ये सत्यवती वही थीं, जिन पर राजा शांतनु रीझ गए. तब भीष्म ने अपने पिता की शादी उनसे कराई. तभी भीष्म को ये भीष्म प्रतिज्ञा करनी पड़ी कि वो जीवन में कभी विवाह नहीं करेंगे. सत्यवती अपूर्व रूपवती थीं. उनके जन्म की कहानी बहुत अजीबगरीब है. ऐसी कि विश्वास नहीं होगा.
उपरिचर की राजधानी के करीब शुक्तिमत नाम की नदी थी. एक दिन राजा शिकार खेलने गया. तभी वह अपनी रूपवती पत्नी गिरिका का स्मरण करने लगा. इससे वह कामासक्त हुआ. कथा कहती है, इससे उसका वीर्य स्खलित हो गया, उसने इसे एक बाज पक्षी को दिया और कहा कि इसे उसकी पत्नी तक पहुंचा दिया जाए.
वीर्य से नदी की मछली गर्भवती हो गई
जब देवव्रत को ये मालूम हुआ कि उसके पिता सत्यवती से विवाह करना चाहते हैं लेकिन इसमें अड़चन है तो वह खुद मछुआरे के पास पहुंचे और पिता के लिए उनकी बेटी का हाथ ही नहीं मांगा बल्कि भीष्म प्रतिज्ञा भी कर डाली. (by raja ravi verma)
मछली के गर्भ से निकले एक लड़का और एक लड़की
दसवें महिने एक मछुवारे ने जाल फेंका. ये मोटी सी मछली उसके जाल में फंस गई. मछेरे को उस मछली के पेट से एक नवजात लड़का और लड़की मिले, जिसको वह राजा के पास ले गया. तभी अप्सरा शाप से मुक्त होकर आकाशमार्ग में चली गई. राजा उपरिचर ने मछुआरे से कहा, ये कन्या अब तुम्हारी ही रहेगी. लड़के को उसने अपने बेटे की अपना लिया, जो बाद मतस्य नाम का धार्मिक राजा हुआ.
उनके शरीर से तेज मछली की गंध आती थी
इस तरह राजा शांतनु से सत्यवती की शादी हुई
एक दिन जब राजा शांतनु यमुना तट के करीब वन में थे तो उन्हें एक मोहक सुंगध का अहसास हुआ. जब उन्होंने सुगंध का पीछा किया तो ये एक रूपवती कन्या के पास जाकर खत्म हुई. वह सत्यवती थीं. राजा के पूछने पर उन्होंने अपना परिचय देते हुए कहा, मैं धीवर जाति की कन्या हूं. पिता के आदेशानुसार नाव चलाती हूं. शांतनु इस कन्या पर इतना मोहित हो गए कि उसका हाथ मांगने उसके पिता दासराज के पास जा पहुंचे.
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और फिर हुई शांतुन की भीष्म प्रतीज्ञा
देवव्रत की इसी प्रतिज्ञा पर उन्हें भीष्म पितामह कहा जाने लगा. अब सत्यवती का विवाह राजा शांतनु से हुआ. फिर सत्यवती के दो बेटे चित्रागंद और विचित्रवीर्य हुए. चित्रागंद की युद्ध में मृत्यु हो गई तो विचित्रवीर्य भी कुछ सालों बाद बीमारी से चल बसे. उनकी दो रानियां थीं. अंबिका और अंबालिका. दोनों बहनें थीं. दोनों बहनों का नियोग महर्षि व्यास से कराया गया, जिससे फिर पांडु और धृतराष्ट्र ने बेटों के रूप में जन्म लिया.
क्या है नियोग और इसको महर्षि व्यास ने क्यों किया
आप ये सोच रहे होंगे कि ये नियोग क्या होता है और इस नियोग को महर्ष व्यास से ही क्यों कराया गया. प्राचीन समय नियोग मनुस्मृति में पति द्वारा संतान उत्पन्न न होने पर या पति की अकाल मृत्यु की अवस्था में ऐसा उपाय था, जिसके अनुसार स्त्री अपने देवर अथवा सम्गोत्री से गर्भाधान करा सकती थी.’ अब ये सत्यवती ने महर्षि व्यास से क्यों कराया, ये भी जानते हैं.
पहले एक ऋषि से भी पैदा हुआ बेटा
सत्यवती के शरीर से पहले मछली जैसी गंध आती थी. मत्स्यगंधा नाव से लोगों को यमुना पार कराती थी. एक दिन ऋषि पाराशर वहां पहुंचे. ऋषि को यमुना पार जाना था. वे मत्स्यगंधा की नाव में बैठ गए. इसी दौरान उन्होंने सत्यवती से कहा कि वह उसके जन्म से परिचित हैं. उससे एक पुत्र की कामना करते हैं. सत्यवती हिचकिचाईं. फिर ऋषि पाराशर ने कहा कि वह उनके साथ समागम के बाद भी अक्षत यौवना बनी रहेंगी और उनके शरीर की मछली की गंध खत्म हो जाएगी. उसकी जगह मोहक गंध ले लेगी. तब सत्यवती ने स्वीकृति दे दी.
जन्म लेते ही वह बड़ा हो गया. वह द्वैपायन नाम द्वीप पर तप करने चला गया. द्वीप पर तप करने और इनका रंग काला होने की वजह से वे कृष्णद्वैपायन के नाम से प्रसिद्ध हुए. इन्होंने ही वेदों का संपादन किया और महाभारत ग्रंथ की रचना की.
और यूं ये वंश महाभारत की लड़ाई तक जा पहुंचा
पांडु के पांच बेटे थे, जो पांडव कहलाए और धृतराष्ट्र के सौ पुत्र हुए जो कौरव कहलाए लेकिन पांडव और कौरवों में कभी नहीं बनी, बाद में इन दोनों के बीच महाभारत का युद्ध हुआ. तो अब समझ गए होंगे कि किस तरह सत्यवती के जन्म के साथ महाभारत की कहानी की शुरुआत होती है. सत्यवती की कहानी भी गजब की कहानी है कि कैसे एक राजा के वीर्य से उनका जन्म हुआ. फिर वह मछुआरिन बन गईं. फिर रानी बनीं.

