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Forest Fires: जंगल की आग से पर्यावरण को भारी नुकसान हो रहा है. इससे जैव विविधता का नुकसान, वन कार्बन सिंक का विनाश, मिट्टी और जलग्रहण प्रणालियों को क्षति, वायु प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशीलता में वृद्धि हो रही है. याचिका में जनवरी 2026 में सामने आई हालिया घटनाओं का भी उल्लेख किया गया है, जिनमें हिमाचल प्रदेश में त्रिउंड ट्रेकिंग रूट पर लगी आग, पश्चिमी घाट में समय से पहले शुरू हुई जंगल की आग और उत्तराखंड में बर्फ की कमी व शुष्क सर्दियों के बीच लगी आग शामिल हैं.

उत्तराखंड के जंगलों में आग लगने की घटनाएं बढ़ी हैं. (फाइल फोटो)
नई दिल्ली. देशभर के जंगलों में धधकती आग और प्रशासन की सुस्ती पर राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (NGT) ने कड़ा रुख अपनाया है. हिमालय से लेकर पश्चिमी घाट तक, भारत के ‘ग्रीन लंग्स’ जल रहे हैं, लेकिन जिम्मेदार एजेंसियां सो रही हैं. इसी लापरवाही पर एनजीटी चेयरपर्सन जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव की पीठ ने केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और कई वैधानिक प्राधिकरणों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है. एनजीटी ने साफ पूछा है कि आखिर जंगल की आग को रोकने के लिए ‘नेशनल एक्शन प्लान’ का क्या हुआ?
हिमालय और पश्चिमी घाट खतरे में: 2025 की शुरुआत ही खौफनाक
याचिका में दावा किया गया है कि पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों में आग की घटनाएं “तेजी से और चिंताजनक” रूप से बढ़ी हैं. जनवरी 2026 में हिमाचल प्रदेश के त्रिउंड ट्रेकिंग रूट और उत्तराखंड में सूखी ठंड के बीच भयंकर आग देखी गई. समय से पहले शुरू हुई जंगल की आग ने पश्चिमी घाट की जैव विविधता (Biodiversity) को भारी नुकसान पहुंचाया है. यह आग न केवल पेड़ों को जला रही है, बल्कि हवा में जहर घोल रही है और ग्लेशियरों को पिघलाने वाले ‘ब्लैक कार्बन’ को बढ़ा रही है.
आंकड़े डराने वाले: महाराष्ट्र में 56% बढ़ी घटनाएं
सिस्टम की विफलता का सबसे बड़ा सबूत महाराष्ट्र से आया है. आरटीआई (RTI) से मिली जानकारी के मुताबिक, महाराष्ट्र में जनवरी से सितंबर 2025 के बीच जंगल की आग के 8,091 मामले दर्ज किए गए. यह आंकड़ा 2024 की तुलना में 56 प्रतिशत ज्यादा है. गढ़चिरौली, चंद्रपुर और अमरावती जैसे जिले सबसे ज्यादा प्रभावित हैं. यह साबित करता है कि पुराने इंतजाम फेल हो चुके हैं.
कहां गया पैसा?
याचिकाकर्ता के वकील कुणाल टंडन ने दलील दी कि 2019 में एनजीटी ने जो निर्देश दिए थे, उनका पालन सिर्फ कागजों पर हुआ. अब एनजीटी ने सख्त लहजे में रिपोर्ट मांगी है. 1.जंगल की आग रोकने के लिए जारी किए गए पैसों का कहां और कैसे इस्तेमाल हुआ? 2.’नेशनल वन अग्नि कार्य योजना’ जमीनी स्तर पर लागू क्यों नहीं हुई? 3.फायर लाइन, वॉच टावर और आधुनिक उपकरणों की कमी क्यों है? अधिकरण ने साफ कर दिया है कि अब बहानेबाजी नहीं चलेगी. अगली सुनवाई 23 अप्रैल को होगी, और उससे पहले सभी सरकारों को जवाब दाखिल करना होगा.
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राकेश रंजन कुमार को डिजिटल पत्रकारिता में 10 साल से अधिक का अनुभव है. न्यूज़18 के साथ जुड़ने से पहले उन्होंने लाइव हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, ज़ी न्यूज़, जनसत्ता और दैनिक भास्कर में काम किया है. वर्तमान में वह h…और पढ़ें

