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Home » All News » सार्क की राह में सबसे बड़ी दीवार कौन? भारत के एक फैसले ने 10 साल से क्यों रोक रखा है शिखर सम्मेलन? Explained
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सार्क की राह में सबसे बड़ी दीवार कौन? भारत के एक फैसले ने 10 साल से क्यों रोक रखा है शिखर सम्मेलन? Explained

HawkNewsBy HawkNewsJuly 29, 2026No Comments6 Mins Read
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दक्षिण एशिया के सबसे बड़े क्षेत्रीय संगठन सार्क (SAARC) को एक बार फिर जिंदा करने की मांग तेज हो गई है. मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू ने हाल ही में सार्क को दोबारा सक्रिय करने की अपील की है. वहीं बांग्लादेश की नई सरकार भी लगातार इस संगठन को फिर से सक्रिय करने की वकालत कर रही है. छोटे सदस्य देशों का तर्क है कि दक्षिण एशिया की साझा चुनौतियों का समाधान क्षेत्रीय सहयोग के बिना संभव नहीं है.

लेकिन इन तमाम अपीलों के बावजूद सवाल यह है कि जब लगभग सभी सदस्य देश सार्क को फिर से पटरी पर लाने की बात कर रहे हैं, तब भारत इस पर उत्साह क्यों नहीं दिखा रहा? आखिर ऐसा क्या है कि 2016 के बाद से सार्क का एक भी शिखर सम्मेलन नहीं हो पाया? क्या इसकी वजह सिर्फ भारत-पाकिस्तान का तनाव है या इसके पीछे भारत की कोई बड़ी रणनीति भी काम कर रही है? चलिये विस्तार से समझते हैं…

सार्क आखिर है क्या और इसकी शुरुआत क्यों हुई थी?

ऊपर दिए सवालों का जवाब ढूंढने से पहले चलिये जानते हैं कि आखिर यह सार्क है क्या और इसकी शुरुआत के पीछे मकसद क्या था? सार्क की स्थापना 8 दिसंबर 1985 को बांग्लादेश की राजधानी ढाका में हुई थी. इसका उद्देश्य दक्षिण एशिया के देशों के बीच आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और रणनीतिक सहयोग को बढ़ावा देना था. इस संगठन में भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, मालदीव और अफगानिस्तान सदस्य हैं.

दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले क्षेत्रों में से एक दक्षिण एशिया के लगभग दो अरब लोग किसी न किसी रूप में इस संगठन से जुड़े हैं. लेकिन विडंबना यह है कि इतनी बड़ी आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाला यह संगठन पिछले करीब दस वर्षों से लगभग निष्क्रिय पड़ा है.

आखिर भारत क्यों है इस पूरी कहानी का केंद्र?

दक्षिण एशिया की करीब 75 प्रतिशत आबादी भारत में रहती है. क्षेत्र की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भी भारत है. रक्षा, व्यापार, निवेश, ऊर्जा, कनेक्टिविटी और सुरक्षा जैसे लगभग हर क्षेत्र में भारत सबसे प्रभावशाली देश है. यही वजह है कि क्षेत्र के अधिकांश देशों की विदेश नीति किसी न किसी रूप में भारत के साथ उनके संबंधों से प्रभावित होती है. इसलिए जब भी सार्क की चर्चा होती है तो असली सवाल यह नहीं होता कि संगठन क्यों ठप पड़ा है, बल्कि यह होता है कि भारत और पाकिस्तान के संबंध किस स्थिति में हैं. कई रणनीतिक विशेषज्ञ तो यहां तक कहते हैं कि ‘भारत-पाकिस्तान के रिश्ते ही सार्क का ऑन-ऑफ स्विच हैं.’

2016 के बाद क्यों थम गई सार्क की रफ्तार?

सार्क का काम सर्वसम्मति के आधार पर चलता है, यानी सभी सदस्य देशों की सहमति के बिना कोई बड़ा फैसला नहीं हो सकता. सार्क का सबसे अहम निर्णय लेने वाला मंच उसका शिखर सम्मेलन होता है. इसकी मेजबानी सदस्य देश बारी-बारी से करते हैं. 2016 में इस्लामाबाद में सार्क सम्मेलन होना था. लेकिन उससे ठीक पहले जम्मू-कश्मीर के उरी में आतंकवादी हमला हुआ, जिसमें भारतीय सेना के कई जवान शहीद हो गए. इस आतंकी हमले के बाद भारत ने सम्मेलन का बहिष्कार कर दिया. इसके बाद बांग्लादेश, भूटान और अफगानिस्तान भी पीछे हट गए और सम्मेलन रद्द हो गया. तब से लेकर आज तक सार्क का कोई शिखर सम्मेलन आयोजित नहीं हो सका. भारत का साफ संदेश रहा कि जब तक सीमा पार आतंकवाद पर पाकिस्तान का रवैया नहीं बदलता, तब तक सामान्य क्षेत्रीय सहयोग संभव नहीं है.

भारत का रुख आखिर क्या है?

भारत की यह भाषा पिछले कई वर्षों से लगभग एक जैसी रही है. दिल्ली का संदेश साफ है कि सार्क इसलिए निष्क्रिय नहीं है, क्योंकि संगठन कमजोर है, बल्कि इसलिए कि एक सदस्य देश ऐसा व्यवहार कर रहा है जिससे सामान्य क्षेत्रीय सहयोग संभव नहीं हो पा रहा. यानी नई दिल्ली अब सार्क की समस्या को संगठन की नहीं, बल्कि पाकिस्तान के व्यवहार की समस्या के रूप में पेश कर रही है.

क्या भारत ने सार्क से दूरी बना ली है?

विश्लेषकों का कहना है कि भारत ने क्षेत्रीय सहयोग से दूरी नहीं बनाई, बल्कि उसका रास्ता बदल दिया है. पिछले कुछ वर्षों में भारत ने BIMSTEC (बे ऑफ बंगाल इनिशिएटिव) और BBIN (बांग्लादेश-भूटान-भारत-नेपाल पहल) जैसे मंचों को अधिक महत्व दिया है. इन संगठनों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इनमें पाकिस्तान शामिल नहीं है.

भारत का मानना है कि ऐसे मंचों के जरिए क्षेत्रीय व्यापार, कनेक्टिविटी और सुरक्षा सहयोग कहीं अधिक प्रभावी तरीके से आगे बढ़ाया जा सकता है. यही वजह है कि जब छोटे देश सार्क को पुनर्जीवित करने की बात करते हैं तो भारत उसे प्राथमिकता देने के बजाय वैकल्पिक क्षेत्रीय मंचों को आगे बढ़ाने की नीति पर कायम दिखाई देता है.

फिर छोटे देश सार्क को क्यों बचाना चाहते हैं?

मालदीव और बांग्लादेश की दिलचस्पी केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि रणनीतिक भी मानी जा रही है. मालदीव जैसे छोटे देश के लिए सार्क ऐसा मंच है, जहां उसकी आवाज अपेक्षाकृत ज्यादा प्रभावी हो सकती है. राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू खुद को क्षेत्रीय मध्यस्थ के रूप में पेश करना चाहते हैं. चीन और भारत के बीच संतुलन बनाने की उनकी कोशिशों के बीच सार्क का पुनर्जीवन उनके लिए राजनीतिक रूप से भी उपयोगी माना जा रहा है.

वहीं बांग्लादेश की नई सरकार अपनी विदेश नीति को नई दिशा देने की कोशिश कर रही है. पाकिस्तान के साथ बढ़ते संपर्क, दोनों देशों के बीच सीधी उड़ानों की बहाली और रक्षा सहयोग की चर्चाओं के बीच ढाका सार्क को फिर से सक्रिय करने के पक्ष में खुलकर सामने आया है.

विशेषज्ञों का कहना है कि बांग्लादेश के लिए सार्क केवल क्षेत्रीय संगठन नहीं, बल्कि भारत से अलग अपनी स्वतंत्र क्षेत्रीय पहचान बनाने का माध्यम भी बन सकता है.

पाकिस्तान क्या कहता है?

पाकिस्तान लगातार आरोप लगाता रहा है कि भारत ने आतंकवाद के मुद्दे को बहाना बनाकर सार्क की सर्वसम्मति वाली व्यवस्था को राजनीतिक हथियार बना दिया है. इस्लामाबाद का कहना है कि क्षेत्रीय सहयोग को द्विपक्षीय विवादों से अलग रखा जाना चाहिए.

कुछ स्वतंत्र विश्लेषकों का भी मानना है कि भारत ने पिछले कुछ वर्षों में द्विपक्षीय और छोटे क्षेत्रीय समूहों को प्राथमिकता देकर ऐसी व्यवस्था विकसित कर ली है, जिसमें उसे पाकिस्तान के साथ एक ही मंच साझा करने की आवश्यकता कम पड़ती है. हालांकि भारत का तर्क है कि सीमा पार आतंकवाद के रहते सामान्य क्षेत्रीय सहयोग संभव नहीं है.

क्या सार्क की जल्द वापसी संभव है?

मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए इसकी संभावना बेहद कम नजर आती है. सार्क का कोई भी शिखर सम्मेलन तभी हो सकता है जब सभी सदस्य देश सहमत हों. भारत और पाकिस्तान के बीच मौजूदा तनाव को देखते हुए ऐसी सहमति बनना फिलहाल मुश्किल दिखाई देता है.

यानी मालदीव और बांग्लादेश की अपीलें भले ही चर्चा का विषय बन रही हों, लेकिन जब तक भारत-पाकिस्तान संबंधों में बड़ा बदलाव नहीं आता, तब तक सार्क का पुनर्जीवन केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रहने की संभावना ज्यादा है.

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