‘हमारी साझेदारी किसी देश के आकार से तय नहीं होती, बल्कि आपसी सम्मान, विश्वास और साझा हितों से तय होती है.’ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हिंद महासागर के छोटे से द्वीपीय देश सेशेल्स में यह बात कही. पहली नजर में तो लगेगा कि यह सामान्य सा कूटनीतिक बयान है, लेकिन पिछले कुछ दिनों की गतिविधियों को देखें तो साफ लगेगा कि भारत की विदेश नीति कुछ कह रही है. भारत पड़ोसियों के लिए बिग ब्रदर यानी आदेश देने वाला बड़ा भाई नहीं दिखना चाहता. वह रिस्पॉन्सिबल नेबर यानी भरोसेमंद और बराबरी वाले पड़ोसी है. वह हाथ पकड़कर साथ चलना चाहता है. नेपाल और बांग्लादेश में पिछले कुछ समय के फैसले इस बदलाव की साफ झलक दिखाते हैं.
साउथ एशिया में भारत सबसे बड़ी ताकत है. अर्थव्यवस्था सबसे बड़ी, सेना सबसे मजबूत और आबादी सबसे ज्यादा. ऐसे में लंबे समय तक पड़ोसी देशों में यह धारणा बनी कि भारत कई बार अपने आकार और प्रभाव के हिसाब से रिश्ते तय करता है. नेपाल में 2015 के संविधान विवाद और कथित नाकेबंदी के बाद यह भावना और गहरी हुई. बांग्लादेश में भी समय-समय पर यह आरोप लगता रहा कि भारत अपने हितों को प्राथमिकता देता है. चीन ने भी इसी धारणा का फायदा उठाकर दोनों देशों में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश की. जबकि भारत ने ऐसी कोई कोशिश नहीं की. अब दिल्ली का तरीका बदलता दिख रहा है.
नेपाल… जहां भारत ने सबसे बड़ा सबक सीखा
कुछ साल पहले तक नेपाल के साथ रिश्ते लगातार तनाव में थे. नया राजनीतिक नक्शा, कालापानी-लिपुलेख विवाद, चीन की बढ़ती मौजूदगी और भारत विरोधी बयान… सब कुछ रिश्तों को पीछे धकेल रहा था. फिर भारत ने अपना एप्रोच बदला. अब दबाव नहीं, संवाद का रास्ता अपनाया. भारत ने नेपाल की आंतरिक राजनीति पर सार्वजनिक टिप्पणी कम की. बातचीत जारी रखी, लेकिन फैसले थोपने की छवि से दूरी बनाई. रेल लिंक, ट्रांसमिशन लाइन, पेट्रोलियम पाइपलाइन, इंटीग्रेटेड चेक पोस्ट और बिजली व्यापार इन सभी परियोजनाओं को अब साझा विकास के मॉडल के तौर पर पेश किया जा रहा है. नेपाल की जलविद्युत क्षमता और भारत की ऊर्जा जरूरतों ने दोनों देशों को नए तरीके से जोड़ा है. भारत नेपाली बिजली खरीद रहा है. इससे नेपाल की कमाई बढ़ रही है और भारत को स्वच्छ ऊर्जा मिल रही है. यानी रिश्ते अब सिर्फ भावनात्मक नहीं, आर्थिक भी हो रहे हैं.
हाल ही में जब नेपाल के बड़े नेता भारत दौरे पर आए, तो एक दिलचस्प नजारा दिखा. वे सिर्फ सरकारी मीटिंग्स तक सीमित नहीं रहे, बल्कि दिल्ली में सीधे बीजेपी हेडक्वार्टर पहुंचे और पीएम मोदी से मुलाकात की. कूटनीति की भाषा में इसे पार्टी-टू-पार्टी डिप्लोमेसी कहते हैं. पहले भारत सिर्फ काठमांडू में बैठी सरकार से डील करता था. लेकिन अब स्ट्रेटजी बदल गई है. भारत अब नेपाल की सभी बड़ी पार्टियों चाहे नेपाली कांग्रेस हो या कम्युनिस्ट पार्टियां से सीधे तौर पर जुड़ रहा है. पीएम बालेन शाह से पीएम मोदी बात कर चुके हैं. भारत का मैसेज एकदम साफ है- नेपाल की सत्ता में कोई भी दल रहे, हम हर पार्टी और विचारधारा के साथ एक भरोसेमंद और बराबरी का रिश्ता रखना चाहते हैं.
बांग्लादेश… जहां भारत ने बदला संदेश
बांग्लादेश में राजनीतिक बदलाव के बाद कई लोगों को लगा था कि भारत आक्रामक रुख अपनाएगा. लेकिन हुआ उल्टा. भारत ने संवाद जारी रखा. व्यापार, सुरक्षा और कनेक्टिविटी पर बातचीत नहीं रोकी. इतना ही नहीं, ढाका में भारत के हाई कमिश्नर दिनेश त्रिवेदी को कैबिनेट मंत्री के बराबर प्रोटोकॉल रैंक देने का फैसला भी इसी सोच का हिस्सा माना गया.यह संदेश सिर्फ ढाका के लिए नहीं था. यह बीजिंग और इस्लामाबाद के लिए भी था कि भारत बांग्लादेश को अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर रखता है.
चीन का जवाब… लेकिन बिना टकराव
नेपाल हो या बांग्लादेश, दोनों जगह चीन का प्रभाव बढ़ा है. लेकिन भारत अब इसका जवाब बयानबाजी से नहीं, बल्कि विकल्प देकर देने की कोशिश कर रहा है. अगर चीन सड़क बनाता है, तो भारत रेल और बिजली कनेक्टिविटी बढ़ा रहा है. अगर चीन निवेश करता है, तो भारत व्यापार और ऊर्जा साझेदारी को मजबूत कर रहा है. मतलब मुकाबला अब नारों से नहीं, प्रोजेक्ट डिलीवरी से हो रहा है.
सेशेल्स में दिया गया संदेश इतना अहम क्यों?
सेशेल्स दुनिया के सबसे छोटे देशों में शामिल है. ऐसे देश में जाकर प्रधानमंत्री मोदी का यह कहना कि ‘रिश्ते देश के आकार से तय नहीं होते’, केवल उस देश के लिए संदेश नहीं था. यह पूरे हिंद महासागर क्षेत्र और दक्षिण एशिया के लिए संकेत था कि भारत अब अपने पड़ोसियों को छोटा नहीं, साझेदार मानकर आगे बढ़ना चाहता है. यानी नई दिल्ली यह बताना चाहती है कि उसकी ताकत का इस्तेमाल दबाव बनाने के लिए नहीं, भरोसा बनाने के लिए होगा.

