सार्वजनिक निगरानी सुनिश्चित की जा सके.
क्रियान्वयन में विशेष छूट
प्राकृतिक आपदाओं या अन्य असाधारण परिस्थितियों की स्थिति में केंद्र सरकार को आवश्यकता अनुसार विशेष छूट प्रदान करने का अधिकार होगा. इससे प्रभावित क्षेत्रों में राहत और पुनर्वास संबंधी गतिविधियां शीघ्रता और बिना किसी बाधा के संचालित की जा सकेंगी तथा प्रभावित समुदायों को समय पर सहायता मिल सकेगी.
विकसित भारत-जी राम जी अधिनियम की प्रमुख विशेषताएं
विकसित भारत@2047 के साथ ग्रामीण विकास ढांचे का संरेखण: विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एवं आजीविका मिशन (ग्रामीण): वीबी-जी राम जी (विकसित भारत-जी राम जी) अधिनियम, 2025 को इस तरह तैयार किया गया है कि ग्रामीण विकास का फ्रेमवर्क विकसित भारत@2047 के राष्ट्रीय विजन के अनुरूप हो, ताकि मजदूरी आधारित रोजगार, परिसंपत्ति निर्माण और सार्वजनिक निवेश मिलकर अधिक समृद्ध, अनुकूल और समावेशी ग्रामीण भारत का निर्माण कर सकें. बेहतर अवसंरचना, मजबूत आजीविका और गांवों में अधिक जलवायु अनुकूलता सुनिश्चित करने के लिए ग्रामीण कार्यों को केंद्रीय साधन के रूप में स्थापित किया गया है, जिससे विकसित पंचायत के माध्यम से विकसित भारत का लक्ष्य साकार हो सके.
कन्वर्जेंस और परिपूर्णता (संतृप्ति) आधारित दृष्टिकोण: इस विजन को व्यवहार में उतारने के लिए अधिनियम कन्वर्जेंस और परिपूर्णता (संतृप्ति) आधारित दृष्टिकोण अपनाता है, जो पूरक सरकारी योजनाओं को एक एकीकृत ग्रामीण विकास के फ्रेमवर्क में जोड़ता है. ग्राम पंचायत स्तर पर निधियां, विभाग और कार्यक्रम परस्पर समन्वय के साथ कार्य करेंगे. इसका उद्देश्य योजना के माध्यम से सभी पात्र परिवारों को कवर करना और बिखरे हुए या छिटपुट कार्यों के बजाय व्यवस्थित रूप से महत्वपूर्ण कमियों को दूर करना है.
विषयगत और परिसंपत्ति-केंद्रित सार्वजनिक कार्य: इसी आधार पर, यह अधिनियम सार्वजनिक कार्यों की एक संरचित विषयगत प्राथमिकता निर्धारित करता है, ताकि गारंटीकृत रोजगार का प्रत्येक दिन उत्पादक और स्थायी ग्रामीण परिसंपत्तियों का निर्माण करे. ‘विकसित ग्राम पंचायत योजनाओं’ (VGPPs) के माध्यम से पहचाने गए सभी कार्यों को ‘विकसित भारत-राष्ट्रीय ग्रामीण अवसंरचना स्टैक’ (VB-NRIS) में एकीकृत किया गया है, जिससे एक एकीकृत और भविष्योन्मुखी ग्रामीण बुनियादी ढांचा तैयार होता है जो पूरी तरह से विकसित भारत के विजन के अनुरूप है.
चार प्राथमिक विषयगत क्षेत्र:
जल सुरक्षा- जल संरक्षण संरचनाएं, सिंचाई सहायता, भू-जल पुनर्भरण, जल निकायों का पुनर्जीवन, जलागम विकास तथा वनीकरण जैसे जल संबंधी कार्य ग्रामीण क्षेत्रों में जल सुरक्षा को सुदृढ़ करेंगे.
मूलभूत ग्रामीण अवसंरचना- आवश्यक नागरिक, सामाजिक और सेवा प्रदाता परिसंपत्तियां जैसे ग्रामीण सड़कें, सार्वजनिक भवन, विद्यालय अवसंरचना, स्वच्छता प्रणाली, नवीकरणीय ऊर्जा सुविधाएं तथा केंद्र सरकार की योजनाओं के अंतर्गत आवास संबंधी कार्य बेहतर बुनियादी सुविधाएं और सेवाओं तक बेहतर पहुंच सुनिश्चित करेंगी.
आजीविका संबंधी अवसंरचना- कृषि, पशुपालन, मत्स्य पालन, भंडारण, बाजार, कौशल विकास और चक्रीय अर्थव्यवस्था (Circular Economy) मॉडल से संबंधित उत्पादक परिसंपत्तियां सतत आजीविका, मूल्य संवर्धन और ग्रामीण आय के विविध अवसरों के सृजन में मदद करेंगी.
प्रतिकूल मौसमीय घटनाओं के प्रभाव को कम करने हेतु विशेष कार्य- आपदा प्रबंधन की तैयारी और जलवायु अनुकूलन संबंधी कार्य जैसे आश्रय स्थल, तटबंध, बाढ़ प्रबंधन संरचनाएं, पुनर्वास कार्य और वनाग्नि प्रबंधन जलवायु-अनुकूलित गांवों के निर्माण में सहायक होंगे.
इस विषयगत फोकस (thematic focus) के माध्यम से, यह अधिनियम सुनिश्चित करता है कि सार्वजनिक कार्य एक साथ जल सुरक्षा को बढ़ाएं, मूलभूत ग्रामीण प्रणालियों को मजबूत करें, आजीविका के अवसरों का विस्तार करें और अनुकूलनता का निर्माण करें, जिससे विकसित भारत@2047 के राष्ट्रीय विजन के अनुरूप सशक्तिकरण, विकास, कन्वर्जेंस और परिपूर्णता (संतृप्ति) को समर्थन मिले.
आधुनिक, प्रौद्योगिकी-सक्षम प्रशासन
यह अधिनियम प्रभावी क्रियान्वयन, जवाबदेही और उच्च विश्वसनीयता वाली सेवा प्रदायगी सुनिश्चित करने हेतु एक आधुनिक, पारदर्शी और प्रौद्योगिकी-सक्षम प्रशासनिक संरचना स्थापित करता है. अधिक डिजिटल पहुंच, बेहतर संपर्क और विस्तारित सार्वजनिक अवसंरचना वाले ग्रामीण भारत में प्रशासनिक प्रणालियों को डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, रियल-टाइम निगरानी और उन्नत पारदर्शिता तंत्र के माध्यम से सुदृढ़ किया जाएगा.
इस फ्रेमवर्क में बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण, मोबाइल आधारित निगरानी, स्थानिक प्रौद्योगिकी आधारित योजना, रियल-टाइम डैशबोर्ड, एआई-सक्षम विश्लेषण और नागरिक सहभागिता प्लेटफॉर्म का प्रावधान है. ये प्रणालियां श्रमिकों, कार्मिकों और लेन-देन (ट्रांजेक्शन) का सटीक सत्यापन सुनिश्चित करती हैं, निगरानी को बेहतर बनाती हैं और क्रियान्वयन के सभी चरणों में समयबद्ध रिपोर्टिंग और सुधारात्मक कार्रवाई में मदद करती हैं.
एक मजबूत सोशल ऑडिट व्यवस्था की इस संरचना का प्रमुख हिस्सा है, जो सामुदायिक भागीदारी को बढ़ाता है और ग्राम स्तर पर पारदर्शिता एवं जवाबदेही को मजबूत करता है. इसके अतिरिक्त, राष्ट्रीय स्तर की संचालन समिति और राज्य स्तर की संचालन समितियां अपने-अपने क्षेत्रों में क्रियान्वयन की समीक्षा, निगरानी और मूल्यांकन करेंगी, जिससे समन्वित निगरानी और संपूर्ण सरकार का दृष्टिकोण सुनिश्चित होगा.
इस आधुनिक, प्रौद्योगिकी-सक्षम प्रशासनिक पारिस्थितिकी तंत्र को समाहित करके, यह अधिनियम पूर्वानुमेय सेवा प्रदायगी सुनिश्चित करता है, दोहराव को कम करता है, परिसंपत्तियों की गुणवत्ता में सुधार करता है और सशक्तिकरण, विकास, कन्वर्जेंस और परिपूर्णता (संतृप्ति) को समर्थन देता है. यह प्रशासनिक ढांचा सुनिश्चित करता है कि ग्रामीण भारत विकसित भारत@2047 के राष्ट्रीय विजन की दिशा में आगे बढ़ने हेतु आवश्यक प्रणालियों से सुसज्जित हो.
प्रमुख वैधानिक प्रावधान
(क) उन्नत आजीविका गारंटी-
मुख्य उद्देश्य अकुशल शारीरिक श्रम करने हेतु स्वेच्छा से आगे आने वाले ग्रामीण परिवारों को प्रति वित्तीय वर्ष 125 दिनों का मजदूरी आधारित रोजगार प्रदान कर आजीविका गारंटी ढांचे को मजबूत करना है, जिससे ग्रामीण विकास को विकसित भारत@2047 के अनुरूप बनाना जा सके.
(ख) वीबी-एनआरआईएस में एकीकरण-
सभी कार्यों को विकसित भारत-राष्ट्रीय ग्रामीण अवसंरचना स्टैक (VB-NRIS) में समाहित किया जाएगा. इसमें जल सुरक्षा हेतु जल संबंधी कार्यों, मूलभूत ग्रामीण अवसंरचना, आजीविका संबंधी अवसंरचना तथा प्रतिकूल मौसमीय घटनाओं को कम करने हेतु विशेष कार्यों को प्राथमिकता दी जाएगी.
(ग) वीजीपीपी आधारित योजना-
योजना निर्माण विकसित ग्राम पंचायत योजनाओं (VGPP) के माध्यम से किया जाएगा, जिन्हें ग्राम पंचायतें तैयार करेंगी और स्थानीय विकासात्मक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए पीएम गति शक्ति सहित राष्ट्रीय स्थानिक योजना प्रणालियों के साथ एकीकृत किया जाएगा.
(घ) कृषि के व्यस्तम मौसम की सुरक्षा-
राज्यों को यह अधिकार होगा कि वे वित्तीय वर्ष में 60 दिनों तक की अवधि, जिसमें बुवाई और कटाई का पीक सीजन शामिल हो, अग्रिम रूप से अधिसूचित करें, जिसके दौरान अधिनियम के अंतर्गत कार्य नहीं किए जाएंगे, ताकि महत्वपूर्ण समय में कृषि श्रमिकों की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित हो सके.
(ङ) केंद्र प्रायोजित योजना-
यह योजना केंद्र और राज्यों के बीच साझा जिम्मेदारियों के साथ केंद्र प्रायोजित योजना के रूप में लागू की जाएगी.
(च) मानक (नॉरमेटिव) आवंटन-
समावेशी विकास और वित्तीय संसाधनों के न्यायसंगत वितरण को बढ़ावा देने हेतु केंद्र सरकार नियमों में निर्धारित वस्तुनिष्ठ मानकों के आधार पर प्रत्येक राज्य को मानक आवंटन करेगी. इससे अधिक व्यय की जिम्मेदारी राज्य की होगी. राज्य पंचायतों की श्रेणी और स्थानीय विकासात्मक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए जिलों और ग्राम पंचायतों के बीच पारदर्शी और आवश्यकता-आधारित निधि वितरण सुनिश्चित करेंगे, जिससे समानता, पारदर्शिता और जवाबदेही मजबूत होगी.
(छ) विशेष छूट-
प्राकृतिक आपदाओं या असाधारण परिस्थितियों के दौरान समयबद्ध प्रतिक्रिया और राहत हेतु केंद्र सरकार अस्थायी विशेष छूट प्रदान कर सकती है.
(ज) पारदर्शिता और जवाबदेही-
बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण, स्थानिक प्रौद्योगिकी आधारित योजना, मोबाइल एवं डैशबोर्ड आधारित निगरानी, साप्ताहिक सार्वजनिक प्रकटीकरण प्रणाली तथा मजबूत सोशल ऑडिट व्यवस्था पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करेंगे.
(झ) संस्थागत निगरानी-
केंद्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी परिषद और राज्य ग्रामीण रोजगार गारंटी परिषदों का गठन उनके-अपने क्षेत्रों में अधिनियम के प्रावधानों की समीक्षा, निगरानी और प्रभावी क्रियान्वयन हेतु किया जाएगा. मानक आवंटन, कन्वर्जेंस और अन्य संबंधित विषयों पर अनुशंसा हेतु केंद्र और राज्य स्तर पर संचालन समितियां गठित की जाएंगी.
(ञ) मजदूरी दर निर्धारण-
अकुशल शारीरिक श्रम हेतु मजदूरी दरें केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित की जाएंगी.
(ट) छह माह के भीतर राज्य योजनाएं-
प्रत्येक राज्य सरकार को अधिनियम लागू होने के छह माह के भीतर अधिनियम के प्रावधानों के अनुरूप अपनी योजना अधिसूचित करनी होगी.
(ठ) बेरोजगारी भत्ता-
यदि पात्र आवेदकों को निर्धारित अवधि के भीतर कार्य उपलब्ध नहीं कराया जाता, तो अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार उन्हें बेरोजगारी भत्ता दिया जाएगा.
(ड) श्रमिकों के लिए न्यूनतम कानूनी गारंटी-
यह अधिनियम योजना के अंतर्गत श्रमिकों के कानूनी अधिकारों और सुरक्षा के संरक्षण हेतु न्यूनतम विशेषताएं और शर्तें निर्धारित करता है.

