राजनीति और कूटनीति में कहा जाता है कि कोई स्थायी दुश्मन या दोस्त नहीं होता, सिर्फ स्थायी हित होते हैं. भारत की विदेश नीति इसी सिद्धांत पर चल रही है. फरवरी 2026 के बजट में जब सरकार ने ईरान के चाबहार बंदरगाह के लिए फंड में भारी कटौती की या उसे नजरअंदाज किया, तो किसी को समझ नहीं आया. तमाम तरह के सवाल उठे. कहा गया कि भारत चाबहार से मुंह मोड़ रहा है. कुछ लोगों ने समझाने की कोशिश की कि भारत पहले ही पूरा पैसा खर्च नहीं कर पाया है, इसलिए और पैसे देने की जरूरत क्या है? मगर बात सिर्फ इतनी नहीं है. भारत अपने भविष्य को 5 पिलर्स पर खड़ा करना चाहता है. इनमें से चार पर काम तेजी से चल रहा है, लेकिन पांचवें पिलर IMEC कॉरिडोर ईरान और इजरायल की जंग के बीच फंस गया है.
भारत का फोकस इस वक्त पांच चीजों पर है. पहला, AI यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, दूसरा, डेटा जिसे भविष्य का नया तेल कहा जा रहा है. तीसरा, सेमीकंडक्टर चिप, जो इलेक्ट्रॉनिक्स और डिफेंस की रीढ़ है. चौथा न्यूक्लियर एनर्जी जिससे स्वच्छ बिजली बनती है और चौथा यूरोप तक एक्सपोर्ट का विस्तार और इसके लिए जरूरी था IMEC कॉरिडोर, जो यूरोप तक सामान पहुंचाने का सबसे तेज रास्ता है. लेकिन यहीं पेच है.
चार मोर्चों पर विजय की तैयारी
- AI और डेटा के लिए भारत ने अमेरिका से अपनी दोस्ती को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है. सिलिकॉन वैली और बेंगलुरु के बीच का पुल अब और मजबूत है.
- सेमीकंडक्टर के लिए जरूरी रेयर अर्थ मिनरल्स चाहिए. इसके लिए भारत ने चीन पर निर्भरता कम करने के लिए ब्राजील के साथ हाथ मिलाया है. ब्राजील के राष्ट्रपति की भारत यात्रा इसी रणनीति का हिस्सा थी. ऑस्ट्रेलिया से कनाडा तक साथ दे रहे हैं.
- न्यूक्लियर एनर्जी के लिए यूरेनियम की सप्लाई सुनिश्चित होनी चाहिए. इसके लिए भारत ने कनाडा से हाथ मिला लिया है. प्रधानमंत्री मार्क कार्नी खुद दो दिन पहले भारत में थे. भारत उन्हें वो दे रहा है जो उन्हें चाहिए, लेकिन बदले में यूरेनियम की गारंटी ले रहा है.
पांचवा पेंच: IMEC और ईरान का कांटा
भारत का सबसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट है इंडिया मिडिल ईस्ट यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर यानी IMEC. प्लान ये है कि मुंबई से सामान दुबई जाएगा, वहां से ट्रेन के जरिए सऊदी अरब और जॉर्डन होते हुए इजरायल के हैफा बंदरगाह पहुंचेगा, और फिर यूरोप के देशों में यह बिकेगा. इस रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा ईरान है. दुबई जाने वाले जहाजों को फारस की खाड़ी से गुजरना पड़ता है, जहां ईरान का दबदबा है. वहीं, कॉरिडोर का आखिरी सिरा ‘हाइफा’ (इजरायल) है, जिसे ईरान तबाह करने पर तुला है.
एक्सपर्ट कह रहे कि भारत को समझ आ गया कि ईरान, अरब देशों और इजरायल का साझा दुश्मन है. अगर भारत को अरब देशों और इजरायल के साथ व्यापार करना है, तो उसे ईरान से दूरी बनानी ही होगी. यही कारण है कि भारत ने राजनीतिक स्तर पर ईरान का त्याग कर दिया है.
कूटनीति में शोक की जगह नहीं
जब ईरान के शीर्ष नेतृत्व पर संकट आया, तो पूरी दुनिया ने देखा कि भारत के विदेश मंत्रालय के आधिकारिक हैंडल से वैसी संवेदनाएं व्यक्त नहीं हुईं जैसी उम्मीद की जा रही थी. यह भारत की ‘कोल्ड डिप्लोमेसी’ का हिस्सा है. मोदी सरकार का पूरा फोकस अब सऊदी अरब और यूएई के सुल्तानों के साथ तालमेल बिठाने पर है.
कड़वी दवाई है ईरान का पतन
भारत जानता है कि पश्चिमी देशों को निर्यात बढ़ाने के लिए उसे एक सुरक्षित रास्ते की जरूरत है. ईरान के साथ रहकर वह कभी भी सऊदी और इजरायल का पूर्ण विश्वास नहीं जीत सकता था. आज जो ईरान के साथ हो रहा है, वह भारत के लिए एक ‘कड़वी दवाई’ की तरह है. इस्लामिक ईरान का कमजोर होना भारत के IMEC कॉरिडोर के लिए रास्ता साफ कर सकता है. भारत ने अपने 5 एजेंडे तय कर लिए हैं और वह उन्हें हासिल करने के लिए किसी भी पुरानी दोस्ती की कुर्बानी देने को तैयार है.

