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सेकंड लेफ्टिनेंट राजीव संधू ने 19 जुलाई 1988 को श्रीलंका में ऑपरेशन पवन के दौरान अद्वितीय साहस दिखाया. एलटीटीई के भीषण हमले में गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उन्होंने मरने का नाटक किया और जमीन पर रेंगते हुए अपनी 9mm कार्बाइन से उग्रवादियों पर सटीक निशाना साधा. उनके इस अचानक और प्रभावी हमले से दुश्मन हक्का-बक्का हो गया और उन्होंने महत्वपूर्ण हथियारों को सुरक्षित रखा. 12 नवंबर 1966 यानी आज ही के दिन उनका जन्म हुआ था. केवल 21 वर्ष की आयु में उन्होंने अपनी शहादत दी और उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया.
कैप्टन राजीव संधू की कहानीनई दिल्ली. सेकंड लेफ्टिनेंट राजीव संधू की कहानी साहस और अदम्य जज़्बे की मिसाल है. कमीशन मिलते ही उन्हें ऑपरेशन पवन के तहत श्रीलंका भेजा गया, जहां गृहयुद्ध से जूझ रहे बट्टिकलोआ सेक्टर में उनकी बटालियन को तुरंत एलटीटीई उग्रवादियों के खिलाफ तैनात किया गया. कुछ ही हफ्तों में उन्हें 19 मद्रास रेजिमेंट की ‘सी’ कंपनी में जोड़ा गया और राजीव सीधे युद्ध के माहौल में कूद पड़े. साल 1966 में 12 नवंबर को यानी आज ही के दिन जन्मे राजीव संधू के दादाजी ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज में सेवा दी थी और उनके पिता भारतीय वायु सेना में रहे थे. इस तरह, राजीव को बचपन से ही समर्पण और सेवा का पाठ मिला.
19 जुलाई 1988 को उन्हें सूखी राशन सामग्री इकट्ठा करने के लिए छोटे काफिले का नेतृत्व करना था. जैसे ही काफिला आगे बढ़ा, एलटीटीई ने भीषण हमला कर दिया. रॉकेट और गोलियों से उन्हें गंभीर चोटें लगीं, दोनों पैर क्षत-विक्षत हो गए और शरीर गोलियों से छलनी हो गया. सामान्य व्यक्ति हार मान लेता, लेकिन राजीव ने मरने का नाटक किया और जमीन पर रेंगते हुए अपनी 9mm कार्बाइन उठाई.
अपने अंतिम क्षणों में उन्होंने करीब आ रहे उग्रवादियों पर सटीक फायरिंग की, जिससे दुश्मन हक्का-बक्का हो गया और हथियारों को छू भी नहीं पाए. उन्होंने प्रमुख उग्रवादी कुमारन को भी मार गिराया, जो कराची समूह का महत्वपूर्ण नेता था. राजीव की यह कार्रवाई सिर्फ आत्मरक्षा नहीं, बल्कि सामरिक सफलता भी थी. अपनी शारीरिक क्षमता की सीमा तक लड़ते हुए राजीव संधू ने रणभूमि में अपनी जान दे दी. उन्हें तुरंत फील्ड एम्बुलेंस से अस्पताल ले जाया गया, लेकिन निधन हो गया. उनके साहस और अद्वितीय बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया. प्रशस्ति पत्र में लिखा गया कि उन्होंने अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा की परवाह किए बिना साथियों और हथियारों को सुरक्षित रखा और सर्वोच्च बलिदान दिया.
19 जुलाई 1988 को मृत्यु के समय उनकी उम्र मात्र 21 वर्ष और 6 महीने थी और सेवाकाल केवल सवा चार महीने का. इतनी छोटी उम्र और कम सेवा के बावजूद राजीव संधू ने भारतीय सेना में सर्वोच्च साहस और बलिदान का मानक स्थापित किया. उनकी कहानी यह दिखाती है कि सबसे कठिन परिस्थितियों में भी साहस और प्रतिबद्धता जीवन और मिशन की रक्षा कर सकती है.
पत्रकारिता में 14 साल से भी लंबे वक्त से सक्रिय हूं. साल 2010 में दैनिक भास्कर अखबार से करियर की शुरुआत करने के बाद नई दुनिया, दैनिक जागरण और पंजाब केसरी में एक रिपोर्टर के तौर पर काम किया. इस दौरान क्राइम और…और पढ़ें
पत्रकारिता में 14 साल से भी लंबे वक्त से सक्रिय हूं. साल 2010 में दैनिक भास्कर अखबार से करियर की शुरुआत करने के बाद नई दुनिया, दैनिक जागरण और पंजाब केसरी में एक रिपोर्टर के तौर पर काम किया. इस दौरान क्राइम और… और पढ़ें

