नई दिल्ली/पटना. बिहार विधानसभा चुनाव ना सिर्फ राज्य में सत्ता की लड़ाई है, बल्कि यह विपक्ष के सबसे बड़े दांव विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) का इम्तिहान भी होगा. ‘इंडिया’ गठबंधन ने इसके जरिए ना सिर्फ केंद्र पर हमला बोला, बल्कि चुनाव आयोग की भी नहीं बख्शा. ऐसे में अगर राहुल गांधी और तेजस्वी यादव का महागठबंधन इस चुनाव में हारता है, तो यह सीधे तौर पर पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की चुनावी रणनीति को भी प्रभावित करेगा क्योंकि वहां भी तृणमूल कांग्रेस एसआईआर का लगातार विरोध कर रही है.
बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों से इस बहस पर विराम लगने की उम्मीद है कि क्या विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ को मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के विरोध के रूप में अंततः एक शक्तिशाली राजनीतिक मुद्दा मिल गया है या फिर यह गठबंधन के लिए एक और असफल दांव साबित होगा.
बिहार में सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सत्ता पर अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखने की कोशिश कर रहा है. राज्य की जनता ने 2005 से ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व पर भरोसा जताया है. हालांकि, उनकी स्वास्थ्य स्थिति पर लगातार सवाल उठ रहे हैं और जनता का फैसला ही स्पष्ट करेगा कि क्या जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के प्रमुख (नीतीश) राज्य के चुनावी संग्राम में एक करिश्माई कर्णधार के रूप में अपनी स्थिति बनाए रख पाएंगे या फिर तेजस्वी यादव विपक्ष के चेहरे के रूप में उन्हें मात देने में सक्षम होंगे.
नीतीश उस गठबंधन का नेतृत्व कर रहे हैं, जिसमें भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) भी शामिल है, जो राज्य में पहले से कहीं अधिक मजबूत स्थिति में है. सत्तारूढ़ गठबंधन को राजद के नेतृत्व वाले महागठबंधन पर संख्यात्मक बढ़त हासिल है, जिसमें कांग्रेस और वामपंथी सहयोगी शामिल हैं. दोनों गठबंधनों-राजग और महागठबंधन-ने विधानसभा चुनाव के लिए नये सहयोगी जोड़े हैं. वहीं, चुनाव रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर व्यापक अभियान के जरिये ‘एक्स फैक्टर’ (महत्वपूर्ण कारक) के रूप में उभरे हैं और अपनी जन सुराज पार्टी को पारंपरिक गठबंधनों के विकल्प के रूप में पेश कर रहे हैं.
चुनाव नतीजों को निर्वाचन आयोग की एसआईआर पहल पर जनमत संग्रह के रूप में भी देखा जाएगा, जिसके खिलाफ कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने जोरदार अभियान चलाया है और कई क्षेत्रीय नेताओं ने उनका समर्थन किया है. आयोग की बिहार के बाद पूरे देश में एसआईआर अभ्यास लागू करने की योजना है. एसआईआर के खिलाफ अभियान क्या विपक्ष को बढ़ावा देगा या फिर सत्तारूढ़ गठबंधन के दावे के अनुरूप एक असफल दांव साबित होगा, इसका फैसला भी बिहार चुनावों से होगा.
राहुल ने कथित वोट चोरी के खिलाफ बिहार में 17 अगस्त से एक सितंबर के बीच ‘वोटर अधिकार यात्रा’ निकाली थी. हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि निर्वाचन आयोग पर सत्तारूढ़ गठबंधन के साथ कथित मिलीभगत के जरिये ‘वोट चोरी’ के राहुल के आरोपों को विपक्ष के जनाधार के बाहर भी समर्थन मिलता है या नहीं. भाजपा नीत राजग ने दावा किया है कि एसआईआर का मकसद घुसपैठियों को बाहर निकालना है और इसके खिलाफ विपक्ष का अभियान ‘वोट बैंक’ की राजनीति से प्रेरित है.
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने सोमवार को घोषणा की कि बिहार में विधानसभा चुनाव के लिए मतदान दो चरणों में छह और 11 को नवंबर को होंगे, जबकि वोटों की गिनती 14 नवंबर को की जाएगी. बिहार में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) विपक्ष में प्रमुख ताकत है, जबकि भाजपा सत्तारूढ़ राजग में जदयू के मुकाबले अधिक मजबूत घटक के रूप में उभरी है. हालांकि, दोनों गठबंधन अपनी-अपनी चुनौतियों से घिरे हुए हैं.
दो सबसे बड़े मतदाता समूहों-मुसलमानों और यादवों का ठोस समर्थन हासिल होने के बावजूद, राजद के नेतृत्व वाला गठबंधन अन्य समुदायों से पर्याप्त समर्थन जुटाने में विफल रहा है. भाजपा-जदयू गठबंधन 1990 से 2005 के बीच राजद सरकार के दौरान कथित कुशासन और उसके बाद नीतीश के ‘सुशासन’ का हवाला देकर अन्य समुदायों से बड़े पैमाने पर वोट हासिल करने में कामयाब रहा है.
नीतीश ने 2015 को छोड़कर सभी विधानसभा चुनाव राजग के हिस्से के रूप में लड़े हैं. 2015 में उन्होंने चुनाव के लिए लालू प्रसाद के नेतृत्व वाली राजद से हाथ मिला लिया था. तेजस्वी यादव विपक्षी गठबंधन का जनाधार बढ़ाने की कोशिशों में जुटे हैं, जिसके अत्यंत पिछड़े वर्गों (ईबीसी) से बड़ी संख्या में उम्मीदवारों को टिकट देने की संभावना है. ईबीसी चुनाव नतीजों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं और उन्होंने ज्यादातर मौकों पर राजग का समर्थन नहीं किया है.
विपक्ष की ओर से 2024 के लोकसभा चुनावों में अपनाई गई इसी तरह की रणनीति ने उसे मजबूती दी थी, जब 40 सीटों वाले बिहार में उसकी सीटों की संख्या 2019 में एक से बढ़कर 2024 में 10 हो गई थी. हालांकि, यह आंकड़ा राजग की 30 सीटों से अभी भी काफी कम है. कुशवाहा और कुर्मी (यादवों के बाद अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के दो सबसे बड़े समूह) के अलावा, ईबीसी और संख्यात्मक रूप से कमजोर अनुसूचित जातियों (एससी) के एक बड़े हिस्से ने भी नीतीश की सफलता में अहम भूमिका निभाई है. नीतीश खुद कुर्मी समुदाय से आते हैं.
हालांकि, राजग नेताओं को भरोसा है कि उनका जीताऊ ‘वोट बैंक’ बरकरार रहेगा और युवाओं एवं महिलाओं पर केंद्रित विकास परियोजनाओं एवं कल्याणकारी पहलों की झड़ी, जिसमें लगभग एक करोड़ महिलाओं को 10,000 रुपये की वित्तीय सहायता शामिल है, उनके पक्ष में लोकप्रिय समर्थन बनाए रखेगी. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता और नीतीश के लिए लंबे समय से जारी सद्भावना को सत्तारूढ़ गठबंधन के पक्ष में फिजा को मजबूत करने वाले अन्य कारकों के रूप में देखा जा रहा है.
आलोचकों ने दावा किया है कि मुख्यमंत्री पद से नीतीश की छुट्टी तय है, क्योंकि चुनाव में राजग की जीत के बावजूद भाजपा उन्हें सरकार का नेतृत्व करने का मौका नहीं देगी. हालांकि, भाजपा के कई नेताओं ने दावा किया है कि राजग नीत अगली सरकार की कमान भी नीतीश ही संभालेंगे.
बिहार जहां लगभग तीन दशक से दो राजनीतिक गठबंधनों का दबदबा रहा है, वहां इस बार प्रशांत किशोर भी एक अहम ताकत बनकर उभरे हैं, जिनका चुनाव प्रचार जातिगत समीकरणों को साधने के बजाय मुख्यतः महत्वपूर्ण मुद्दों और प्रमुख दलों की कथित विफलताओं के इर्द-गिर्द केंद्रित है.
कथित भ्रष्टाचार को लेकर कुछ राजग नेताओं के बारे में किशोर की तीखी टिप्पणियों, तीन वर्षों से अधिक समय तक जमीनी स्तर पर किए गए काम और सफल चुनावी रणनीतिकार के रूप में उनके ‘ट्रैक रिकॉर्ड’ ने उन्हें और उनकी जन सुराज पार्टी को बड़े पैमाने सुर्खियों में रखा है.
हालांकि, यह देखना अभी बाकी है कि इससे किशोर के नये संगठन को पहले से ही खंडित राजनीतिक क्षेत्र में बड़े पैमाने पर वोट हासिल करने में मदद मिलेगी या नहीं. केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान के नेतृत्व वाली लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास), जो 2020 के विधानसभा चुनावों से पहले राजग से अलग हो गई थी और जिसके प्रत्याशियों ने लगभग तीन दर्जन सीटों पर जदयू की जीत की संभावनाओं को नुकसान पहुंचाया था, अब सत्तारूढ़ गठबंधन का हिस्सा है.
वहीं, पूर्व मंत्री उपेंद्र कुशवाहा भी अब राजग में लौट आए हैं. वह इससे पहले एक अन्य गठबंधन का नेतृत्व कर रहे थे, जिसमें मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) शामिल थी.
बिहार की 243 सदस्यीय विधानसभा के लिए 2020 में हुए चुनावों में राजग ने 125 सीटों पर जीत दर्ज की थी, जबकि राजद-वामदल-कांग्रेस के महागठबंधन को 110 सीटों से संतोष करना पड़ा था. हालांकि, दोनों गठबंधनों के बीच वोट प्रतिशत का अंतर बेहद कम था. राजग को जहां 37.26 फीसदी मत हासिल हुए थे, वहीं महागठबंधन का वोट प्रतिशत 37.23 फीसदी दर्ज किया गया था.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि एक ऐसा राज्य जहां 2020 में राजग और विपक्षी गठबंधन के बीच वोटों का अंतर 15,000 से भी कम था, वहां किशोर को मिलने वाला समर्थन कई सीटों पर पारंपरिक समीकरण को पलटने की क्षमता रखता है. पूर्व मंत्री मुकेश सहनी 2020 में राजग का हिस्सा थे, लेकिन अब वह राजद के साथ हैं, जबकि केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी सत्तारूढ़ गठबंधन में बने हुए हैं.
इस बार विधानसभा चुनावों में दोनों प्रमुख गठबंधनों का स्वरूप 2024 के लोकसभा चुनाव के समान है. राजग के मजबूत सामाजिक समीकरणों ने यह सुनिश्चित किया कि 2024 के लोकसभा चुनावों में 2019 के मुकाबले कम सीटें जीतने के बावजूद विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ पर सत्तारूढ़ गठबंधन की बड़ी बढ़त बनी रहे.

