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जीआई टैग मिलने से पत्थरकट्टी की पहचान राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और मजबूत होगी, साथ ही स्थानीय शिल्पकारों की आय बढ़ने की भी संभावना है. पत्थरकट्टी की मूर्तियां पहले से ही अपनी उत्कृष्ट कला और गुणवत्ता के कारण देश-विदेश में प्रसिद्ध हैं.
गया : जिले के पत्थरकट्टी की प्रसिद्ध शिल्पकला को भौगोलिक संकेतक जीआई टैग मिलने से क्षेत्र के शिल्पकारों में खुश की लहर है. लंबे समय से इस मान्यता की प्रतीक्षा कर रहे कारीगरों का सपना अब साकार हुआ है. जीआई टैग मिलने से पत्थरकट्टी की पहचान राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और मजबूत होगी, साथ ही स्थानीय शिल्पकारों की आय बढ़ने की भी संभावना है. पत्थरकट्टी की मूर्तियां पहले से ही अपनी उत्कृष्ट कला और गुणवत्ता के कारण देश-विदेश में प्रसिद्ध हैं.
काले पत्थर के लिए यह गांव जाना जाता
श्रीलंका, जापान और आईलैंड जैसे देशों में इनकी विशेष मांग है, जबकि वाराणसी, देवधर, धनबाद और पटना सहित कई शहरों में इनका प्रदर्शन और उपयोग होता है. जीआई टैग के बाद पत्थरकट्टी एक विशिष्ट ब्रांड के रूप में वैश्विक बाजार में स्थापित होने की दिशा में आगे बढ़ेगा. गांव के पहाड़ी से प्राप्त विशेष काले पत्थर के लिए यह गांव जाना जाता है. यह पत्थर धूप, बारिश और घर्षण के प्रभावों को लंबे समय तक सहन करने में सक्षम है, जिससे इससे निर्मित मूर्तियां वर्षों तक अपनी चमक और मजबूती बनाए रखती हैं.
3,000 लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस शिल्प से जुड़े
पत्थरकट्टी की शिल्प परंपरा का इतिहास भी गौरवशाली है. माना जाता है कि गयाजी के प्रसिद्ध विष्णुपद मंदिर के निर्माण के दौरान रानी अहिल्याबाई होल्कर ने जयपुर से करीब 300 शिल्पकार परिवारों को यहां बुलाया था. मंदिर निर्माण के बाद कई परिवार यहीं बस गये और पीढ़ी दर पीढ़ी इस कला को जीवित रखते रहे. आज पत्थरकट्टी और आसपास के खुखड़ी गांव में लगभग 100 दुकानें संचालित हैं, जहां करीब 2,500 से 3,000 लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस शिल्प से जुड़े हैं.
स्थानीय कलाकार देवेंद्र कुमार, रविन्द्र नाथ गौड़, सुरेश लाल गौड़ का मानना है कि जीआइ टैग मिलने से यहां के शिल्पकारों में काफी खुशी है. अब हमलोगों की मेहनत और रंग लाएगा. अब जितने लोग मेहनत करेंगे उतना ही उनकी कमाई होगी. हमारे द्वारा तैयार किए गये मूर्ति का महत्व बढ़ेगा व बिक्री भी अब ज्यादा होगी. इसका वैश्विक बाजार में अपना एक ब्रांड होगा, साथ ही नई प्रतिष्ठा प्राप्त होगी. रविन्द्र नाथ गौड़ बताते हैं कि काले पत्थर से बनी मूर्तियां इतनी मजबूत होती हैं कि वह लंबे समय तक धूप, बारिश या घर्षण को सहन कर सकती है.
माना जाता है विश्व प्रसिद्ध विष्णुपद मंदिर के पुनर्निर्माण में पत्थरकट्टी के ही कलाकार शामिल थे. पत्थरकट्टी के ही ब्लैक स्टोन से विष्णुपद मंदिर बना है. पत्थरकट्टी के कलाकारों का इतिहास 300 सालों से भी अधिक पुराना है. इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने सन 1720 ई में राजस्थान से गौड़ परिवार को लाकर पत्थरकट्टी में बसाया था. पत्थरकट्टी का ही पत्थर चयनित कर उससे विष्णुपद मंदिर का निर्माण कार्य हुआ था.
पत्थरकट्टी के कलाकार मुख्य रूप से देवी-देवताओं, भगवान बुद्ध, शिवलिंग और अन्य तरह की मूर्तियां बनाते हैं. इसके अलावा लोगों के ऑर्डर के अनुसार आदमकद प्रतिमाएं समेत अन्य चीजों के डिमांड के अनुसार उसे कला के रूप में पिरोया जाता है. पत्थरकट्टी की मूर्ति कला देश और विदेशों में प्रसिद्ध है. 2000 से अधिक मूर्ति बनाने वाले कलाकार हैं. 100 रुपए से लेकर 20 लाख तक की मूर्तियां यहां से बेची जा चुकी है.
पत्थरकट्टी के आसपास के गांवों में भी इस कला से लोग जुड़े हुए हैं. बगल के गांव खुखड़ी गांव के तकरीबन हर लोग इस कारोबार से जुड़े हुए हैं. पुरुष पत्थर तरासकर उन्हें आकार देते हैं तो महिलाएं तैयार मूर्तियों की घिसाई करते हैं. पुरुष कारीगर एक दिन में 800-1000 रुपये आय करते हैं तो महिलाओं को घिसाई के लिए 200-300 रुपये मिलते है. इसी कारोबार से गांव के लोग अपने बच्चों को पढ़ाकर अच्छी जगह पर भेज रहे हैं. खुखड़ी गांव के ही रहने वाले शैलेन्द्र कुमार एनएसएस के कैडेट रहें हैं उन्हें राष्ट्रपति से सम्मानित किया जा चूका है.
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8 वर्षों से पत्रकारिता में अग्रसर. इलाहबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स इन जर्नालिस्म की पढ़ाई. अमर उजाला, दैनिक जागरण और सहारा समय संस्थान में बतौर रिपोर्टर, उपसंपादक औऱ ब्यूरो चीफ दायित्व का अनुभव. क्राइम, खेल, …और पढ़ें

