India
oi-Bhavna Pandey
Mohan
Bhagwat
address
in
Bengaluru:
राष्ट्रीय
स्वयंसेवक
संघ
(आरएसएस)
के
सरसंघचालक
डॉ.
मोहन
भागवत
ने
8
नवंबर
को
बेंगलुरु
में
संघ
के
शताब्दी
समारोह
आयोजित
दो
दिवसीय
व्याख्यान
को
संबोधित
किया।
“संघ
यात्रा
के
100
वर्ष:
नए
क्षितिज”
के
दूसरे
सत्र
के
संबोधन
में
उन्होंने
संघ
की
अब
तक
की
यात्रा
और
भविष्य
की
दिशा
पर
विचार
व्यक्त
किए।
कांग्रेस
शासित
राज्य
कर्नाटक
की
राजधानी
बेंगलुरू
में
आयोजित
इस
कार्यक्रम
में
मोहन
भागवत
ने
आरएसएस
का
विरोध
करने
वालों
को
करारा
जवाब
दिया।
आरएसएस
प्रमुख
मोहन
भागवत
ने
कहा,
“हिंदू
समाज
अपनी
महिमा
के
शिखर
पर
है
और
हमेशा
दुनिया
को
एकजुट
करना
चाहता
है।

याद
रहे
कर्नाटक
सीएम
के
बेटे
और
मंत्री
यतींद्र
सिद्धारमैया
ने
आरएसएस
की
तुलना
तालिबान
से
की
थी
और
इसके
कार्यक्रमों
पर
प्रतिबंध
लगाने
की
मांग
की
थी।
इसके
बाद
कांग्रेस
राष्ट्रीय
अध्यक्ष
मल्लिकार्जन
खड़गे
के
मंत्री
बेटे
प्रियांक
खड़गे
ने
आरएसएस
के
कार्यक्रमों
पर
प्रतिबंध
लगाने
की
मुहिम
छेड़ी
थी।
जिसके
बाद
बेंगलुरू
में
आज
ये
कार्यक्रम
आयाेजित
किया
गया
है।
भागवत
ने
जोर
देकर
कहा
कि
सभी
मुस्लिम
और
ईसाई
भी
उन्हीं
पूर्वजों
की
संतान
हैं।
उन्होंने
कहा
कि
हो
सकता
है
कि
वे
इसे
न
जानते
हों,
या
उन्हें
भुला
दिया
गया
हो,
लेकिन
बाकी
सभी
जानते
हैं
कि
वे
हिंदू
हैं।भागवत
ने
कहा,
‘हिंदू’
को
एक
समावेशी
शब्द
बताते
हुए
कहा,
“जो
भारत
में
रहते
हैं,
जो
सभी
विविधताओं
का
सम्मान
करते
हैं
और
उन्हें
स्वीकार
करते
हैं
–
वे
हिंदू
कहलाते
हैं।”
उन्होंने
इस
एकता
की
स्थिति
को
हमारे
पूर्वजों
द्वारा
पूरी
सृष्टि
और
मानवता
के
बीच
संबंध
खोजने
का
परिणाम
बताया।
भागवत
ने
कहा,
“भले
ही
हम
अलग
दिखते
हैं,
लेकिन
हम
उसी
एकता
का
प्रतिनिधित्व
करते
हैं।
प्रत्येक
व्यक्ति
का
सर्वोच्च
लक्ष्य
उस
एकता
को
महसूस
करना
और
खुशी
प्राप्त
करना
है,
क्योंकि
वह
खुशी
शाश्वत
है।
यही
हर
भारतीय
धर्म
सिखाता
है।”
संविधान
की
प्रस्तावना
में
हैं
ये
विचार
मोहन
भागवत
ने
कहा
कि
यदि
लोग
संविधान
की
प्रस्तावना
पढ़ें,
तो
उन्हें
वही
विचार
वहां
भी
परिलक्षित
होगा।
उन्होंने
कहा,
“इस
संदर्भ
में,
हमारे
समाज
को
पारंपरिक
रूप
से
हिंदू
कहा
गया
है।
हिंदू
समाज
को
संगठित
होना
चाहिए।भारत
का
भविष्य
धर्म
का
मार्ग
है!
“
मोहन
भागवत
के
अनुसार,
समाज
में
चार
प्रकार
के
हिंदू
हैं।
उन्होंने
विस्तार
से
बताया,
“सबसे
पहले,
वे
जो
खुद
को
हिंदू
कहने
में
गर्व
महसूस
करते
हैं।
दूसरे,
कुछ
ऐसे
हैं
जो
कहते
हैं,
‘हाँ,
हम
हिंदू
हैं,’
लेकिन
सोचते
हैं
कि
इसमें
गर्व
करने
जैसा
क्या
है।
तीसरे,
कुछ
लोग
जानते
हैं
कि
वे
हिंदू
हैं
लेकिन
वोट
खोने
या
इसी
तरह
के
डर
से
सार्वजनिक
रूप
से
इसे
स्वीकार
नहीं
करते
हैं।
अंत
में,
कुछ
ऐसे
हैं
जो
भूल
गए
हैं
कि
वे
हिंदू
हैं।”
भागवत
ने
कहा,
“परीक्षा
में
हम
पहले
सरल
प्रश्नों
के
उत्तर
देते
हैं।
उसी
तरह,
पूरे
समाज
को
एकजुट
करना
हमारा
मिशन
है
–
और
‘अहिंदू’
जैसी
कोई
चीज
नहीं
होती।”
उन्होंने
यह
भी
कहा,
“अलग
होने
से
आप
अलग
नहीं
हो
जाते।
यह
सब
‘हिंदू’
शब्द
में
समाहित
है।
हिंदुओं
ने
हमेशा
कहा
है
कि
सभी
का
अपना
रास्ता
होता
है
और
सभी
रास्तों
का
सम्मान
किया
जाना
चाहिए।”
उन्होंने
अपील
की,
“दूसरों
को
स्वीकार
करें,
अपने
रास्ते
पर
अडिग
रहें,
साथ
रहें
और
साथ
मिलकर
प्रगति
करें।
केवल
रास्ते
अलग
होने
के
कारण
झगड़ने
की
आवश्यकता
नहीं
है।”
मोहन
भागवत
ने
भारतीय
समाज
को
हिंदू
समाज
कहने
पर
उठे
सवालों
का
भी
जवाब
दिया।
उन्होंने
कहा,
“भारत
के
लिए
हिंदू
जिम्मेदार
हैं।
भारत
क्या
है?
यह
अंग्रेजों
द्वारा
बनाया
गया
राष्ट्र
नहीं
है।
हम
एक
प्राचीन
राष्ट्र
हैं।
इसमें
कई
निवासी
हो
सकते
हैं,
लेकिन
संस्कृति
एक
है।
उदाहरण
के
लिए,
जब
बाबर
ने
पंजाब
पर
आक्रमण
किया,
तो
उसने
लोगों
का
नरसंहार
किया।
गुरु
नानक
जी
उस
समय
उपस्थित
थे।
उन्होंने
लिखा
कि
हिंदू
महिलाओं
ने
अपना
शील
(सम्मान)
खोया,
और
मुस्लिम
महिलाओं
को
भी
बहुत
कष्ट
हुआ।
उन्होंने
मुस्लिम
महिलाओं
का
उल्लेख
क्यों
किया?
क्योंकि
वे
भी
इस
भूमि
का
हिस्सा
थीं।”
श्री
अरबिंदो
को
उद्धृत
करते
हुए,
उन्होंने
कहा,
“यह
ईश्वर
की
इच्छा
है
कि
सनातन
धर्म
का
उत्थान
हो,
और
भारत
का
उदय
होना
चाहिए।”
उन्होंने
निष्कर्ष
निकाला,
“हिंदू
होने
का
मतलब
भारत
के
लिए
जिम्मेदार
होना
है।
इसीलिए
हिंदू
समाज
को
संगठित
करना
आवश्यक
है
–
क्योंकि
भारत
एक
हिंदू
राष्ट्र
है।
यह
हमारे
आज
के
किसी
भी
कार्य
का
खंडन
नहीं
करता
है।”

