सुप्रीम कोर्ट कुछ मुस्लिमों, खासकर दाऊदी बोहरा समुदाय में प्रचलित महिला खतना पर (Female Genital Mutilation- FGM) प्रतिबंध लगाने से जुड़ी याचिका पर सुनवाई करने के लिए तैयार हो गया है. कोर्ट ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार के साथ-साथ कानून और न्याय मंत्रालय को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. यह याचिका एनजीओ चेतना वेलफेयर सोसायटी की ओर से दायर की गई थी.
महिलाओं पर खतने का बहुत बुरा प्रभाव
याचिका में यह भी कहा गया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियां और वैश्विक मानवाधिकार संगठन लगातार देशों से महिला खतना को रोकने, अपराध घोषित करने और समाप्त करने की अपील करते रहे हैं. मेडिकल शोध बताते हैं कि इस अत्याचार के चलते पीड़िताओं को अल्पकालिक और दीर्घकालिक दोनों तरह के शारीरिक और मानसिक दुष्प्रभाव झेलने पड़ते हैं.
याचिकाकर्ता ने यह भी जिक्र किया कि भारत में महिला खतना पर रोक लगाने के लिए कोई स्वतंत्र कानून मौजूद नहीं है. हालांकि भारतीय दंड संहिता (BNS) की धारा 113, 118(1), 118(2), और 118(3) इस तरह की शारीरिक क्षति को अपराध मानती हैं. इसके अलावा पॉक्सो एक्ट के अनुसार भी किसी नाबालिग की जननांगों को गैर-चिकित्सकीय कारणों से छूना या उसमें हस्तक्षेप करना अपराध है.
याचिका में कहा गया है कि डब्लूएचओ ने एफजीएम को लड़कियों और महिलाओं के मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन बताया है. एफजीएम से संक्रमण, प्रसव संबंधी जटिलताएं, दीर्घकालिक दर्द, और कई गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा होते हैं. दिसंबर 2012 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने एकमत से एफजीएम समाप्त करने का प्रस्ताव भी पारित किया था.
दाऊदी बोहरा समुदाय में प्रचलित है महिला खतना
दाऊदी बोहरा समुदाय शिया इस्लाम का एक संप्रदाय है, और भारत में यह समुदाय एफजीएम को ‘खतना’ नाम से प्रचलित रूप में अपनाता है. याचिका के अनुसार कुरान में इस प्रथा का कोई उल्लेख नहीं है, लेकिन समुदाय के विशेष ग्रंथ दैम-उल-इस्लाम में इसका समर्थन किया गया है. दुनिया भर के कई इस्लामी विद्वान इसे धार्मिक प्रथा नहीं मानते.
अब सुप्रीम कोर्ट की ओर से नोटिस जारी होने के बाद यह मामला महत्व के साथ आगे बढ़ेगा. देखने वाली बात होगी कि केंद्र सरकार इस संवेदनशील और लंबे समय से विवादित मुद्दे पर क्या रुख अपनाती है.

