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Are relations with China and Pakistan changing

HawkNewsBy HawkNewsOctober 24, 2024No Comments9 Mins Read
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मोदी-शी मुलाकात अहम, लेकिन भरोसा कायम होने में वक़्त लगेगा

लेखक: रंजीत कुमार

रूस के कजान शहर में ब्रिक्स शिखर बैठक के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग के बीच मुलाकात हुई। इस द्विपक्षीय मुलाकात को मुमकिन बनाने के लिए दोनों देशों के दरम्यान अप्रैल 2020 से चल रही सैन्य तनातनी को खत्म करने का पहला अहम कदम उठाया गया है। दोनों नेताओं की मुलाकात पांच साल बाद हुई। कह सकते हैं कि यह रिश्तों पर जमी बर्फ को पिघलाने की शुरुआत है।

पहला कदम: भारत के लिए यह काफी अहम है कि चीन ने वास्तविक नियंत्रण रेखा की वैधता स्वीकार करते हुए अपने सैनिकों को पीछे लाने और वहां तक दोनों देशों के सैनिकों द्वारा गश्ती करने के अधिकार को मान लिया है। इस पहले कदम को राजनयिक भाषा में Disengagement की संज्ञा दी गई है। दूसरे कदम के तहत De-escalation और तीसरा कदम De-induction के तौर पर उठाना होगा। इसके बाद ही यह कहना सही रहेगा कि दोनों देश पूर्वी लद्दाख के इलाके में अप्रैल, 2020 के पहले का माहौल वापस ला सके हैं।

पांच बरस बाद: भारतीय जमीन पर चीनी सेना के अतिक्रमण की वजह से ही रिश्तों में अभूतपूर्व तनाव पैदा हुआ। पीएम मोदी पिछले पांच बरसों से राष्ट्रपति चिनफिंग से इसलिए नहीं मिले कि चीन जब तक अपनी सेना पीछे नहीं करेगा, तब तक दोनों की मुलाकात नहीं हो सकती। कजान में हुई बातचीत में जिस तरह रिश्तों को सामान्य बनाने पर जोर दिया गया है, उसके मद्देनजर भारत का जोर इस बात पर रहेगा कि LAC के पीछे के इलाकों से दोनों देश अपनी सैन्य तैनाती पूरी तरह खत्म कर दें।

राहत की बात: चीनी सैनिक पूर्वी लद्दाख के बर्फीले पर्वतीय सीमांत इलाकों में LAC के काफी भीतर तक घुस आए थे। उन्हें पीछे हटने पर मजबूर करने के लिए दोनों देशों के सैन्य कमांडरों के बीच 21 दौर की वार्ता हुई। राजनयिक, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और विदेश मंत्रियों के स्तर पर भी लगभग इतने ही दौर की बात चली। तब जाकर कहीं ताजा सहमति बन पाई है। भारत के लिए राहत की बात यह है कि देपसांग और डेमचोक पर भी सहमति बनी है।

सेना कब लौटेगी: भारत और चीन के बीच रिश्तों में 2020 के पहले जबरदस्त गर्मजोशी दिखी थी। फिर से उसी गर्मजोशी के लिए थल सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने ठीक ही कहा है कि दोनों देशों को LAC पर पूरी तरह परस्पर भरोसे का माहौल कायम करना होगा। इस कड़ी में Disengagement तो ठीक है, लेकिन भारतीय जनमानस के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि दोनों देशों ने सीमा पर जो 50 हजार सैनिक तैनात कर रखे हैं, उन्हें कब वापस लाया जाएगा? De-escalation की यह प्रक्रिया क्या सर्दियां शुरू होने के पहले हो पाएगी? अगर ऐसा नहीं होता है तो भारतीय सेना पर दबाव बना रहेगा।

डोकलाम की याद: चीन ने 2017 के मध्य में भूटान के दावे वाले डोकलाम के इलाके में अपनी सेना भेज दी थी। काफी मान-मनौव्वल और 73 दिनों की सैन्य तैनाती के बाद उसने सैनिक वापस बुलाए थे। इसके बाद, साल 2018 में पीएम मोदी चीन गए थे और वहां शी चिनफिंग के साथ अनौपचारिक शिखर वार्ता शुरू की थी। तब उन्होंने चीनी राष्ट्रपति को भारत आने का न्यौता दिया था। लेकिन इसके तुरंत बाद शी चिनफिंग ने जिस तरह अपनी फौज को पूर्वी लद्दाख के सीमांत इलाकों में भेज दिया वह हैरान करने वाला था।

भरोसा तोड़ा: चीनी राष्ट्रपति ने दोनों देशों के बीच 1993, 1996, 2005 और 2013 में परस्पर भरोसा पैदा करने वाले समझौतों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। उन्होंने अपनी सेना को भारतीय दावे वाले इलाकों में अतिक्रमण करने का आदेश दिया। इसी का अंजाम रही जून 2020 में गलवान घाटी जैसी घटना। इसके बाद भी भारत के राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व ने बहुत संयम दिखाया। भड़काने वाली परिस्थितियों में भी उन्होंने धैर्य से काम लिया और बातचीत के जरिये ही मामले का हल निकाला।

निर्माण से जुड़ी चिंता: लेकिन, चिंता कम नहीं हुई है। पिछले साढ़े चार बरसों के दौरान चीनी सेना ने बेहद दुर्गम पर्वतीय इलाकों में पक्के निर्माण कर लिए हैं। आशंका है कि चीन अपने इन सैन्य ढांचागत निर्माण को ध्वस्त कर इलाका पूरी तरह छोड़ देने के लिए तैयार नहीं होगा। ऐसी स्थिति में पूर्वी लद्दाख के सीमांत इलाकों में सैन्य तनाव और परस्पर अविश्वास की स्थिति बनी रहेगी।

शक की वजह: अप्रैल 2020 के बाद चीनी घुसपैठ वाले इलाकों- गलवान, पैंगोंग, गोगरा-हॉटस्प्रिंग से Disengagement के लिए जो सहमति पहले हुई थी, उसके तहत एक अस्थायी बफर जोन बनाया गया था। यह जोन भारत के इलाके में ही बना था। इस इलाके में सैन्य गश्ती की ताजा सहमति हुई है और इसमें यह साफ नहीं कहा गया है कि बफर जोन का क्या होगा। चीन की ओर से सहमति का ऐलान नहीं किया गया, केवल पुष्टि के तौर पर ही कहा गया है कि दोनों देशों के बीच सीमा मसले पर एक हल खोजा गया है। चीन के जवाबी बयान में सैन्य Disengagement का जिक्र नहीं होने से भारतीय सामरिक पर्यवेक्षकों के बीच चीन के इरादों को लेकर शक बना रहेगा, क्योंकि हमारे इस पड़ोसी का भरोसा तोड़ने का पुराना इतिहास रहा है।

भारतीय विदेश मंत्री की यात्रा SCO के लिए, पाकिस्तान से रिश्तों में बदलाव के आसार नहीं

लेखक: हर्ष वी पंत

हफ्तों मीडिया में सनसनी फैलाए रहने के बाद आखिरकार शांघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन (SCO) की शिखर बैठक विदेश मंत्री एस जयशंकर की संक्षिप्त इस्लामाबाद यात्रा के साथ पूरी हुई। भारत-पाक रिश्तों को लेकर चाहे जो भी अटकलें लगाई जाती रही हों, SCO की यह 23वीं बैठक जिस चीज के लिए याद रखी जाएगी वह है – जयशंकर का काला चश्मा। सोशल मीडिया के दौर में जयशंकर का काला चश्मा लगाना पाकिस्तान के मामले में भारत के आत्मविश्वास का प्रतीक बन गया। पहली नजर में बात भले हास्यास्पद लगे, लेकिन हकीकत यही है कि पाकिस्तान को लेकर भारतीय विदेश नीति में देखने-विचारने लायक बात अब बस राजनयिकों का बॉडी लैंग्वेज और उनकी स्टाइल ही रह गई है।

SCO की अहमियत: शिखर बैठक के लिए जयशंकर को इस्लामाबाद भेजकर भारत ने संकेत दिया कि वह SCO के साथ अपने जुड़ाव को बरकरार रखना चाहता है। पिछले साल जब SCO बैठक में शामिल होने बिलावट भुट्टो जरदारी गोवा आए थे, तो वह 2011 के बाद भारत आने वाले पहले पाकिस्तानी विदेश मंत्री थे। ऐसे ही इस बार जयशंकर करीब एक दशक की अवधि में पाकिस्तान जाने वाले पहले भारतीय विदेश मंत्री बने। लेकिन ये दोनों ही यात्राएं द्विपक्षीय रिश्तों के लिहाज से बेनतीजा रहीं।

सुरक्षा चुनौतियों पर फोकस: 2001 में स्थापित रूस, चीन, भारत, पाकिस्तान, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान और ईरान जैसे देशों की सदस्यता वाला यह संगठन ऐसा यूरेशियाई समूह है जो उग्रवाद और आतंकवाद जैसी क्षेत्रीय सुरक्षा संबंधी चुनौतियों से निपटने के एक मंच के रूप में शुरू हुआ था। व्यापार और निवेश को सुविधाजनक बनाने और आर्थिक संबंधों को मजबूत करने जैसे लक्ष्य बाद में इसके दायरे में शामिल किए गए।

अफगानिस्तान पर मतभेद: सदस्य देशों के बदलते भू-राजनीतिक हितों ने राज्य प्रायोजित आतंकवाद से निपटने की SCO की क्षमता को प्रभावित किया है। भारत जरूर आतंकवाद के खिलाफ सहयोग बढ़ाने की जरूरत पर लगातार जोर देता है और खास तौर पर पाकिस्तान में पलते-बढ़ते राज्य प्रायोजित आतंकवाद पर चिंता भी जताता है, लेकिन उसे खास सफलता नहीं मिली है। यही नहीं, शांतिपूर्ण, समृद्ध और स्थिर अफगानिस्तान के सवाल पर इस समूह में जिस तरह के मतभेद उभरे, वे भी इसकी राह में आने वाली चुनौतियों को रेखांकित करते हैं। ये बताते हैं कि सदस्य देश अक्सर क्षेत्र में शांति के लिए सामूहिक दृष्टिकोण के ऊपर अपने संकीर्ण हितों को प्रधानता देते हैं।

शांति और स्थिरता जरूरी: इस्लामाबाद में बैठक के दौरान जयशंकर ने SCO को उसके मूल उद्देश्यों की याद दिलाते हुए बुनियादी बातों पर टिके रहने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा- यह अलग से बताना जरूरी नहीं कि विकास और आर्थिक वृद्धि के लिए शांति और स्थिरता की जरूरत होती है। और जैसा कि चार्टर में भी स्पष्ट किया गया है, इसका अर्थ है कि ‘तीन बुराइयों’ का मुकाबला करने में दृढ़ और अडिग रवैया अपनाना होगा। जयशंकर ने इस अवसर पर स्पष्ट किया कि ‘यदि सीमा पार की गतिविधियां आतंकवाद, उग्रवाद और अलगाववाद से वास्ता रखती हैं, तो समानांतर रूप से व्यापार, कारोबार और आम लोगों के बीच आदान-प्रदान को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता।’

एकतरफा अजेंडा नुकसानदेह: यदि पाकिस्तान पर स्पष्ट निशाना था, तो चीन को भी बख्शा नहीं गया। उन्होंने कहा कि ‘इकतरफा अजेंडा के आधार पर सहयोग नहीं बढ़ाया जा सकता। जरूरी है कि यह परस्पर सम्मान और संप्रभु राष्ट्रों की समानता के सिद्धांत पर आधारित हो, क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता को स्वीकार करे और वास्तविक साझेदारी के जरिए आगे बढ़े। यदि हम व्यापार और पारगमन से जुड़े वैश्विक चलन को अपने हिसाब से चुनेंगे तो SCO आगे नहीं बढ़ सकता।’ अपनी घोषित नीति के अनुरूप ही भारत ने चीन की ‘वन बेल्ट वन रोड’ पहल का समर्थन करने से इनकार कर दिया। इस मसले पर वह SCO में अलग खड़ा नजर आया, क्योंकि अन्य सदस्यों ने चीन की इस संपर्क पहल का समर्थन किया।

यूरेशिया की कनेक्टिविटी: पाकिस्तान और चीन की चुनौतियों के बावजूद मध्य एशिया भारत के लिए प्राथमिकता बना हुआ है। जयशंकर की इस्लामाबाद यात्रा इसका सबूत थी। 2017 में पूर्ण सदस्य बनने के बाद से भारत ने आतंकवाद से निपटने को प्राथमिकता दी है और यह इसके लिए सदस्य देशों के बीच और अधिक सहयोग की वकालत करता रहा है। भारत यूरेशिया में कनेक्टिविटी और सामाजिक-आर्थिक विकास पर भी जोर देता है। इंटरनैशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर और चाबहार पोर्ट प्रॉजेक्ट जैसी पहल इस क्षेत्र में ट्रेड और कनेक्टिविटी बढ़ाने को लेकर भारत की प्रतिबद्धता प्रदर्शित करती हैं।

निर्बाध बातचीत का दौर बीता: पाकिस्तान के साथ रिश्ते में जल्द कोई बदलाव आने के आसार नहीं हैं। कुछ महीने पहले ही जयशंकर ने घोषणा की थी कि पाकिस्तान के साथ ‘निर्बाध बातचीत का युग’ समाप्त हो गया है। इस्लामाबाद का दौरा कर जयशंकर ने SCO सदस्यों को संदेश दिया है कि नई दिल्ली इस मंच को लेकर गंभीर है। पाकिस्तान तो निमित्त मात्र था।

(लेखक इंग्लैंड के किंग्स कॉलेज में प्रफेसर हैं)

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं

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