इलाहाबाद के नेहरू परिवार की वो पहली लड़की थीं, जिन्होंने जब प्यार किया तो फैमिली में भूचाल आ गया. तब मोतीलाल नेहरू देश के टॉप वकील थे. इतना पैसा कमाते थे कि उनकी गिनती देश के धनी लोगों में होती थी. वो यूरोपीय अंदाज में जीवन जीते थे. आधुनिक ख्यालात थे. यूरोपीय जीवनशैली के लिए जाने जाते थे. उन्होंने अपने परिवार के बच्चों को भी खुले विचारों के साथ पाला और बड़ा किया. इस परिवार में तब भूचाल सा आ गया जबकि उनकी बेटी को एक बेहद बौद्धिक और प्रखर वक्ता मुस्लिम युवक से प्यार हो गया. ये युवक उनका मुलाजिम भी था.
दरअसल मोतीलाल नेहरू ने इलाहाबाद में “इंडिपेंडेंट” के नाम से एक अंग्रेजी अखबार शुरू किया. जिसका संपादक उन्होंने एक तेजतर्रार, बौद्धिक और प्रखर राष्ट्रवादी मुस्लिम युवक बनाया. ये मुस्लिम युवक गांधीजी का प्रिय था. अपनी वाक क्षमता से लोगों के दिल जीत लेता था. बहुत अच्छे परिवार से वास्ता रखता था.भारत की आजादी के बाद उच्च पदों पर रहा.
पिता को रिश्ता मंजूर नहीं था
नेहरू परिवार की बड़ी बेटी विजया लक्ष्मी इस युवक से प्यार करने लगीं. जब उन्होंने नेहरू परिवार में इस प्यार का ऐलान किया तो खलबली मच गई. अगर ये युवक दूसरी जाति का होता तो शादी कर भी देते लेकिन दूसरे धर्म में शादी का विचार ही तब उन्हें बिल्कुल स्वीकार नहीं था. पिता मोतीलाल नेहरू इसके खिलाफ थे. उन्होंने दो-टूक कह दिया कि ये शादी नहीं हो सकती. हम आपको आगे बताएंगे कि ये युवक कौन था और किस तरह दोनों करीब आए.
तब बैरिस्टर पंडित से हुई शादी
हालांकि जब विजया लक्ष्मी ने अपने घर में इस प्यार का ऐलान किया तो फिर उनकी शादी 1921 में काठियावाड़ ब्राह्मण बैरिस्टर रंजीत सीताराम पंडित से कराई गई. वह खुद स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे. आजादी की लड़ाई के दौरान ही 1944 में उनकी जेल में मृत्यु हो गई.
विजया लक्ष्मी पंडित (फाइल फोटो)
सीताराम बैरिस्टर ही नहीं, बल्कि विद्वान भी थे. उन्होंने कल्हण के महाकाव्य ‘राजतरंगिनी’ का अनुवाद संस्कृत से अंग्रेजी में किया. उनके और विजया लक्ष्मी की तीन बेटियां हुईं. दो तो विदेश में सेटल हो गईं. तीसरी बेटी नयनतारा सहगल जानी मानी साहित्यकार के रूप में नाम कमाया.
विजया को भारत की मजबूत महिलाओं में गिना जाता है, जो आजादी के बाद वह सोवियत संघ में भारत की पहली राजदूत बनीं. फिर अमेरिका में राजदूत बनायी गईं. वह संयुक्त राष्ट्र संघ में भी उन्होंने खास भूमिका अदा की. कैबिनेट मिनिस्टर रहीं. राज्यपाल भी बनीं. उनका जन्म 18 अगस्त 1900 को इलाहाबाद में हुआ था. विजया ने भी आजादी की लड़ाई में जोरशोर से शिरकत की. कई बार जेल गईं.
19 साल की उम्र में ये प्यार हुआ
दरअसल विजयलक्ष्मी पंडित जब 19 साल की थीं, तो उन्हें इस मुस्लिम युवक से प्यार हुआ. वह सैयद हुसैन थे. बहुत पढ़े लिखे और जहीन शहीन. बंगाल के बहुत एलीट मुस्लिम परिवार से ताल्लुक रखने वाले. गांधीजी भी उनसे स्नेह करते थे.
हुसैन ने अमेरिका में भारत की आजादी के पक्ष में बड़ा कैंपेन चलाया. जब मोतीलाल नेहरू ने इलाहाबाद से अंग्रेजी में ‘इंडिपेंडेंट’ के नाम से अखबार शुरू करना चाहा, तो उन्हें एक तेजतर्रार और समझदार एडिटर की जरूरत थी. एडीटर के तौर पर उनकी तलाश हुसैन पर खत्म हुई.
सैयद हुसैन बहुत आकर्षक और उच्च शिक्षित व्यक्ति थे, जो बंगाल के नवाब परिवार से ताल्लुक रखते थे. उन्हें मोतीलाल नेहरू ने अपने अखबार इंडिपेंडेंट का संपादक बनाया था. (फाइल फोटो)
हुसैन ने अखबार को तेवर दिया
हुसैन ने बहुत कम समय में “इंडिपेंडेंट” को तेजतर्रार अखबार का तेवर दे दिया. जिसकी विषय सामग्री ऐसी थी, जिसे देश के पढ़े-लिखे और समझदार लोग पसंद करने लगे. चूंकि ये अखबार प्रखर राष्ट्रवादी तेवर भी रखता था, लिहाजा ये ना केवल आंदोलनकारियों बल्कि कॉलेज में पढ़ रहे युवकों में भी खासा लोकप्रिय होने लगा.
हुसैन खुद संपादकीय लिखते थे. ये ऐसे होते थे कि हर कोई उनकी समझबूझ, भाषा और जानकारियों का कायल था. फिर हुसैन ने इस अखबार में एक बढ़िया टीम तैयार की. मोतीलाल नेहरू ने उन्हें काम करने की पूरी आजादी दी.
सैयद का व्यक्तित्व और काम ऐसा था कि उस समय देश के सभी बड़े नेता सिर्फ उन्हें जानते नहीं थे, बल्कि उनके कायल भी थे. जब मोतीलाल ‘इंडिपेडेंट’ के लिए संपादक तलाश रहे थे. तब गांधीजी ने ही उन्हें सैयद का नाम सुझाया. मोतीलाल की पेशकश पर सैयद तुरंत इलाहाबाद आ गए. अखबार के संपादक की भूमिका संभाल ली.
नवाबी खानदान से ताल्लुक रखते थे
सैयद हुसैन कलकत्ता में पैदा हुए थे. उनके पिता सैयद मुहम्मद जाने-माने विद्वान थे. तब बंगाल के रजिस्ट्रार जनरल थे. उनके बाबा नवाब लतीफ खान बहादुर ने बंगाल के शिक्षा के क्षेत्र में काफी काम किया था. वह नवाबी परिवार के थे. सैयद हुसैन ने अलीगढ़ के मुस्लिम कॉलेज से पढ़ाई की. फिर कानून की पढ़ाई करने इंग्लैंड गए.
जवाहरलाल नेहरू से हुसैन के संबंध मित्रवत बने रहे. आजादी के बाद नेहरू ने उन्हें मिस्र का राजदूत भी बनाया. (फाइल फोटो)
क्या गजब का भाषण देते थे
सैयद हुसैन की विषयों पर पकड़ और असरदार भाषण देने की कला हर किसी को उनका मुरीद बना देती थी. 1909 में वो अमेरिका में कानून की पढ़ाई करने गए. इसके बाद इंग्लैंड में वो भारतीय छात्रों के बीच बहस और चर्चाओं में लोकप्रिय होने लगे. 1916 में उन्होंने तब के महान संपादक माने जाने वाले बीजी हार्निमन के अखबार ‘बॉम्बे क्रॉनिकल’ को ज्वॉइन किया. बॉम्बे के होम रूल लीग में भी उनकी सक्रियता गजब की थी. 1918 में होम रूल ने उन्हें सेक्रेटरी बनाकर इंग्लैंड भेजा.
कैसे हुसैन के प्रति हुआ आकर्षण
तो जब हुूसैन इंडिपेंडेंट के संपादक बने तो जल्दी ही ये अखबार चर्चित और गंभीर अखबार बन गया. अखबार की हेडिंग्स ध्यान खींचने वाली और संपादकीय धारदार होते थे. तब विजयलक्ष्मी 19 साल की थीं. वह रोज अखबार के ऑफिस आती थीं. अखबार के संपादन के कामों को सीखने की कोशिश कर रही थीं. हुसैन 31 साल के थे. लेकिन कोई भी उनकी स्मार्टनेस, व्यक्तित्व और विद्वता का कायल हो सकता था.
फिर उनके प्यार में पड़ गईं
विजयलक्ष्मी जब उनके करीब आईं तो साथ काम करते हुए उनसे इस कदर प्रभावित हुईं कि प्यार में पड़ गईं. हुसैन ने शुरू में जरूर इससे बचने की कोशिश की होगी लेकिन लंबे समय तक कर नहीं पाए. विजयलक्ष्मी इस प्यार को लेकर इतनी गंभीर थीं कि वह हुसैन से शादी करना चाहती थीं. उन्होंने परिवार के सामने अपने प्यार को जाहिर कर दिया.
हुसैन को अखबार और इलाहाबाद छोड़ना पड़ा
वो एक ऐसा समय था, जब दूसरे धर्म में शादी सोची ही नहीं जा सकती थी, लिहाजा नेहरू परिवार भी इसके पक्ष में नहीं था. हालांकि मोतीलाल नेहरू का रहन-सहन किसी यूरोपीय परिवारों जैसा था. परिवार के सभी लोग अक्सर विदेश का सैरसपाटा करते थे. जब विजयलक्ष्मी अड़ी रहीं, तो मोतीलाल इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि हुसैन के इलाहाबाद में रहने से हालात बेकाबू हो सकते हैं. जब उनके और मोतीलाल नेहरू के संबंध इस बात को लेकर बिगड़े तो उन्होंने इलाहाबाद और अखबार दोनों छोड़ दिया.
उन दिनों विजयलक्ष्मी और हुसैन का अफेयर मीडिया में भी आया. 1920 में हुसैन ने इलाहाबाद छोड़ दिया. हुसैन खिलाफत आंदोलन का हिस्सा बनकर इंग्लैंड चले गए. वहां भारतीय स्वाधीनता की आवाज को बल देने लगे. लंदन में वो कांग्रेस के आधिकारिक प्रकाशन के संपादक बने. ब्रिटेन से फिर अमेरिका चले गए. जहां वो 1946 तक रहे.
अमेरिका में उनकी भाषण कला और बुद्धिमत्ता की खासी तारीफ की जाती थी. ‘लॉस एंजिल्स टाइम्स’ ने उन्हें टैगोर के बाद अमेरिका आने वाला अति विलक्षण भारतीय बताया, जबकि न्यूयॉर्क के फॉरेन पॉलिसी एसोसिएशन ने कहा, पांच सालों में हमारी कांफ्रेंसेज में जिन सैकड़ों लोगों ने लेक्चर दिए, उनमें कोई भी हुसैन जैसा ब्रिलिएंट नहीं था. उस मुस्लिम युवक से जवाहर लाल नेहरू के संबंध जरूर मित्रवत बने रहे. उन्होंने उसको बाद में मिस्र का राजदूत भी बनाया.
नेहरू की अंतिम यात्रा में इंदिरा गांधी के साथ बीच में विजया लक्ष्मी पंडित (Photo X)
बाद में दोनों साथ देखे गए
नेहरू के पर्सनल सचिव एमओ मथाई ने अपनी किताब में लिखा, 1945 में हुसैन और विजयलक्ष्मी अमेरिका में साथ देखे जाने लगे. जब भारत आजाद हुआ तो नेहरू ने ही हुसैन को मिस्र का पहला भारतीय राजदूत बनाया. उसी दौरान विजयलक्ष्मी पंडित को सोवियत संघ का राजदूत बनाकर भेजा गया.
हुसैन मिस्र में राजदूत बने
हुसैन ताजिंदगी अकेले ही रहे. उन्होंने कभी शादी नहीं की. मिस्र में राजदूत रहने के दौरान लोग उनके रहनसहन के कायल थे. उन्हें 1949 में अमेरिका का राजदूत बनाने की घोषणा कर दी गई थी. इसी बीच मिस्र के होटल में हार्टअटैक से उनका निधन हो गया. वहां राजकीय सम्मान के साथ उन्हें विदाई दी गई. काइरो की एक सड़क का नाम भी उनके नाम पर रखा गया.
विजया ने आत्मकथा में क्या लिखा
विजया लक्ष्मी पंडित ने अपनी आत्मकथा द स्कोप ऑफ हैप्पीनेस – ए पर्सनल मेमोयर (The Scope of Happiness: A Personal Memoir) में सैयद हुसैन का जिक्र किया. उन्होंने लिखा, किशोरावस्था में वह हुसैन से “लगाव” महसूस करती थीं. उन्होंने याद किया कि, उस ज़माने में जब “हिंदू-मुस्लिम एकता” के नारे थे और उनके परिवार में मुस्लिम दोस्त भी बहुत थे, इसलिए उनके लिए अलग धर्म का दोस्त साथी चुनना “स्वाभाविक” महसूस हुआ. उन्होंने सहजता से स्वीकार किया कि सामाजिक और पारिवारिक दबावों की वजह से ये रिश्ता आगे नहीं बढ़ सका.

