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Women Temple Ban: हरियाणा के कुरुक्षेत्र के पिहोवा में स्थित कार्तिकेय मंदिर में महिलाओं का प्रवेश वर्जित है. मान्यता है कि महिलाओं के दर्शन से उनका सुहाग उजड़ जाएगा. मंदिर में केवल पुरुष ही जा सकते हैं.
हरियाणा के मंदिर में महिलाओं की एंट्री बैन है.
हाइलाइट्स
- हरियाणा के पिहोवा में कार्तिकेय मंदिर में महिलाओं का प्रवेश वर्जित है.
- मंदिर में विवाहिताओं और नवजात बच्चियों का भी प्रवेश निषेध है.
- महिलाओं के दर्शन से सुहाग उजड़ने की मान्यता है.
कुरुक्षेत्र. क्या आप जानते हैं कि हरियाणा में एक ऐसा मंदिर है, जहां महिलाओं की एंट्री बैन है? जी हां, हरियाणा के धर्मनगरी कुरुक्षेत्र के पिहोवा में स्थित यह मंदिर भगवान महादेव के पुत्र कुमार कार्तिकेय का है. यहां महिलाओं का प्रवेश वर्जित है, केवल पुरुष ही जा सकते हैं. नवरात्र के चलते हम इस मंदिर की कहानी आपके साथ शेयर कर रहे हैं.
दरअसल, कार्तिकेय मंदिर के मुख्य पुजारी राजतिलक गोस्वामी ने बताया कि मंदिर में केवल विवाहिताओं के प्रवेश पर ही रोक नहीं है, बल्कि नवजात बच्ची तक को गोद में लेकर नहीं जाया जा सकता है. महिलाएं मंदिर परिसर में आ तो सकती हैं, लेकिन उन्हें मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश की इजाजत नहीं है. मंदिर में बाकायदा बोर्ड पर इस बात का उल्लेख किया गया है.
देशभर में सिर्फ पिहोवा के सरस्वती तीर्थ पर स्थित स्वामी कार्तिकेय का मंदिर ही ऐसा है, जहां महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध है. महाभारत कालीन यह मंदिर हरियाणा के धर्मनगरी कुरुक्षेत्र के पिहोवा में स्थित है. गीता की जन्मस्थली कुरुक्षेत्र से महज 20 किलोमीटर दूरी पर स्थित पिहोवा में सरस्वती तीर्थ पर यह मंदिर है, जहां सदियों से महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी है. माना जाता है कि महिलाएं अगर पिंडी के दर्शन करेंगी तो उनका सुहाग उजड़ जाएगा.
मंदिर में बोर्ड पर महिलाओं के लिए सख्त हिदायत लिखी हुई है कि वे भीतर न झांकें. इसी वजह से मंदिर में ज्योत तो जल रही हैं, लेकिन लाइट नहीं लगाई गई हैं. मंदिर के महंत मंदिर में प्रवेश पर महिला के विधवा होने तक का उदाहरण देने लगते हैं.
सरस्वती तीर्थ पर स्थित स्वामी कार्तिकेय का मंदिर ही ऐसा है, जहां महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध है.
कहानी के पीछे यह मान्यता है
मंदिर के महंत के अनुसार, जब कार्तिकेय ने मां पार्वती से क्रोधित होकर अपने शरीर का मांस और रक्त अग्नि को समर्पित कर दिया था, तब भगवान शिव ने कार्तिकेय को पृथुदक तीर्थ (पिहोवा तीर्थ) पर जाने का आदेश दिया था. तब कार्तिकेय के गर्म शरीर को शीतलता देने के लिए ऋषि-मुनियों ने सरसों का तेल उन पर चढ़ाया, और कार्तिकेय इसी स्थान पर पिंडी रूप में विराजित हो गए. तब से आज तक कार्तिक महाराज की पिंडी पर सरसों का तेल चढ़ाने की परंपरा चली आ रही है.

