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Home » All News » Bengal Election 2026: 75% मुस्लिम वोट और ममता का ‘अजेय’ फॉर्मूला, क्या BJP बदल पाएगी बंगाल का चुनावी इतिहास? | West Bengal Elections 2026: Mamata Banerjee vs BJP Bengal Electoral History Analysis
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Bengal Election 2026: 75% मुस्लिम वोट और ममता का ‘अजेय’ फॉर्मूला, क्या BJP बदल पाएगी बंगाल का चुनावी इतिहास? | West Bengal Elections 2026: Mamata Banerjee vs BJP Bengal Electoral History Analysis

HawkNewsBy HawkNewsApril 10, 2026No Comments12 Mins Read
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India

oi-Divyansh Rastogi

Time
Published: Friday, April 10, 2026, 19:34 [IST]

Bengal Election 2026: पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक कहावत मशहूर है, ‘सत्ता का रास्ता आंकड़ों की गलियों से होकर गुजरता है।’ लेकिन ये आंकड़े सिर्फ वोट नहीं, बल्कि एक ऐसा अभेद्य किला हैं जिसे ढहाना भाजपा के लिए अब भी एक पहेली बना हुआ है।

294 सीटों वाली विधानसभा में आखिर क्यों 112 सीटें ही तय कर देती हैं कि ‘दीदी’ की वापसी होगी या नहीं? आइए, 2021 और 2024 के नतीजों के जरिए समझते हैं उस मुस्लिम फैक्टर और जमीनी रणनीति का सच, जिसने बंगाल को भाजपा के लिए ‘टेढ़ी खीर’ बना दिया है।

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बंगाल का चुनावी गणित: आंकड़े जो तय करते हैं रायटर्स बिल्डिंग का रास्ता

2016 से 2024 तक, बंगाल की राजनीति में भाजपा ने लंबी छलांग तो लगाई, लेकिन सवाल यह उठता है कि सत्ता की दहलीज तक पहुंचते-पहुंचते उनके कदम हर बार क्यों ठिठक जाते हैं? जवाब छिपा है बंगाल के सामाजिक समीकरणों में। जहां 30% से अधिक मुस्लिम आबादी वाली 89 सीटों में से 87 पर TMC का कब्जा हो, वहां चुनाव की हार-जीत वोटिंग से पहले ही तय दिखने लगती है।

पश्चिम बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) का दबदबा सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि एक मजबूत सामाजिक और गणितीय समीकरण पर आधारित है। पिछले चुनावों के आंकड़े साफ बताते हैं कि यह समीकरण ही पार्टी को लगातार सत्ता तक पहुंचा रहा है।

मुस्लिम वोट: जीत की सबसे बड़ी चाबी

राज्य की 294 विधानसभा सीटों में सरकार बनाने के लिए 148 सीटों की जरूरत होती है। इनमें से 87 सीटें डायरेक्ट और 25 सीटें इनडायरेक्टली अर्थात 112, सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम मतदाता निर्नायक यानी कि 25% से अधिक हैं। 2021 के चुनाव में TMC ने इन 87 में 85 और 112 में से 106 सीटों पर कब्जा जमाया था। मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर दिनाजपुर जैसे जिलों में मुस्लिम आबादी 50% से ज्यादा है, जबकि दक्षिण 24 परगना और बीरभूम में यह 35% से अधिक है। 30% से ज्यादा मुस्लिम आबादी वाली 89 सीटों में से 87 सीटें TMC के खाते में गईं। 2021 में TMC को मुस्लिम वोटों का करीब 75% समर्थन मिला, जो 2016 के 70% से अधिक था। इसके उलट भाजपा इन इलाकों में लगभग शून्य पर सिमट गई।

चुनावी ट्रेंड: आंकड़ों में TMC की बढ़त

पश्चिम बंगाल का चुनावी परिदृश्य पिछले एक दशक में तीव्र ध्रुवीकरण और रणनीतिक वोट-स्विंग का गवाह रहा है। आंकड़ों का विश्लेषण करें तो तृणमूल कांग्रेस (TMC) की ताकत उसके निरंतर बढ़ते वोट शेयर में निहित है, जो 2016 के 44.91% से बढ़कर 2021 में 48.02% के शिखर पर पहुंच गया। इसके विपरीत, भाजपा का उत्थान 2019 के लोकसभा चुनावों में एक ‘ब्रेकथ्रू’ के रूप में दिखा, जहां पार्टी ने 40.6% वोट शेयर के साथ 18 सीटें जीतकर TMC को कड़ी चुनौती दी थी। 2016 से 2019 के बीच भाजपा का वोट शेयर 30% से ज्यादा बढ़ा, जिसका बड़ा कारण वाम और कांग्रेस के वोटों का ट्रांसफर था। CAA-NRC जैसे मुद्दों ने मटुआ और राजबंगशी समुदाय को भाजपा की ओर आकर्षित किया था।

हालांकि, हालिया रुझान बताते हैं कि भाजपा का ग्राफ 37-38% के दायरे में स्थिर हो गया है, जबकि ममता बनर्जी के नेतृत्व में TMC ने 2024 के लोकसभा चुनावों में 45% वोट शेयर के साथ 29 सीटें जीतकर अपने दुर्ग को पुनः अभेद्य बना लिया है। भाजपा के वोट शेयर में लगभग 3% की गिरावट छोटी लग सकती है, लेकिन फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट सिस्टम में इस 3% की कमी और TMC के 5% की बढ़त ने सीटों के अंतर को 138 (215 vs 77) तक पहुंचा दिया।

‘खेला होबे’ – 2021 में दीदी ने कैसे पलटा गेम?

2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने पश्चिम बंगाल में 18 सीटें जीतने के साथ-साथ, वोट-शेयर के मामले में भी टीएमसी के काफी करीब पहुंच गई थी। 2019 में CAA आने के बाद भाजपा मतुआ समुदाय के भरोसे बंगाल की सत्ता पर आसीन होने को उतावली हो रही थी। दूसरी तरफ, शारदा-नारदा के बाद तृणमूल एंटी-इकंबेंसी, भ्रष्टाचार और हिंसा के आरोपों से जूझ रही थी।

2021 में तृणमूल की वापसी का कारण केवल दीदी के चोट से उपजी सहानुभूति नहीं थी। 74 सीटिंग विधायकों का टिकट काट कर दीदी ने एंटी-इंकंबेंसी को लोकल लेवल पर ही कम कर दिया। मां, माटी, मानुष – बंगाली अस्मिता का सवाल उठाया, ‘जय श्री राम’ के नारे के बदले ‘जय मां दुर्गा’ का नारा दिया और बीजेपी के आक्रामक स्लोगनियरिंग को बंगाली संस्कृति के विरुद्ध बताया। बंगाली बनाम बाहरी अभियान के साथ ही लक्ष्मीर भंडार जैसी वेलफेयर स्कीम ने भी दीदी की वापसी में भूमिका निभाई। दुआरे सरकार जैसी योजना के माध्यम से प्रशासन को लोगों के दरवाजे तक पहुंचाकर TMC ने भाजपा के ‘भ्रष्टाचार’ वाले नैरेटिव को ‘सर्विस डिलीवरी’ से दबाने में कामयाब रही थी।

दूसरी तरफ अति-आत्मविश्वास की शिकार बीजेपी दीदी पर हमलावर रही जो बंगाली भद्रलोक को पसंद नहीं आया। ममता पर प्रधानमंत्री मोदी का ‘दीदी ओ दीदी’ तंज बैकफायर कर गया। न तो हिंदु वोटों का ध्रुवीकरण हुआ ना ही भगवा पार्टी बडे मतदाता समूह में अपना नियो-वोटर ग्रुप बना पाई। और तो और, टीएमसी से निकाले गए नेताओं को टिकट देकर भाजपा ने कार्यार्ताओं का भरोसा भी खो दिया। नतीजन ‘बंगाल-फतह’ का सपना तो टूटा ही, पार्टी का वोट-शेयर भी कम हो गया।

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TMC की ताकत: सिर्फ वोट नहीं, पूरा इकोसिस्टम

तृणमूल कांग्रेस (TMC) की राजनीतिक सफलता का रहस्य केवल चुनावी गणित में नहीं, बल्कि उसके संगठनात्मक ढांचे और प्रशासनिक पकड़ के बीच गहरे तालमेल में छिपा है। न केवल अल्पसंख्यक वोट-बैंक या बोहिरागोतो बनाम बंगाल की बेटी नैरेटिव ही नहीं बल्कि पार्टी ने ‘लक्ष्मीर भंडार’ और ‘कन्याश्री’ जैसी लक्षित कल्याणकारी योजनाओं के जरिए एक ऐसा वफादार महिला वोट बैंक तैयार किया है, जो सामाजिक सुरक्षा के लिए सीधे सरकार पर निर्भर है। इसके साथ ही, टीएमसी का संगठन राज्य के सुदूर गांवों तक Micro-level network की तरह फैला हुआ है, जहां बूथ स्तर के कार्यकर्ता और स्थानीय प्रशासन मिलकर पार्टी के ‘ग्राउंड गेम’ को अभेद्य बनाते हैं। यही कारण है कि भाजपा की राष्ट्रीय लहर और बड़े संसाधन भी बंगाल के इस जमीनी किले को भेदने में अक्सर नाकाम साबित होते हैं।

ममता की रणनीति: बांग्ला निजेर मेयेकेई चाय

2021 चुनाव में टीएमसी का सबसे प्रसिद्ध नारा था, ‘बांग्ला निजेर मेयेकेई चाय’ यानी कि बंगाल अपनी बेटी को ही चाहता है। इसने चुनाव को एक स्थानीय महिला (ममता) बनाम दिल्ली के शक्तिशाली पुरुषों (मोदी-शाह) की लड़ाई में बदल दिया। इसने महिला वोटरों के बीच एक रक्षात्मक भावना पैदा की, जिससे वे पार्टी लाइनों से ऊपर उठकर ममता के साथ खड़ी हो गईं। इस नैरेटिव ने उन बंगाली Elite और Middle Class वोटरों को भाजपा से दूर कर दिया, जो प्रशासन से नाराज तो थे, लेकिन अपनी सांस्कृतिक पहचान खोने को तैयार नहीं थे। यही कारण था कि अल्पसंख्यक वोटों से इतर, भ्रष्टाचार (सारदा, नारदा), हिंसा और कोविड प्रबंधन पर सवालों के बावजूद TMC ने 2021 में 60% हिंदू बहुल सीटों (182 में 109) पर जीत हासिल की।

टीएमसी अपने इस टेस्टेड फॉर्मूले पर ही इस बार भी बढ रही है। 99 प्रतिशत अल्पसंख्यक वोट तो सुनिश्चित है ही जो करीब 100 सीटों पर पार्टी की जीत तय कर सकती है और बहुमत के लिए शेष सीटों के लिए ममता बनर्जी ने इस बार भी बंगाली अस्मिता, बोहिर्गोतो, कल्याण योजना के साथ-साथ दिल्ली बनाम कोलकाता की जंग का चक्रव्यूह बुन चुकी है।

भाजपा के हथियार से भाजपा को मात देने की तैय्यारी

जैसे भाजपा ने 2019 और 2024 में नारा दिया था कि उम्मीदवार नहीं प्रधानमंत्री मोदी को देखिए, ठीक उसी तरह दीदी भी इस बार बीजेपी के हथियार से ही बीजेपी के शिकार करने की योजना बना रही है। तृणमूल ने इस बार नारा दिया है, ‘हर सीट से ममता दीदी’। यह पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक ‘मास्टरस्ट्रोक पलटवार’ की तरह देखा जा रहा है। टीएमसी ने भाजपा के ‘चेहरा-आधारित चुनाव’ (Presidential-style campaign) के हथियार को ही भाजपा के खिलाफ इस्तेमाल करने की रणनीति बनाई है।

जब चुनाव ‘उम्मीदवार’ के बजाय ‘सर्वोच्च नेता’ पर केंद्रित हो जाता है, तो स्थानीय विधायकों या सांसदों के प्रति जनता की नाराजगी गौण हो जाती है। ममता बनर्जी की छवि आज भी बंगाल के ग्रामीण क्षेत्रों में untainted मानी जाती है, जबकि उनके कई नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं। ‘हर सीट पर दीदी’ बोलकर पार्टी स्थानीय नेताओं की गलतियों को ममता के व्यक्तित्व के पीछे छिपाने की कोशिश कर रही है।

2026 में भागवा दल की चुनौतियां

भाजपा के लिए पश्चिम बंगाल में ‘सत्ता की राह’ केवल ध्रुवीकरण पर नहीं, बल्कि संगठनात्मक गहराई और नेतृत्व की स्वीकार्यता पर टिकी है। 2021 के आंकड़ों ने यह स्पष्ट कर दिया कि भाजपा हिंदू-बहुल क्षेत्रों में भी तब तक बहुमत नहीं पा सकती, जब तक वह ममता बनर्जी के व्यक्तिगत ‘ब्रांड’ और ग्रामीण नेटवर्क की काट नहीं ढूंढ लेती। बंगाल में भाजपा की चुनौतियों को तीन प्वाइंट्स में समझ सकते हैं:

स्थानीय चेहरे का अभाव – बंगाल में चुनाव अक्सर ‘ममता बनाम कौन?’ पर टिक जाता है। मोदी-शाह के चेहरे वोट तो दिलाते हैं, लेकिन मुख्यमंत्री पद के लिए एक बंगाली चेहरे की कमी भाजपा को ‘बाहरी’ साबित करने में TMC की मदद करती है।

आंतरिक असंतोष – पुराने भाजपा कार्यकर्ताओं (Old Guard) और TMC से आए नए नेताओं के बीच तालमेल की कमी ने पार्टी के जमीनी काम को प्रभावित किया है। टिकट बंटवारे में ‘आयातित’ नेताओं को प्राथमिकता देना कैडर को निराश करता है। हालांकि भाजपा इस बार काफी फूंक-फूंक कर कदम उठा रही है और टिकट बंटवारे में भाजपा कार्यकर्त्ताओं के साथ-साथ क्षेत्रीय संतुलन का भी ध्यान रखा है।

संगठनात्मक शून्य – भाजपा का ‘बूथ प्रबंधन’ अभी भी TMC के दशकों पुराने नेटवर्क के सामने कमजोर है। चुनाव के दिन मतदाताओं को बूथ तक लाने और सुरक्षा सुनिश्चित करने में पार्टी को संघर्ष करना पड़ता है। खासकर, सुदूर ग्रामीण अंचल में भगवा दल की यह कमजोरी अंततः तृणमूल का मार्ग प्रशस्त करती है।

भाजपा ने 182 हिंदू-बहुल सीटों में से केवल 72 जीतीं। इसका मतलब है कि 60% हिंदू-बहुल सीटों पर भी ममता बनर्जी की पकड़ मजबूत है। भाजपा की असल चुनौती मुस्लिम वोट नहीं, बल्कि उस ‘सेक्युलर हिंदू’ और ‘महिला’ वोटर को जीतना है जो भाजपा की आक्रामकता से डरता है।

बीजेपी के लिए उम्मीद की किरण

  • 1. मटुआ और राजबंगशी कार्ड (CAA का क्रियान्वयन) उत्तर बंगाल और दक्षिण के कुछ हिस्सों में मटुआ समुदाय निर्णायक है। CAA के नियमों को लागू करना भाजपा के लिए अपनी साख बचाने जैसा है। यदि पार्टी इस समुदाय का पूर्ण विश्वास जीत लेती है, तो वह 30-40 सीटों पर अपनी बढ़त पक्की कर सकती है।
  • 2. महिला वोट बैंक में सेंध TMC का सबसे बड़ा हथियार ‘लक्ष्मीर भंडार’ है। भाजपा को इसके मुकाबले न केवल एक बड़ा आर्थिक वादा करना होगा, बल्कि महिला सुरक्षा (संदेशखाली जैसे मुद्दे) को बंगाली अस्मिता से जोड़कर महिलाओं के बीच ‘डर’ को ‘बदलाव की इच्छा’ में बदलना होगा।
  • 3. सुवेंदु अधिकारी और ‘माटी का लाल’ रणनीति सुवेंदु अधिकारी आज भाजपा के सबसे मुखर बंगाली चेहरे हैं। भाजपा को उन्हें एक ‘क्षेत्रीय सेनापति’ के रूप में और अधिक स्वायत्तता देनी होगी ताकि वे ‘बोहिरागोतो’ (बाहरी) वाले नैरेटिव को खत्म कर सकें। सुवेंदु के साथ ही इस बार दिलीप घोष भी मैदान में डटे हैं और कोई ‘मुकुल रॉय’ नहीं है।
  • 4. संदेशखाली की घटना 2024 के लोकसभा चुनावों से ठीक पहले बंगाल की राजनीति में एक बड़ा मोड़ बनकर उभरी थी। भाजपा ने इसे ‘महिला सुरक्षा’ और ‘ममता बनर्जी की विफल कानून व्यवस्था’ के प्रतीक के रूप में पेश किया और इसका आंशिक लाभ भी बीजेपी को मिला था। इस चुनाव में भाजपा आरजीकर पीडिता की मां को टिकट देकर तृणमूल के खाते से कुछ महिला वोट खिसकाने की उम्मीद कर रही है।

क्या 2026 में बदलेगा बंगाल समीकरण?

बंगाल का चुनावी गणित फिलहाल TMC के पाले में नज़र आता है। भ्रष्टाचार के आरोप, हिंसा की खबरें और जबरदस्त एंटी-इनकंबेंसी; इसके बावजूद ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) का ग्राफ नीचे गिरने के बजाय ऊपर बढ रहा है? अभी तक भाजपा का ‘ध्रुवीकरण’ का दांव बंगाल की माटी पर बेअसर साबित हो रहा है। हमायूं कबीर के स्टिंग में बीजेपी से पैसे लेने वाली वीडियो वायरल होने और ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम का उनसे गठबंधन तोडने के बाद मुस्लिम वोट-बैंक के बंटने का कोई डर नहीं रह गया है।

उधर, भाजपा के लिए चुनौती साफ है – अगर हिंदू वोट 80% से ज्यादा एकजुट नहीं होते और लोकल स्ट्रक्चर मजबूत नहीं होता, तो सत्ता परिवर्तन मुश्किल बना रहेगा। मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण (SIR) के बाद बीजेपी की कुछ उम्मीदे जरूर बढी होंगी लेकिन आंकड़े बताते हैं कि बंगाल में चुनाव सिर्फ मुद्दों से नहीं, बल्कि सामाजिक समीकरण और वोट मैनेजमेंट से जीते जाते हैं।

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English summary

West Bengal Elections 2026: Mamata Banerjee vs BJP Bengal Electoral History Analysis

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