India
oi-Pallavi Kumari
NCERT Corruption In Judiciary Row: सुप्रीम कोर्ट ने कक्षा 8 की सोशल साइंस की किताब में शामिल ‘ज्यूडिशियल करप्शन’ चैप्टर को गंभीर मानते हुए इसपर पूरी तरह बैन लगा दी है। किताब की छपाई और बिक्री पर तत्काल प्रभाव से रोक लगी है। इस पूरे विवाद के बीच संसद में पेश एक डेटा ने बहस को नया मोड़ दे दिया।
लोकसभा में फरवरी 2026 में दी गई जानकारी के मुताबिक 2016 से 2025 के बीच देशभर में कार्यरत जजों के खिलाफ 8,600 से ज्यादा शिकायतें दर्ज की गईं। यह संख्या बताती है कि न्यायपालिका पर सवाल उठने की घटनाएं अपवाद नहीं रहीं, बल्कि लगातार दर्ज होती रही हैं।

किस साल कितनी शिकायतें? (Judicial Complaints Data)
NDTV रिपोर्ट के मुताबिक आंकड़ों के अनुसार 2024 में शिकायतों की संख्या सबसे ज्यादा रही, जब 1,170 शिकायतें दर्ज हुईं। इसके बाद 2025 में 1,102, वर्ष 2019 में 1,037 और 2022 में 1,012 शिकायतें सामने आईं। सबसे कम शिकायतें 2020 में दर्ज हुईं, जब यह संख्या 518 रही। इन आंकड़ों ने उस बहस को और गहरा कर दिया है, जो NCERT की किताब के एक चैप्टर से शुरू हुई थी।
मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली पीठ ने किताब में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ के उल्लेख पर सख्त आपत्ति जताई। अदालत ने केंद्र सरकार और National Council of Educational Research and Training यानी NCERT से जवाब तलब करते हुए कहा कि जिम्मेदार लोगों की पहचान करनी होगी। कोर्ट ने साफ कहा कि यह पता लगाना जरूरी है कि इस सामग्री के लिए कौन जवाबदेह है।
शिकायतों की जांच कैसे होती है? (In-House Mechanism)
व्यवस्था के तहत सुप्रीम कोर्ट के जजों और हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों के खिलाफ शिकायतें भारत के मुख्य न्यायाधीश के पास जाती हैं। हाईकोर्ट के जजों के मामलों को संबंधित हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश देखते हैं।
इन शिकायतों की प्रारंभिक जांच ‘इन-हाउस मैकेनिज्म’ के तहत होती है। अगर जवाब संतोषजनक न हो तो आंतरिक समिति बनाई जाती है। गंभीर मामले में समिति इस्तीफा देने की सिफारिश कर सकती है। जिला और निचली अदालतों के जजों पर अनुशासनात्मक नियंत्रण संबंधित हाईकोर्ट के पास होता है, जैसा कि संविधान के अनुच्छेद 235 में प्रावधान है।
चर्चित मामले जिन्होंने बढ़ाई बहस (Notable Cases)
हाल के सालों में कुछ मामलों ने न्यायपालिका की साख पर सवाल खड़े किए। मार्च 2025 में दिल्ली स्थित आवास से भारी मात्रा में जली हुई नकदी मिलने के बाद जस्टिस यशवंत वर्मा का मामला चर्चा में आया। बाद में आंतरिक जांच समिति ने उनके खिलाफ महाभियोग की सिफारिश की, जो अब सरकार के पास लंबित है।
एक अन्य मामले में जस्टिस शरद कुमार शर्मा ने अगस्त 2025 में एक सुनवाई से खुद को अलग कर लिया। यह मामला बायजू रविंद्रन से जुड़ी दिवाला कार्यवाही से संबंधित था, जिसमें Board of Control for Cricket in India द्वारा बकाया राशि का दावा किया गया था। जस्टिस शर्मा ने खुलकर कहा कि उन पर दबाव बनाने की कोशिश हुई।
2018 में रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल से जुड़े आरके मित्तल पर मुआवजे की रकम में गड़बड़ी का आरोप लगा। बाद में Enforcement Directorate ने जांच की और उन्हें पद से हटा दिया गया।
इससे पहले 2011 में सौमित्र सेन राज्यसभा द्वारा महाभियोग झेलने वाले स्वतंत्र भारत के पहले जज बने। वे लोकसभा में प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही इस्तीफा दे चुके थे।
सरकार बनाम न्यायपालिका टकराव
न्यायिक नियुक्ति आयोग कानून को लेकर भी सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच टकराव हुआ था। 2015 में अदालत ने संशोधन रद्द कर कॉलेजियम प्रणाली बरकरार रखी।
हाल के वर्षों में उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ और पूर्व कानून मंत्री किरेन रिजिजू के बयानों ने भी बहस को हवा दी। न्यायपालिका की शक्तियों, विशेषकर अनुच्छेद 142 के उपयोग पर तीखी टिप्पणियां हुईं।
इन सबके बीच NCERT की किताब पर उठा विवाद अब सिर्फ पाठ्यक्रम का मामला नहीं रह गया है। 8,600 शिकायतों का आंकड़ा यह संकेत देता है कि न्यायपालिका की जवाबदेही और पारदर्शिता पर सार्वजनिक चर्चा लगातार जारी है। सवाल अब यह है कि क्या इस बहस से सिस्टम और मजबूत होगा या टकराव और गहरा जाएगा।
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