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Captain Anuj Nayyar Last Letter: कारगिल के ‘द्रास का टाइगर’ कैप्टन अनुज नैयर की आखिरी चिट्ठी में लिखा था- डर नाम का कोई शब्द मेरी डिक्शनरी में नहीं. उनकी बहादुरी आज भी युवाओं को प्रेरणा देती है.
अनुज 12वीं के बाद पहले अटेम्प्ट में ही NDA के लिए चुने गए थे.
हाइलाइट्स
- कारगिल युद्ध में शहीद हुए 23 वर्षीय कैप्टन अनुज नैयर
- दुश्मनों के 4 बंकर ध्वस्त कर वीरगति को प्राप्त हुए
- आखिरी चिट्ठी में लिखा– “डर नाम का कोई शब्द नहीं मेरी डिक्शनरी में”
कैप्टन अनुज नैयर का जन्म 28 अगस्त 1975 में दिल्ली में हुआ था. उनके पिता एस.के. नैयर एक प्रोफेसर थे और मां मीना नैयर दिल्ली यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी में काम करती थीं. उन्हें बचपन से ही सेना और बंदूक में काफी दिलचस्पी थी. उनके दादा आर्मी में थे और अनुज का उनसे काफी जुड़ाव था. उनके परिवार वालों की माने तो वह बचपन से ही बहादुर थे. एक हादसे में उन्हें गंभीर चोट लग गई थी, उस दौरान अनुज ने बिना एनेस्थीसिया के 22 टांके लगवा लिए थे. उस दौरान छोटी उम्र के लड़के की यह हिम्मत देखकर डॉक्टर भी अचंभित रह गया था.
कैसी थी लड़ाई?
दुश्मन की पोजीशन मजबूत थी और वह हमारे जवानों पर सीधा अटैक करने की स्थिति में था. दुश्मनों के पास ज्यादा मैन पावर और गोला बारूद था. वहीं, हमारे सैनिकों के पास छिपने की जगह नहीं था. एक-एक करके टीम के सैनिक शहीद होते गए, लेकिन टीम का हौसला कम नहीं हुआ. कैप्टन अनुज भी घायल हो गए, लेकिन उनके खून से लथपथ हाथ बंदूक की ट्रिगर से हटने का नाम नहीं ले रहे थे. उन्होंने एक-एक करके दुश्मनों के नौ सिपाहियों को मार गिराया और तीन बड़े बंकरों को बर्बाद कर दिया.
शहीद होने से पहले अपने पिता को लिखी आखिरी चिट्ठी से उनकी बहादुरी के झलक मिलती है. इसमें उन्होंने लिखा था कि अभी तक कोई ऐसा माई का लाल नहीं मिला जो मुझसे जीत पाए. वह दिन कभी नहीं आएगा जब मुझे हार का स्वाद चखना पड़ेगा. डर नाम का कोई शब्द उस डिक्शनरी में है ही नहीं जो आपने मुझे दी है. अब मैं हथियार चलाने में माहिर हो गया हूं. यहां तक कि मैं अब बिना हथियार के भी किसी का मुकाबला कर सकता हूं. आप चिंता मत कीजिए.
अंगूठी छोड़ दी, मौत को गले लगाया
कैप्टन अनुज नैयर की सगाई हो चुकी थी और शादी की तारीख भी तय थी. लेकिन जंग में जाने से पहले उन्होंने अपनी सगाई की अंगूठी अपने ऑफिसर को दे दी थी. उन्होंने ऐसा इसलिए किया, क्योंकि वह नहीं चाहते थे कि अगर लड़ाई में शहीद होना पड़े तो उनकी रिंग दुश्मन के हाथों में जाए. महज 23 साल में शहादत को गले लगाने वाले कैप्टन की कहानी आज भी देश के युवाओं में बहादुरी का जज्बा पैदा करती है.
Sumit Kumar is working as Senior Sub Editor in News18 Hindi. He has been associated with the Central Desk team here for the last 3 years. He has a Master’s degree in Journalism. Before working in News18 Hindi, …और पढ़ें
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