Hawk News
  • Hindi News
  • Business
  • Education
  • Health
  • Jobs
  • Politics
  • Sports
  • Tech
  • All
  • Hindi News
  • Business
  • Education
  • Health
  • Jobs
  • Politics
  • Sports
  • Tech
  • All
Facebook Twitter Instagram
Monday, June 29
Facebook Twitter LinkedIn VKontakte
Hawk News
Banner
  • Hindi News
  • Business
  • Education
  • Health
  • Jobs
  • Politics
  • Sports
  • Tech
  • All
Hawk News
Home » All News » शब्दों के जादूगर थे मिश्रा जी, अपने को ‘वर्डस्मिथ’ कहना पसंद था! | rk Misra ji was Magician of words like himself to called wordsmith brajesh kumar singh article
Hindi News

शब्दों के जादूगर थे मिश्रा जी, अपने को ‘वर्डस्मिथ’ कहना पसंद था! | rk Misra ji was Magician of words like himself to called wordsmith brajesh kumar singh article

HawkNewsBy HawkNewsFebruary 23, 2026No Comments29 Mins Read
Facebook Twitter Pinterest LinkedIn Tumblr Email
Share
Facebook Twitter LinkedIn Pinterest Email
Total Views: 0

मशहूर पत्रकार आर के मिश्रा नहीं रहे. आज सुबह उनका अहमदाबाद में निधन हो गया. साढ़े पांच दशक की पत्रकारिता के दौरान मिश्रा जी ने न सिर्फ अपनी धाकड़ रिपोर्टिंग और बेहतरीन लेखों के जरिये अपनी पहचान बनाई, बल्कि किस्सागोई के अनूठे अंदाज से भी.

आज सुबह नींद खुली तो आदत के मुताबिक व्हाट्सएप मैसेज चेक करने लगा, करीब दो दर्जन संदेशों के बीच इमरान का भी छोटा सा संदेश पड़ा था. – दुखद सूचना, मिश्रा सर का आज तड़के निधन हो गया.

मिश्रा सर, यानी आर के मिश्रा. गुजरात को पिछले छह दशक से अपनी कर्मभूमि बनाने वाले धाकड़ पत्रकार, जिनकी रिपोर्टिंग और लेखों की जितनी चर्चा होती थी, उतनी ही उनकी लेखनी की, शानदार अंग्रेजी की. गुजरात में पत्रकार, जहां एक- दूसरे की खिंचाई में लगे रहते हैं, मिश्रा जी को नेशनल सीबीडी (चड्ढी बनियानधारी) का अगुआ कहा जाता था, लेकिन इसके उलट पहनावे से लेकर बातचीत के अंदाज तक, हमेशा कोई सैन्य अधिकारी होने का अहसास कराते थे मिश्रा जी.

आर के मिश्रा के चाहने वाले या तो उन्हें ‘मिश्रा जी’ कहते थे या फिर ‘मिश्रा सर’. मैं मिश्रा सर कहने वालों की पंक्ति में था, क्योंकि एक तो पत्रकारिता के प्रोफेशन में मुझसे तीन दशक सीनियर थे, साथ ही श्रद्धा का भाव भी था उनके प्रति.

मिश्रा जी के साथ मेरी पहली मुलाकात 1999 में हुई थी, जब मैं गुजरात गया था पहली बार. करीब डेढ़ दशक तक वहां लगातार रहने और उसके बाद दिल्ली एनसीआर शिफ्ट हो जाने के बावजूद रिश्ते वैसे ही सजीव बने रहे. वो कभी- कभार दिल्ली आते, तो मुझसे मिलते, मैं भी जब अहमदाबाद जाता, मिश्रा जी से मिलता.

मिश्रा जी से मेरी आखिरी मुलाकात इसी महीने (फरवरी 2026) की सात तारीख को हुई थी. लेकिन पहली बार उन्हें देखकर अच्छा नहीं लगा. बेड पर लेटे हुए थे मिश्रा जी, नाक पर ऑक्सीजन की नली खुंसी हुई, सांस लेने में संघर्ष कर रहे थे वो. उनकी आंखें खुली नहीं, कितनी बार आवाज मारी, लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं. कई बार उनकी सांस तेज हो जाती, घरघराहट बढ़ जाती.

मिश्रा जी की ये हालत देखकर मैंने उनकी पत्नी मीनाक्षी, बेटी राशि और बेटे शिखर की मौजूदगी में ही कहा, हे ईश्वर इन्हें अपने पास बुला लें. सामान्य तौर पर लोग किसी की तबीयत खराब हो, तो उस व्यक्ति के शीघ्र स्वस्थ होने और लंबी उम्र की प्रार्थना करने जाते हैं, लेकिन मैं इससे उलट उनके जाने की प्रार्थना कर रहा था. आखिर क्यों?

रस ले- लेकर किस्से सुनाने में माहिर थे मिश्रा जी और उनके सामने बैठे लोग चातक भाव से ये सुना करते थे, बीच में शायद ही कुछ बोलने की नौबत आती. उनके पत्रकार साथी गाड़ी में बैठे- बैठे घंटों, धाराप्रवाह बोलते मिश्रा जी से ये किस्से सुनते रहते थे और लंबा से लंबा सफर भी आराम से कट जाता था.

दरअसल, मिश्रा जी की ये बेचारगी मुझे परेशान कर रही थी, सता रही थी. पिछले कुछ वर्षो से वो कैंसर से पीड़ित थे, प्रोस्टेट का कैंसर हुआ था उन्हें. पहले भी अस्पताल में रहे, लेकिन काफी हद तक ठीक होकर आए. इसके बाद मामला आराम से चलता रहा, अपना 75वां जन्मदिन भी पिछले साल मना लिया उन्होंने, बेटे शिखर की शादी भी कर ली. लेकिन 2025 के नवंबर महीने से उनकी परेशानी काफी बढ़ गई थी. घर में ही गिर गये थे मिश्रा जी, अस्पताल लेकर जाया गया था. उसके बाद से अस्पताल आने- जाने का सिलसिला चलता रहा. फिर बोलना भी बंद कर दिया, ज्यादा समय सोते ही रहते थे, याददाश्त भी धीरे- धीरे जाती रही. कुछ दिनों पहले डॉक्टर ने कह दिया था, अब कुछ नहीं हो सकता, दवा भी बंद कर दी. परिवार वालों को सलाह दी, घर लेकर जाएं और ईश्वर से प्रार्थना करें.

ऐसी हालत में ही मिश्रा जी का 76वां जन्मदिन इस पांच फरवरी को बीत गया, उन्हें अंदाजा भी नहीं लगा. न तो उन्हें दर्द का अहसास रहा था और न ही खुशी का, उनके दिमाग में इस तरह की कोई लहर पैदा ही नहीं हो रही. कैंसर की ट्रीटमेंट के दौरान इस तरह का अहसास कराने वाला दिमाग का हिस्सा भी क्षतिग्रस्त हो गया था.

मिश्रा जी की खराब हालत जानकर ही मैं दिल्ली से आया था उन्हें देखने के लिए. मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि जिस व्यक्ति ने अपने स्वास्थ्य का इतना ध्यान शुरूआती दिनों से ही रखा हो, जब तक पांवों में ताकत रही, लगातार टहलता रहा हो, उस व्यक्ति को प्रोस्टेट का कैंसर हो जाए और फिर वो दिमागी पक्षाघात का शिकार हो जाए, भला कैसे.
इससे पहले जब 29 सितंबर 2025 को अहमदाबाद आया था मिश्रा जी से मिलने, तो मैंने मजाक भी किया था. बोला था- आपने जिन दो अंगों- दिमाग और प्रोस्टेट का सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया, वही धोखा दे गये, जबकि कहा ये जाता है कि इनका इस्तेमाल कम करें, तो समस्या हो जाती है.

बीमार, खराब हालत में भी मिश्रा जी मेरी बात सुनकर हंस पड़े थे. उनको अपने उपर हंसना मंजूर था, व्यंग्य का शिकार होना मंजूर था. साथियों से, वरिष्ठों से, कनिष्ठों से, जिंदगी भर ये सुना था. अपने बारे में कुछ सुनने के लिए लोगों को छेड़ना भी उन्हें पसंद था. असाध्य बीमारी से जूझ रहे मिश्रा जी का स्वभाव जिंदगी के आखिरी वर्षों में भी बदला नहीं था. इस सात फरवरी की शाम भी उन्हें छेड़ने का इरादा था मेरा, काश वो सुनने और समझने की स्थिति में होते, इसका लु्त्फ ले पाते!

जबरदस्‍त किस्‍सागो

हालांकि मिश्रा जी सुनने से ज्यादा सुनाने में यकीन करते थे. जबरदस्त किस्सागो थे, किस्सागोई उनकी रग- रग में शामिल थी. आप उनके पास बैठे रहते थे, वो घंटो किस्से सुनाते रहते थे, एक से बढ़कर एक. गीर के शेरों से लेकर काठियावाड़ के सट्टेबाजों तक, खालिस्तानी उग्रवादियों से लेकर गुजरात के नेताओं, अधिकारियों, पत्रकारों से जुड़े हजारों किस्से.

रस ले- लेकर किस्से सुनाने में माहिर थे मिश्रा जी और उनके सामने बैठे लोग चातक भाव से ये सुना करते थे, बीच में शायद ही कुछ बोलने की नौबत आती. उनके पत्रकार साथी गाड़ी में बैठे- बैठे घंटों, धाराप्रवाह बोलते मिश्रा जी से ये किस्से सुनते रहते थे और लंबा से लंबा सफर भी आराम से कट जाता था.

मेरा भी मिश्रा जी से जुड़ाव उनकी इसी किस्सागोई की वजह से हुआ था, साथ में एक और कारण भी था. मिश्रा जी उन गिने- चुने पत्रकारों में से थे, जो अपने पहनावे, सज- धज, बातचीत के धाकड़ अंदाज, अंग्रेजी पर अदभुत पकड़ और विशद ज्ञान से सामने वाले को आसानी से अपने प्रेम जाल में फंसा लेते थे. वो आतंकित नहीं करते थे, कनिष्ठ से कनिष्ठ पत्रकार को संबल देते थे.

मिश्रा जी किस्‍सागोई में भी काफी माहिर थे.

फौजी वाला अंदाज

उनकी मूंछें ट्रेड मार्क थीं, कड़ी, घनी, उपर की तरफ तनी हुईं. अगर आपको जनरल नाथू सिंह की याद हो, तो कुछ उसी अंदाज में. मिश्रा जी की चाल- ढाल फौजी थी, किसी भी औपचारिक मौके पर सूट- टाई में नजर आते थे वो. कोई भी पहली नजर में उन्हें फौज का अधिकारी ही समझे.

फौज को लेकर उनके मन में काफी श्रद्धा थी, सेना में चयन हो भी गया था, लेकिन दादी के मना करने पर ज्वाइन नहीं कर पाए. खास बात ये थी कि उनका नामकरण भी देश के पहले सेनाध्यक्ष जनरल राजेंद्र सिंह जी ने किया था, अपना नाम दिया था इन्हें. इस तरह राजेंद्र कुमार मिश्रा नाम रखा गया था इनका, लेकिन पूरी जिंदगी आरके मिश्रा के तौर पर जाने गये, साथियों, परिचितों के बीच.

उनका एक दूसरा परिचय भी था. मूंछों वाले मिश्रा जी, मुच्छड़ के तौर पर मशहूर थे वो. ज्यादातर पत्रकार, नेता, अधिकारी उन्हें याद करते समय उनकी मूंछों की चर्चा करते थे. सियासत में काफी उंची छलांग लगाने वाले कई नेता, जो कभी मिश्रा जी की लेखनी का शिकार रहे थे, व्यंग्य या कड़वाहट के भाव के साथ उनके बारे में जानने की कोशिश भी करते थे, तो पूछते थे कि क्या हाल है ‘मूंछ’ का.

आत्‍मकथा लिखने का सिलसिला बीच में ही टूटा

दोस्त और दुश्मन बराबर थे उनके, विवाद से नाता भी बना रहा मिश्रा जी का. लेकिन इन सबके बीच मिश्रा जी की लेखनी लगातार चलती रही, बाद के दिनों में टाइप राइटर की खटखट और आखिरी दो दशकों में कंप्यूटर कीबोर्ड पर तेजी से उंगुलियां चलाते रहे वो. कोई भी लेख शुरू करने के बाद पूरा करने में ही यकीन रखते थे वो.

अफसोस इस बात का रहेगा कि ‘लिक्खाड़’ मिश्रा जी अपनी आत्मकथा को अंतिम रूप नहीं दे पाए. बचपन से लेकर राजकोट दिनों तक के ही किस्से वो लिख पाए थे, करीब पैंसठ हजार शब्दों में उनको अपने निजी कंप्यूटर पर समेट पाए. बहुत कुछ लिखना बाकी था, लेकिन स्वास्थ्य ने उन्हें धोखा दे दिया. इसका अफसोस न सिर्फ उन्हें रहेगा, बल्कि उनके चाहने वालों को भी.

मिश्रा जी हितवाद, नागपुर और डेली पोस्ट, चंडीगढ़ के साथ आउटलुक और बेंगलुरु से प्रकाशित होने वाली एजुकेशन वर्ल्ड पत्रिका के लिए भी लिखते रहे वो. यही नहीं, दुबई से प्रकाशित होने वाले गल्फ न्यूज़ और सउदी अरब से प्रकाशित होने वाले अरब न्यूज़ के लिए भी बीच- बीच में लिखते रहे, ट्रिब्यून, चंडीगढ़ और विजय टाइम्स, बेंगलुरु के लिए भी.

अगर मिश्रा जी सारे किस्से लिख देते, तो न सिर्फ गुजरात की सियासत, पत्रकारिता, समाज की दृष्टि से महत्वपूर्ण खजाना इकट्ठा हो जाता, बल्कि पाठकों के लिए काफी भी रोचक रहता. उनके पास ऐसे- ऐसे किस्से थे, जो सुनकर आप हैरान हो जाएं, हंसते- हंसते लोटपोट हो जाएं.

मिश्रा जी से सुने हुए हजारों किस्से मेरे भी जेहन में हैं, उनके बचपन से लेकर जवानी और जवानी से लेकर नाना बन चुकने के बाद तक के किस्से. इन किस्सों में रहस्य भी है, रोमांच भी है, गुदगुदी भी है और अट्टहास भी. मिश्रा जी को खुद अट्टहास करना पसंद था, उनके किस्से सुनकर लोग भी हंस- हंसकर पागल हो जाते थे. ऐसे ही लोगों में से एक मैं भी था.

प्रिंस फिलिप की वो कहानी

मिश्रा जी बड़े चाव से बताया करते थे कि कैसे जब जूनागढ़ में प्रिंस फिलिप का आना हुआ था 1983 में, एशियाई मूल के सिंहों को देखने के लिए, तो लाख कोशिशों के बावजूद वन विभाग के अधिकारी अपने मेहमान को शेर नहीं दिखा पाए थे, वनराज ने युवराज को दर्शन देने से इंकार कर दिया था.

उस समय राज्य में माधवसिंह सोलंकी की अगुआई में सरकार चल रही थी, अमरसिंह चौधरी उनकी कैबिनेट में मंत्री थे, प्रोटोकॉल की जिम्मेदारी भी उन्हीं की थी. प्रिंस फिलिप के आगमन के मद्देनजर गुजरात सरकार ने ढेर सारी तैयारियां की थीं. दिल्ली में भी इंदिरा गांधी की अगुआई में कांग्रेस का ही शासन था.

दिल्ली से भी साफ निर्देश था कि प्रिंस फिलिप का गुजरात दौरा ढंग से होना चाहिए, 17 नवंबर 1983 को महारानी एलिजाबेथ द्वितीय के साथ दिल्ली पहुंचे थे प्रिंस फिलिप. लेकिन उनका मन दिल्ली में कहां लगना था, वो तो वन्य प्राणियों के शौकीन थे. इसलिए वो गुजरात के दौरे पर आए, उन्हें एशियाई सिंहों की अंतिम शरणस्थली के तौर पर मशहूर गीर अभ्यारण्य में वनराज के दर्शन करने थे.

प्रिंस फिलिप के गीर दौरे को सफल बनाने के लिए वन विभाग ने जोरदार तैयारी की थी. उस वक्त जूनागढ़ में सीसीएफ- वाइल्डलाइफ रहे पीबी लाखाणी की अगुआई में ये तय किया गया था कि सासण के नेशनल पार्क में किस रूट पर प्रिंस फिलिप को लेकर जाया जाएगा और वनराज के दर्शन कराये जाएंगे.

इसके लिए वन विभाग के कर्मचारियों ने एडवांस में ही पाड़ा भी बांध दिया था, ताकि आसान शिकार के चक्कर में शेर आसपास ही रहें और वो आराम से अपने मेहमान को वनराज के दर्शन करा सकें.

इस हाई प्रोफाइल दौरे की कवरेज के लिए मिश्रा जी भी अपने साथियों के साथ जूनागढ़ पहुंचे. इरादा था कि रात में जूनागढ़ के सर्किट हाउस में सोएंगे और तड़के चार बजे के करीब यहां से निकल जाएंगे सासण, प्रिंस फिलिप के गीर दौरे की रिपोर्टिंग के लिए.

लेकिन शाम में सर्किट हाउस में रूटीन के मुताबिक महफिल जमाए मिश्रा जी और उनके पत्रकार साथियों को यहां के एक कर्मचारी से ही जो सूचना हासिल हुई, उससे इनके होश उड़ गये. डायनिंग हॉल में वन और पुलिस अधिकारियों की बात सुनते हुए इस कर्मचारी को ये ध्यान में आ गया था कि सुबह चार बजे से ही जूनागढ़ से सासण की ओर जाने वाली सड़क पर पुलिस का नाका लग जाएगा और ऊपरी अधिकारियों की सूचना के मुताबिक पत्रकारों को आगे नहीं जाने दिया जाएगा. सरकार या अधिकारी ये नहीं चाहते थे कि पत्रकार सासण पहुंचे और प्रिस फिलिप के दौरे की कोई नुक्ताचीनी कर सकें.

मिश्रा जी अपने बेटे की शादी में. 

जब पुलिस से पहले पहुंच गए

ये जानकारी हासिल होते ही मिश्रा जी की अगुआई में पत्रकारों की टोली बिना खाना- पीना पूरा किये निकल पड़ी. एक वैन में बैठे ये रात दो बजे सासण पहुंच गये, पुलिस और वन विभाग के कर्मचारी तो सुबह चार बजे से इन्हें रोकने के लिए नाका लगाने वाले थे.

वन विभाग के गेस्ट हाउस सिंह सदन पहुंचने पर जब इन्हें कोई कमरा नहीं मिला, तो ये स्टोर में ही घुस गये और यहां रखे गद्दों के बीच घुसकर किसी तरह रात निकाली. सुबह जब गद्दों के ढेर से ये सब बाहर निकले, तो ज्यादातर के कपड़ों और मुंह पर रूई लगी हुई थी. उस जमाने में सामान्य ढंग से भरी हुई रूई के गद्दे होते थे, आज की तरह के मैट्रेस नहीं.

जब ये लोग कमरे से बाहर आए, तो वन विभाग और पुलिस अधिकारियों को पता चला कि उनके घर में सेंध लग गई है. कुछ कर तो सकते नहीं थे, यहां से भगा नहीं सकते थे पत्रकारों को. गुस्से में ये जरूर किया कि जंगल के अंदर किसी भी पत्रकार को लेकर नहीं गये.

वन विभाग ने प्रिंस फिलिप के कद को देखते हुए तड़के की जगह सुबह नौ बजे उन्हें आराम से जंगल में लेकर जाना तय किया था, जबकि पौं फटते वक्त शेर के दिखने के चांस सबसे अधिक होते हैं. लेकिन वन विभाग के अधिकारियों को तो प्रिंस फिलिप की सुविधा की पड़ी थी, उन्हें वनराज तो अपने नियंत्रण में ही महसूस हो रहे थे.

लेकिन काश ऐसा हो पाता. वनराज, जिस जगह पर पाड़ा बांधा गया था, उसका पहले ही शिकार करके जंगल की घनी झाड़ियों में जाकर आराम से बैठ गये. नतीजा ये हुआ कि लाख कोशिशों के बावजूद वन विभाग के अधिकारी युवराज को वनराज के दर्शन नहीं करा पाए.

प्रिंस फिलिप हुए निराश

प्रिंस फिलिप निराश तो हुए ही, शर्म के मारे वन विभाग के कर्मचारियों ने उनके लिए काठियावाड़ी घोड़ों का प्रदर्शन रखा और घोड़े की नाल दिखाकर हालात को संभालने की कोशिश की. ये सारा किस्सा मिश्रा जी एंड कंपनी को अपने उस खास कर्मचारी से पता चल गया, जिसे इन लोगों ने धीरे से फिट कर दिया था प्रिंस फिलिप के काफिले में, जब वो जंगल में जा रहे थे शेर देखने की लालसा लिये.

अगले दिन जब ये पूरी रसदार खबर अखबारों में छपी, तो गुजरात सरकार और अधिकारियों ने अपना सिर पीट लिया, लेकिन मिश्रा जी खुश, आखिर अधिकारियों की तमाम साजिशों के बावजूद वो रिपोर्टिंग मिशन में कामयाब रहे थे.

दशकों तक ग्राउंड रिपोर्टिंग

वसौराष्ट्र से लेकर सूरत, कश्मीर से लेकर दीव, दशकों तक लगातार ग्राउंड रिपोर्टिंग करने वाले मिश्रा जी की कर्मभूमि मोटे तौर पर गुजरात ही रही, हालांकि जन्मभूमि थी उत्तर प्रदेश. उत्तर प्रदेश के एक महत्वपूर्ण, ऐतिहासिक गांव से उनके ताल्लुकात थे. ये गांव था बदरखा, जो देश- दुनिया में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अमर सेनानी, क्रांतिकारी, बलिदानी चंद्रशेखर आजाद की भूमि के तौर पर मशहूर है.

मिश्रा जी अपने पुरखों की कहानी सुनाते हुए 19वीं- 20वीं सदी का इतिहास भी बताते जाते थे, खास तौर पर उत्तर प्रदेश और सौराष्ट्र का, दोनों के कनेक्शन का भी. ये कहानी इतिहास में रुचि रखने वाले किसी भी आदमी के लिए रोमांचक थी.

मिश्रा जी के पुरखों के गांव बदरखा में 19वीं सदी की शुरुआत में ज्यादातर ब्राह्मण परिवार ही हुआ करते थे, कनौजिया ब्राह्मण. तीन कनौजिया, तेरह चूल्हा मुहावरा काफी मशहूर है, कनौजियों के आपस में झगड़ते रहने के कारण. लेकिन 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान ये सामूहिक तौर पर अंग्रेजों से झगड़े थे, उनके खिलाफ लड़े थे. इस वजह से 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेजों ने फौज से बड़े पैमाने पर ब्राह्मणों को निकाला. मिश्रा जी के भी पूर्वज फौज से निकाले गये और आजीविका की तलाश में ग्वालियर आ गये, यहां सिंधिया की सेना में शामिल हो गये. यही के सिंधिया स्टेट लांसर्स का कुछ हिस्सा बाद में सौराष्ट्र के अंदर की बड़ी रियासतों में से एक के तौर पर मशहूर नवानगर के महाराजा को गिफ्ट में मिला.

दलीप सिंह ने मनवाया क्रिकेट का लोहा

लांसर्स के इस हिस्से के साथ ही मिश्रा जी के परदादा शिवनारायण मिश्रा का जामनगर आना हुआ. जामनगर नवानगर रियासत का मुख्यालय, रियासत के शासक जाम साहब के तौर पर मशहूर. जब भारत की आजादी के वक्त काठियावाड़ की तमाम रियासतों के विलय कर सौराष्ट्र के तौर पर नया राज्य बना, तो इसके पहले राजप्रमुख इसी नवानगर रियासत के महाराजा दिग्विजयसिंह बने. दिग्विजयसिंह की काफी बड़ी भूमिका सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण में भी रही.

नवानगर- जामनगर रणजी और दलीपसिंह के लिए भी मशहूर है, आखिर विश्व क्रिकेट में बड़ा मुकाम हासिल करने वाले रणजी इसी नवानगर- जामनगर के महाराजा थे. उनके भतीजे दलीप सिंह ने भी जामनगर से ही निकलकर पूरी दुनिया में बेहतरीन क्रिकेटर के तौर पर अपना लोहा मनवाया था. रणजी और दलीप ट्रॉफी आज भी इन दोनों की याद दिलाती है.

रणजी की राजधानी जामनगर में आने के बाद शिव नारायण मिश्रा ने नवानगर रियासत की पुलिस में भी काम किया. इसी दौरान उनके बेटे द्वारका प्रसाद मिश्रा की स्कूली पढ़ाई जामनगर में हुई, कॉलेज की पढ़ाई के लिए गये जूनागढ़, वहां नवाबी समय में स्थापित किये गये बहाउद्दीन कॉलेज से उनकी आगे की पढ़ाई हुई.

स्कूल की पढ़ाई के दौरान द्वारका प्रसाद मिश्रा की दोस्ती नवानगर राज परिवार से ताल्लुक रखने वाले राजेंद्रसिंहजी से हुई, जो आगे चलकर स्वतंत्र भारत के पहले सेनाध्यक्ष बने. दोनों की दोस्ती ताउम्र रही, भारतीय सेना के प्रमुख बनने के बावजूद राजेंद्रसिंहजी लगातार द्वारका प्रसाद मिश्रा के संपर्क में रहे, उनके यहां आते- जाते रहे, उनकी पत्नी को अपनी मुंहबोली बहन बना लिया.

द्वारका प्रसाद मिश्रा ने बाद में लंदन जाकर लिंकन इन से कानून की पढ़ाई की. बैरिस्टर की पढ़ाई पूरी करने के बाद वो छैलशंकर दवे के मातहत के तौर पर डिप्टी पुलिस कमिश्नर बने. इन्हीं छैलशंकर दवे के नाम पर गुजरात पुलिस का ट्रेनिंग कॉलेज जूनागढ़ में चलता है.

छैलशंकर दवे ने सौराष्ट्र के वहारवटियों (अग्रिम सूचना देकर लूट औह हत्या जैसे गंभीर अपराध को अंजाम देने वाले डाकू) के खिलाफ सफल अभियान चलाया था, जिसमें द्वारका प्रसाद मिश्रा का उन्हें भरपूर सहयोग मिला था. छैलशंकर दवे को सरदार पटेल की तरफ से राष्ट्रवीर कहा गया. उन्होंने न सिर्फ भावनगर में सरदार पर हुए हमले के दौरान फूर्ति के साथ उन्हें बचाया था, बल्कि रजवाड़ों की सेवा करते हुए भी स्वतंत्रता सेनानियों की भरपूर मदद की थी.

द्वारका प्रसाद मिश्रा बाद में पुलिस की नौकरी छोड़कर कई देसी रियासतों के कानूनी सलाहकार बने, जिसमें जामनगर, जूनागढ़ और राजकोट जैसी रियासतें शामिल थीं. इस दौरान उनकी गहरी दोस्ती एडमंड गिब्सन से हो गई, जो ब्रिटिश रेजिडेंट के तौर पर लंबे समय तक राजकोट में तैनात रहे, काठियावाड़ की तमाम रियासतों के साथ ब्रिटिश सरकार का तालमेल बनाये रखने के लिए.

रेजिडेंट का ऑफिस राजकोट में होने के कारण ब्रिटिश काल में ये शहर दो हिस्सों में बंटा था, एक हिस्सा रूलर (राजवी) राजकोट के तौर पर जाना जाता था, तो दूसरा हिस्सा ब्रिटिश राजकोट के तौर पर. शहर में त्रिकोणबाग के पास की सड़क सीमा रेखा थी इन दोनों हिस्सों के बीच. इसी त्रिकोणबाग पर उस ट्रामलाइन का भी एक स्टेशन था, जो ट्राम राजकोट और गोंडल के बीच चलती थी.

वेटरन फील्‍ड जर्नलिस्‍ट

अपने को हमेशा veteran field journalist के तौर पर पेश करने वाले मिश्रा जी का जन्म पांच फरवरी 1950 को हुआ था. इनका बचपन आगरा में बीता था, 64, ताज रोड के विशालकाय बंगले में, अपने दादा द्वारका प्रसाद मिश्रा की छाया में. ये विशालकाय बंगला भी जनरल राजेंद्र सिंह की वजह से ही मिला था. बतौर सेनाध्यक्ष जनरल साब ने आगरा कैंटोनमेंट का ये बंगला डि- मिलिट्राइज कर अपने दोस्त को एलॉट करवा दिया था, 49000 रुपये में. उस समय ये बड़ी कीमत थी, तब आईएएस अधिकारियों की तनख्वाह साढ़े तीन सौ रुपये हुआ करती थी. इस मामले में हिम्मतसिंह ने भी मदद की थी, जो तब रक्षा राज्यमंत्री हुआ करते थे. द्वारका प्रसाद मिश्रा ने हिम्मतसिंह के ओएसडी के तौर पर भी कुछ समय तक काम किया था.

आगरा से विद्यार्थी काल में आरके मिश्रा का गुजरात आना हुआ. कॉलेज के दौरान वो एलडी इंजीनियरिंग कॉलेज में रहे, जो अहमदाबाद का मशहूर कॉलेज था. इसी कॉलेज में पढ़ाई करते- करते ही मिश्रा जी को पत्रकारिता का चस्का लगा. इंजीनियर बनने की जगह पत्रकार बनने वाला ये किस्सा भी खासा रोचक है, जो मिश्रा जी बड़ी चाव से सुनाया करते थे.

आरके मिश्रा अपनी बालकनी में अपने मित्र-मंडली के साथ.

देवानंद के बड़े आशिक

कॉलेज में पढ़ाई कर रहे मिश्रा जी देवानंद के बड़े आशिक थे. देवानंद से जुड़ी हुई तमाम जानकारियां उनको मुंह जबानी याद रहती थीं, वो जमाना गुगल का नहीं था. अखबारों में फिल्मी खबरों का पूरा पेज होता था. अहमदाबाद से प्रकाशित होने वाले ‘गुजरात समाचार’ अखबार में तब राजेंद्र सेठ नामक पत्रकार फिल्म वाला पेज देखते थे. उनसे चाय की दुकान पर फिल्मी चर्चा के दौरान मिश्रा जी का परिचय हो गया. सेठ मिश्रा जी के फिल्मी ज्ञान से बड़े प्रभावित हुए थे, उन्हें आश्चर्य हुआ था कि इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ने वाले इस छात्र को फिल्मों के बारे में इतनी जानकारी कहां से है.

अखबार में पहली नौकरी

इन्हीं राजेंद्र सेठ ने 1967-68 के साल में अंग्रेजी अखबार ‘गुजरात हेराल्ड’ में मिश्रा जी को पहली नौकरी दिलाई. नौकरी मिली असिस्टेंट प्रूफ रीडर की, पार्ट टाइम जॉब था ये. गुजरात हेराल्ड की मालिकी तब ‘गुजरात समाचार’ समूह की ही होती थी, बाद के दिनों में ये अखबार उन्होंने बेच दिया अनिल शाह नामक व्यक्ति को. पहले गुजरात हेराल्ड भी गुजरात समाचार वाले भवन से ही प्रकाशित होता था.

मिश्रा जी को प्रूफ रीडिंग नहीं आती थी, लेकिन अखबार में काम करते हुए उन्होंने ये कला सीखी. उस जमाने में अंग्रेजी अखबारों में प्रूफ रीडिंग करने वाले ज्यादातर लोग रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी होते थे. इन ‘टायर्ड- रिटायर्ड’ लोगों के बीच ‘युवा’ मिश्रा जी जल्दी ही अपनी पहचान बनाने में कामयाब रहे.

प्रूफ रीडिंग सीखने के बाद लंबे समय तक उन्होंने यहां नाइट शिफ्ट में काम किया, जहां दिन वाले शिफ्ट में युसूफ खान आते थे, बतौर पत्रकार बाद में मशहूर हुए. इस अखबार के मैनेजर गणेशन नामक सज्जन हुआ करते थे, जो मिश्रा जी को काफी प्रोत्साहित करते थे. खाली समय में मिश्रा जी अखबारों को ध्यान से पढ़ा करते थे और देश- दुनिया के बारे में अपनी जानकारी का दायरा बढ़ाते थे.

जेम्स बांड पर पहला आर्टिकल

मिश्रा जी की अंग्रेजी स्कूल दिनों से ही अच्छी थी, इसलिए जल्दी ही प्रूफ रीडिंग में उन्होंने मास्टरी हासिल कर ली. पहले ये प्रूफ पढ़ते थे, फिर सीधे ‘गेली’ पर मार्क करते थे. ‘गुजरात हेराल्ड’ में जब सोमेश्वर राव संपादकीय प्रमुख के तौर पर आए, तो मिश्रा जी को लिखने का मौका मिला.

सोमेश्वर राव ने प्रूफ रीडिंग के साथ ही मिश्रा जी से लेख लिखवाने शुरू कर दिये. अपने जीवन का पहला आर्टिकल इन्होंने जेम्स बांड पर लिखा. अपनी समझ के हिसाब से मिश्रा जी ने काफी अच्छा लेख लिखा था, लेकिन राव ने इन्हें औकात पर ला दिया. एक बार नहीं, दो बार नहीं, बल्कि पूरे 18 बार इनकी कॉपी फाड़ कर फेंकी. 19वीं बार जो कॉपी मिश्रा जी ने लिखी, वो राव ने स्वीकृत की और फिर जाकर ये अखबार में छपी.

गुजरात हेराल्ड के बाद मिश्रा जी का अगला मुकाम था, ‘वेस्टर्न टाइम्स’. ये अखबार गुजरात के ही मशहूर पत्रकार रामू पटेल ने शुरू किया था. रामू पटेल एक समय पीटीआई में टीपी ऑपरेटर हुआ करते थे. यहां से अपने को मांजते हुए उन्होंने वेस्टर्न टाइम्स नाम से अंग्रेजी का अखबार शुरू किया.

एक जमाने में वेस्टर्न टाइम्स में मीडिया जगत की बड़ी- बड़ी हस्तियों ने काम किया. गुजरात हेराल्ड में जिन सोमेश्वर राव ने मिश्रा जी को मौका दिया था, उन्होंने भी पहले वेस्टर्न टाइम्स में काम किया था. सोमेश्वर राव ने बाद के दिनों में ‘मदरलैंड’ से अपनी पहचान बनाई.

जिस तरह से मिश्रा जी को राव ने मांजा था, मौका दिया था, उसी तरह सोमेश्वर राव को मौका दिया था ‘नागपुर टाइम्स’ के संपादक के तौर पर तरूण कुमार भादुड़ी ने. भादुड़ी आगे चलकर फिल्म एक्ट्रेस जया बच्चन के पिता के तौर पर ज्यादा जाने गये.

वेस्टर्न टाइम्स अहमदाबाद में ‘जनसत्ता’ प्रेस से छपता था, और तब तक छपता रहा, जब तक जनसत्ता को खुद ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के मालिक रामनाथ गोयनका ने खरीद नहीं लिया. इंडियन एक्सप्रेस की छपाई भी जनसत्ता प्रेस से ही शुरू हुई थी.

फिर टाइम्‍स ऑफ इंडिया पहुंचे मिश्रा जी

वेस्टर्न टाइम्स क बाद मिश्रा जी के कैरियर में एक बड़ा टर्न आया, जब उन्होंने 1973 में ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ अखबार ज्वाइन किया, इसका अहमदाबाद संस्करण कुछ साल पहले, 1968 में शुरू हुआ था. इस संस्करण को शुरू करने के लिए आधी टीम अलग- अलग एजेंसियों से आई थी, तो आधी टीम वेस्टर्न टाइम्स से आई, जहां मिश्रा जी खुद काम कर रहे थे उस वक्त.

जब मिश्रा जी ने टाइम्स ज्वाइन किया, वो समय गुजरात में आंदोलनों और तेज राजनीतिक बदलावों का था. नवनिर्माण आंदोलन के कारण चिमनभाई पटेल की सरकार गई थी, जिस आंदोलन में मिश्रा जी के अपने कॉलेज, एलडी इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्रों की बड़ी भूमिका रही थी.

गुजरात में वो पहला प्रयोग

चिमनभाई पटेल की सरकार जाने के बाद जब गुजरात में विधानसभा चुनाव हुए, तो बाबूभाई पटेल की अगुआई में राज्य में जनता मोर्चा की सरकार बनी. ये कांग्रेस के सामने साझा मोर्चा खड़ा कर चुनाव जीतने और फिर सरकार बनाने का देश में पहला सफल प्रयोग था, जिसमें सभी विचारधाराओं वाली पार्टियां एक साथ आईं.

टाइम्स ऑफ इंडिया के लिए ही काम करते हुए मिश्रा जी एक अप्रैल 1979 को राजकोट गये. अगले पांच साल उनके राजकोट में बीते. ये उनके जीवन के बेहतरीन वर्ष थे. जमकर जीवन का लुत्फ उठाया, धमाकेदार रिपोर्टिंग की मिश्रा जी ने. चाहे 1979 की मच्छू डैम ट्रेजेडी की कवरेज हो या फिर सौराष्ट्र- कच्छ के स्मगलरों, मटका ऑपरेटर्स या सट्टेबाजों से जुड़े बड़े खुलासे हों, मिश्रा जी अपनी ग्राउंड रिपोर्ट्स की वजह से मजबूत पहचान बना पाए.

इसी दौरान उनकी कई लोगों से दोस्ती हुई, जो लगातार चलती रही. इनमें रवि सक्सेना भी थे, जो गुजरात काडर में आईएएस अधिकारी के तौर पर नये- नये आए ही थे. राजकोट में सर्किट हाउस में रहने के दौरान ही सक्सेना से मिश्रा जी का परिचय हुआ, दोनों का संबंध उत्तर प्रदेश से, इसलिए दोस्ती गहरी हो गई, समय के साथ मजबूत भी.

राजकोट सर्किट हाउस में रहते हुए ही उनका यहां दो और लोगों से परिचय हुआ, जो आगे चलकर उनके लंगोटिया यार बन गये. एक थे मुकेश व्यास, दूसरे थे मधु दवे. व्यास इन्हीं के चक्कर में सर्किट हाउस की नौकरी छोड़कर पत्रकार बन गये और मिश्रा जी की तरह ही मूंछें रखने के कारण मूंछों वाले व्यास जी के तौर पर मशहूर हुए. कई लोग इन्हें मिश्रा जी का छोटा भाई ही कहते थे.

राजकोट में की धमाकेदार रिपोर्टिंग

राजकोट में रहते हुए अपनी येजडी मोटरसाइकिल पर पूरे सौराष्ट्र का चक्कर लगाया मिश्रा जी ने. जहां गये, वहीं से धमाकेदार स्टोरी लेकर आए मिश्रा जी. वो हमेशा गर्व से कहते थे, कही भी आंख बांधकर मुझे आप सौराष्ट्र में छोड़ दें, दो घंटे में ऐसी स्टोरी लिख डालूंगा, जो किसी भी अखबार के पेज 1 पर आराम से जगह पा जाएगी.

सौराष्ट्र से अपनी ग्राउंड रिपोर्टिंग के लिए मशहूर हो चुके मिश्रा जी का 1984 में सूरत तबादला हुआ. राजकोट की तरह सूरत भी गुजरात का एक और महत्वपूर्ण शहर, जो बाद के दिनों में डायमंड और टेक्सटाइल्स सिटी के तौर पर पूरी दुनिया में मशहूर हुआ.

सूरत में भी अगले तीन वर्षों तक धमाकेदार रिपोर्टिंग करते रहे मिश्रा जी. यहां भी उनकी रिहाइश सर्किट हाउस में ही रही. सूरत सर्किट हाउस का कमरा नंबर 25 बना मिश्रा जी का अड्डा. कहां नियम ये कहता है कि आप सर्किट हाउस में सात दिन से ज्यादा लगातार नहीं रह सकते और कहां मिश्रा जी, हफ्ते तो कौन कहे, महीना भी नहीं, पूरे तीन साल तक सूरत के सर्किट हाउस में विराजमान रहे. आज भी सूरत सर्किट हाउस में काम कर चुके पुराने कर्मचारी 25 नंबर कमरे को मिश्रा जी के कमरे के तौर पर ही याद करते हैं.

सर्किट हाउस में रहने की वो खास वजह

दरअसल चाहे राजकोट हो या सूरत, सर्किट हाउस में रहने की मिश्रा जी के पास खास वजह थी. एक तो यहां रहने पर भोजन से लेकर कपड़े की धुलाई तक, किसी बात की चिंता करने की आवश्यकता नहीं पड़ती थी, लेकिन इससे भी बड़ी बात ये थी कि सर्किट हाउस खबरों का खजाना हुआ करता था. यहां पर मंत्री, नेता, नौकरशाह, पुलिस अधिकारी सभी आकर रुकते थे, सर्किट हाउस के कर्मचारियों को सब पता रहता था. कौन किससे मिलने आ रहा है, किसलिए आ रहा है, क्या- क्या बात हुई, सारी सूचना मिश्रा जी को सर्किट हाउस के कर्मचारियों से मिल जाती थी, जो उनके खास थे, मुरीद थे, हमप्याले थे.

सूरत सर्किट हाउस में रहते हुए ही मिश्रा जी को ध्यान में आया था कि किस तरह कांग्रेस की एक महिला नेता, जो गुजरात की तत्कालीन सरकार में एक मालदार विभाग के अंदर उपमंत्री थीं, हफ्ते भर तक रहकर किस ‘विशेष मिशन’ को अंजाम दिया था. मिश्रा जी को सर्किट हाउस के कर्मचारियों के जरिये ही पता चला कि ‘मंत्रीश्री’ ने अपने लिए एलॉट हुए वीआईपी-2 कमरे में वीसीपी की व्यवस्था कराई है, साथ में टीवी भी मंगाया हुआ है.

उस जमाने में सर्किट हाउस के कमरों में टीवी नहीं होते थे, इसलिए वीसीपी के साथ टीवी भी बाहर से इस महिला नेत्री ने मंगवाया था. टीवी के साथ जोड़कर वो फिल्में देखती रही थीं, पांच दिन के अपने सूरत प्रवास के दौरान, जब भी उन्हें ‘वसूली’ से फुर्सत मिलती थी. और फिल्में भी धार्मिक या सामाजिक नहीं, नीली फिल्में, जो उस जमाने में विडियो कैसेट प्लेयर के जरिये देखी जा सकती थीं, नया- नया प्रचलन शुरू हुआ था. वसूली में उन्होंने किसी को नहीं बख्शा था, बूटलेगर से लेकर पुलिसियों तक, कुल मिलाकर साठ हजार रूपये उस जमाने में वसूल कर गई थीं सूरत से ये ‘मंत्रीश्री’.

आरके मिश्रा जी ने कई संस्‍थानों में बतौर पत्रकार अपनी सेवाएं दी थीं.

प्रोब इंडिया में असिस्‍टेंट एडिटर

1987 की शुरुआत में मिश्रा जी दिल्ली गये, वहां ‘प्रोब इंडिया’ में असिस्टेंट एडिटर के तौर पर नई पारी की शुरुआत की. बाद में इस समूह के सीनियर असिस्टेंट एडिटर के तौर पर प्रोब इंडिया के साथ ही हिंदी की पाक्षिक पत्रिका ‘माया’ के लिए भी पंजाब और कश्मीर से रिपोर्टिंग की, जब इन दोनों राज्यों में आतंकवाद चरम पर था.

1991 में मिश्रा जी अहमदाबाद वापस लौटे, पायोनियर के स्पेशल कॉरेस्पोडेंट के तौर पर. उस समय गुजरात में चिमनभाई पटेल की अगुआई में सरकार चल रही थी और मिश्रा जी के कद्रदान एचके खान चीफ सेक्रेटरी की भूमिका में थे. खान के बल देने पर ही मिश्रा जी गुजरात आने को तैयार हुए.

खान ने वादा किया था कि गांधीनगर में उनके रहने के लिए आवास की व्यवस्था हो जाएगी. खान पर भला वो भरोसा कैसे नहीं करते. ये वही खान थे, जिन्होंने मच्छू डैम ट्रेजेडी के समय रिपोर्टिंग के लिए जरूरत पड़ने पर मिश्रा जी के लिए उस कमरे में प्राइवेट टेलीफोन लाइन तक लगाने की अनुमति दे दी थी, जिस सरकारी अतिथि गृह में राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री के दौरे पर ही सीधी फोन लाइन लगाई जाती थी, वो भी इन महानुभावों के इस्तेमाल के लिए.

जिस दौर में मिश्रा जी का गुजरात लौटना हुआ, सरकार उस जमाने में बड़े अखबारों के लिए काम करने वाले पत्रकारों को सरकारी आवास आवंटित किया करती थी, कई बड़े पत्रकार पहले से गांधीनगर में रह रहे थे. खान ने वादे के मुताबिक, मिश्रा जी को जल्दी ही एक बंगला गांधीनगर में आवंटित कर दिया, उसे सेक्टर में, जहां वरिष्ठ आईएएस अधिकारी रहा करते थे.

मिश्राजी गांधीनगर आये, उसके थोड़े समय बाद ही ‘पायोनियर’ अखबार का दिल्ली संस्करण मशहूर पत्रकार- संपादक विनोद मेहता की अगुआई में लांच हुआ. कुछ वर्षों बाद मिश्रा जी पायोनियर के रोविंग एडिटर बने और इस भूमिका में गुजरात ही नहीं, गुजरात के बाहर जाकर भी रिपोर्टिंग करते रहे, लगातार.

आगे चलकर जब पायोनियर की आर्थिक हालत खराब होने लगी, थापर परिवार ने अपना हाथ पीछे खीच लिया, तो इसकी व्यवस्था संभाल रहे चंदन मित्रा से बातचीत कर मिश्रा जी ने आउटलुक और एपी के लिए भी लिखना शुरु कर दिया. पायोनियर में तनख्वाह बढ़ नहीं रही थी, लेकिन मिश्रा जी के अपने खर्चे तो बढ़ ही रहे थे.

आखिरकार वर्ष 2009 में उन्होंने पायोनियर छोड़ दिया और इंडो- एशियन न्यूज सर्विस (IANS) के रोविंग एडिटर बने. बाद के दिनों में मुंबई से प्रकाशित होने वाले फ्री प्रेस जर्नल के भी रोविंग एडिटर रहे मिश्रा जी, साथ में न्यूज एजेंसी एसोसिएटेड प्रेस (AP) के राज्य संवाददाता भी.

हितवाद, नागपुर और डेली पोस्ट, चंडीगढ़ के साथ आउटलुक और बेंगलुरु से प्रकाशित होने वाली एजुकेशन वर्ल्ड पत्रिका के लिए भी लिखते रहे वो. यही नहीं, दुबई से प्रकाशित होने वाले गल्फ न्यूज़ और सउदी अरब से प्रकाशित होने वाले अरब न्यूज़ के लिए भी बीच- बीच में लिखते रहे, ट्रिब्यून, चंडीगढ़ और विजय टाइम्स, बेंगलुरु के लिए भी.

1987 की शुरुआत में मिश्रा जी दिल्ली गये, वहां ‘प्रोब इंडिया’ में असिस्टेंट एडिटर के तौर पर नई पारी की शुरुआत की. बाद में इस समूह के सीनियर असिस्टेंट एडिटर के तौर पर प्रोब इंडिया के साथ ही हिंदी की पाक्षिक पत्रिका ‘माया’ के लिए भी पंजाब और कश्मीर से रिपोर्टिंग की, जब इन दोनों राज्यों में आतंकवाद चरम पर था.

50 साल का लंबा कैरियर

मिश्रा जी ने अपने पांच दशक से भी लंबे कैरियर में कई संस्थाओं की नींव डाली, कई के संचालन में सक्रिय सहयोग दिया. मसलन गुजरात यूनियन ऑफ. वर्किंग जर्नलिस्ट्स के अध्यक्ष रहने के साथ ही 2007 में स्थापित गुजरात मीडिया क्लब के भी संस्थापक अध्यक्ष रहे. दिल्ली यूनियन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स के भी कुछ समय तक सचिव रहे.

मिश्रा जी ने द जर्नलिस्ट्स वेलफेयर एंड एजुकेशन ट्रस्ट (JEWEL) नामक संस्था की भी नींव डाली गांधीनगर में रहते हुए. इसके तहत गुजरात से जुड़ी हुई जबरदस्त संदर्भ सामग्री इकट्ठा की उन्होंने, अखबार की कतरनों से लेकर पत्र- पत्रिकाओं का खजाना जुटाया. उसी दफ्तर से एक समय ‘शहरी’ नामक अखबार निकाला और नये पत्रकारों की पौध खड़ी की, जो गुजरात के अलग- अलग मीडिया समूहों में आज काम कर रहे हैं.

मिश्रा जी का लेखन कैसा था, इसका आसानी से अंदाजा उस प्रोफाइल को पढ़ने से भी लग सकता है, जो गुजरात मीडिया क्लब के संस्थापक अध्यक्ष के नाते उन्होंने खुद के बारे में लिखा था, वर्ष 2007 में. आप भी इसे पढ़ें, लुत्फ उठाएं और याद करें उस शख्सियत को, जो शब्दों का जादूगर था, अपने को ‘वर्डस्मिथ’ कहके खुशी पाता था.

Share. Facebook Twitter Pinterest LinkedIn Tumblr Email
Previous ArticleGold Rate Today: फरवरी के आखिरी हफ्ते में सोना हुआ सस्ता, अब 10gm की इतनी रह गई है कीमत, चेक करें लेटेस्ट रेट | Gold Rate Today 23 February 2026 24k 22k 18k gold price india sone ka bhav chandi ka bhav news
Next Article Breaking LIVE: भारत टैक्सी ड्राइवरों से मिले अमित शाह | Breaking Live Updates, 23 February 2026 Monday, aaj ki taja khabar, weather, Mukul Roy latest news in Hindi
HawkNews
  • Website

Related Posts

Ketan Agarwal Murder Case LIVE: आरोपी सिया के वकील ने सबूतों पर उठाए सवाल, पुलिस कस्टडी बढ़ाने का करेंगे विरोध

June 29, 2026

नितिन नबीन का जम्मू का दो दिवसीय दौरा | भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की जुलाई 2023 में जम्मू यात्रा।

June 29, 2026

कानपुर में जमीन खरीदने से पहले चेक करें ये दस्तावेज, सस्ता के चक्कर में न लें बड़ा फैसला, डूब सकता है पैसा

June 29, 2026

Comments are closed.

Tags
culture fashion Featured fitness gadgets Just In leisure lifestyle Opinion phones Picks Science technology Top News
Categories
  • Beauty (12)
  • Business (19)
  • Celebrities (11)
  • Education (8)
  • Entertainment (6)
  • Fashion (12)
  • Fitness (11)
  • Health (3)
  • Hindi News (10,921)
  • Jobs (14)
  • Leisure (15)
  • Lifestyle (17)
  • Opinion (13)
  • Picks (7)
  • Politics (4)
  • Sports (3)
  • Tech (13)
  • Travel (10)
Editors Picks

Review: Record Shares of Voters Turned Out for 2020 election

January 11, 2021

EU: ‘Addiction’ to Social Media Causing Conspiracy Theories

January 11, 2021

World’s Most Advanced Oil Rig Commissioned at ONGC Well

January 11, 2021

Melbourne: All Refugees Held in Hotel Detention to be Released

January 11, 2021
Latest Posts

Queen Elizabeth the Last! Monarchy Faces Fresh Demand to be Axed

January 20, 2021

Pico 4 Review: Should You Actually Buy One Instead Of Quest 2?

January 15, 2021

A Review of the Venus Optics Argus 18mm f/0.95 MFT APO Lens

January 15, 2021

Subscribe to News

Get the latest sports news from NewsSite about world, sports and politics.

Advertisement
Demo
Demo
Top Posts

PM Modi के परमात्मा और महात्मा गांधी वाले बयान पर ऐसा क्या बोले राहुल गांधी? सदन में बजने लगी तालियां

July 1, 202412 Views

Katra Srinagar Mata Vashno Devi Vande Bharat Indian Railways New Train Rote

April 14, 202515 Views

CBSE Board Result 2025: क्या 6 मई को आएगा सीबीएसई रिजल्ट? सोशल मीडिया पर वायरल हुआ पोस्ट, बोर्ड ने दी सफाई

May 4, 202513 Views
Stay In Touch
  • Facebook
  • YouTube
  • TikTok
  • WhatsApp
  • Twitter
  • Instagram
Latest Reviews

Queen Elizabeth the Last! Monarchy Faces Fresh Demand to be Axed

By HawkNewsJanuary 20, 2021

Pico 4 Review: Should You Actually Buy One Instead Of Quest 2?

By HawkNewsJanuary 15, 2021

A Review of the Venus Optics Argus 18mm f/0.95 MFT APO Lens

By HawkNewsJanuary 15, 2021

Subscribe to Updates

Get the latest tech news from FooBar about tech, design and biz.

Demo
  • Facebook
  • Twitter
  • Instagram
  • Pinterest
Our Picks

Ketan Agarwal Murder Case LIVE: आरोपी सिया के वकील ने सबूतों पर उठाए सवाल, पुलिस कस्टडी बढ़ाने का करेंगे विरोध

June 29, 2026

नितिन नबीन का जम्मू का दो दिवसीय दौरा | भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की जुलाई 2023 में जम्मू यात्रा।

June 29, 2026

कानपुर में जमीन खरीदने से पहले चेक करें ये दस्तावेज, सस्ता के चक्कर में न लें बड़ा फैसला, डूब सकता है पैसा

June 29, 2026

Petrol Diesel Price: 29 जून को जारी हुए पेट्रोल-डीजल के नए रेट, दिल्ली से पटना तक कहां कितना महंगा हुआ तेल | Petrol Diesel Price Today 29 June Know New Fuel Rates Delhi Mumbai Bengaluru Latest News Hindi

June 29, 2026
Don't Miss

Stay updated with our comprehensive news portal, delivering timely insights on global events, politics, tech, culture, and more. Your reliable source for informed perspectives.

We're social. Connect with us:

Facebook Twitter Instagram Pinterest YouTube

Subscribe to Updates

Get the latest creative news from FooBar about art, design and business.

About

Your source for the lifestyle news. This demo is crafted specifically to exhibit the use of the theme as a lifestyle site. Visit our main page for more demos.

We're social, connect with us:

Facebook Twitter Pinterest LinkedIn VKontakte
From Flickr
Ascend
terns
casual
riders on the storm
chairman
mood
monument
liquid cancer
blue
basement
ditch
stars
Popular Posts

Ketan Agarwal Murder Case LIVE: आरोपी सिया के वकील ने सबूतों पर उठाए सवाल, पुलिस कस्टडी बढ़ाने का करेंगे विरोध

June 29, 2026

नितिन नबीन का जम्मू का दो दिवसीय दौरा | भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की जुलाई 2023 में जम्मू यात्रा।

June 29, 2026

कानपुर में जमीन खरीदने से पहले चेक करें ये दस्तावेज, सस्ता के चक्कर में न लें बड़ा फैसला, डूब सकता है पैसा

June 29, 2026
Copyright © 2017. Designed by Webdadz.

Type above and press Enter to search. Press Esc to cancel.