नई दिल्ली: भारतीय सेना प्रमुख (चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ) जनरल उपेंद्र द्विवेदी मंगलवार को चार दशक से अधिक की विशिष्ट सैन्य सेवा के बाद सेवानिवृत्त हो गए. सेवानिवृत्ति के साथ उनका सेना प्रमुख के रूप में कार्यकाल भी पूरा हो गया. उनका कार्यकाल भारतीय सेना की परिचालन तैयारियों को मजबूत बनाए रखने, तीनों सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल बढ़ाने, सेना के परिवर्तन की प्रक्रिया को तेज करने, नई तकनीकों को अपनाने, बल के पुनर्गठन और सैनिक-केंद्रित पहलों को आगे बढ़ाने के लिए याद किया जाएगा.
सेना प्रमुख के रूप में जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने सभी मोर्चों पर परिचालन तैयारियों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी. उनके नेतृत्व में भारतीय सेना ने ऑपरेशन स्नो लेपर्ड (OP SNOW LEOPARD) के तहत उत्तरी सीमाओं पर मजबूत और सतर्क तैनाती बनाए रखी. वहीं पश्चिमी मोर्चे पर सेना ने दृढ़ता, संयम और पेशेवर तरीके से अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन किया.
उनके कार्यकाल में ऑपरेशन सिंदूर (OP SINDOOR) एक महत्वपूर्ण पड़ाव रहा. यह अभियान बदलते सुरक्षा माहौल में भारतीय सेना की तैयारी, सटीकता और संतुलित प्रतिक्रिया का उदाहरण बना. जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने भारतीय सेना के ‘डिकेड ऑफ ट्रांसफॉर्मेशन’ को भी नई दिशा दी. उनके नेतृत्व में सेना ने बल के पुनर्गठन, आधुनिकीकरण, नई तकनीकों को अपनाने, संयुक्त सैन्य संचालन, प्रणाली सुधार और मानव संसाधन प्रबंधन पर काम आगे बढ़ाया.
इसी दौरान रुद्र ब्रिगेड्स, भैरव बटालियंस, अशनि ड्रोन प्लाटून, शक्तिबाण रेजिमेंट्स, दिव्यास्त्र बैटरियां, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर ब्रिगेड्स और इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप्स जैसी पहलों को आगे बढ़ाया गया, ताकि भारतीय सेना को आधुनिक, तेज और भविष्य के लिए तैयार बनाया जा सके.
जनरल उपेंद्र द्विवेदी भारतीय सशस्त्र बलों में 40 वर्षों की सेवा देने वाले एक अनुभवी सैन्य अधिकारी रहे हैं. उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा सैनिक स्कूल, रीवा (मध्य प्रदेश) से प्राप्त की. वर्ष 1984 में उन्हें जम्मू एवं कश्मीर राइफल्स रेजिमेंट में कमीशन मिला. अपने सैन्य करियर के दौरान उन्होंने उत्तरी, पूर्वी और पश्चिमी तीनों सैन्य क्षेत्रों में विभिन्न परिचालन परिस्थितियों में कमान और स्टाफ से जुड़ी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं. कमान और स्टाफ दोनों क्षेत्रों में संतुलित अनुभव रखने वाले अधिकारियों में उनकी अलग पहचान रही.
जब उन्होंने सेना प्रमुख का पदभार संभाला था, उस समय वैश्विक भू-रणनीतिक माहौल लगातार बदल रहा था. तकनीकी प्रगति और आधुनिक युद्ध के बदलते स्वरूप के कारण सुरक्षा चुनौतियां पहले से अधिक जटिल हो चुकी थीं. ऐसे समय में उन्होंने देश की सुरक्षा चुनौतियों का सामना करने के लिए भारतीय सेना की परिचालन तैयारियों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी. साथ ही, गैर-पारंपरिक सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए प्रभावी रणनीति तैयार करना भी उनकी प्राथमिकताओं में शामिल रहा, ताकि देश की रक्षा क्षमता को और मजबूत किया जा सके.
जनरल द्विवेदी ने थल सेना, नौसेना और वायुसेना के बीच बेहतर तालमेल पर भी विशेष जोर दिया. उन्होंने संयुक्त सोच, बेहतर समन्वय और भविष्य की संयुक्त एवं थिएटर आधारित सैन्य तैयारियों को लगातार प्रोत्साहित किया.
उनके कार्यकाल में सेवा दे रहे सैनिकों, पूर्व सैनिकों, वीर नारियों और उनके परिवारों के कल्याण को भी प्राथमिकता दी गई. उन्होंने सैनिकों और पूर्व सैनिकों के साथ सेना के संबंधों को मजबूत करने के लिए कई पहल कीं. ‘वेटरन्स अचीवर्स अवॉर्ड’ जैसी पहल के माध्यम से पूर्व सैनिकों के योगदान को सम्मानित किया गया. उन्होंने यह भी दोहराया कि सेना की जिम्मेदारी अपने जवानों और उनके परिवारों के प्रति सक्रिय सेवा के बाद भी बनी रहती है.
जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने ‘स्ट्रैटेजिक सिक्योरिटी गाइडलाइंस @2047’ के निर्माण का भी मार्गदर्शन किया. यह दस्तावेज ‘विकसित भारत विजन @2047’ और ‘आर्म्ड फोर्सेज विजन @2047’ से प्रेरित है और भारतीय सेना की दीर्घकालिक तैयारियों की रूपरेखा प्रस्तुत करता है. अपनी उत्कृष्ट सेवाओं के लिए जनरल उपेंद्र द्विवेदी को परम विशिष्ट सेवा पदक (PVSM) और अति विशिष्ट सेवा पदक (AVSM) से सम्मानित किया जा चुका है.

