नई दिल्ली: राष्ट्रपति भवन का अशोक हॉल सोमवार, 8 जून 2026 को उस वक्त अत्यंत भावुक हो उठा जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने शहीद लेफ्टिनेंट शशांक तिवारी को मरणोपरांत देश के दूसरे सबसे बड़े शांतिकालीन वीरता पुरस्कार कीर्ति चक्र से सम्मानित किया. आर्मी सर्विस कॉर्प्स/1 सिक्किम स्काउट्स के जांबाज अधिकारी शशांक ने उत्तरी सिक्किम की एक उफनती नदी में गिरे अपने साथी अग्निवीर स्टीफन सुब्बा की जान तो बचा ली लेकिन खुद वीरगति को प्राप्त हो गए.
जब शहीद का यह सर्वोच्च सम्मान लेने उनके पिता श्री जंग बहादुर तिवारी और मां श्रीमती नीता तिवारी आगे बढ़े तो मां अपने लाडले की शहादत और अदम्य साहस को याद कर फूट-फूटकर रो पड़ीं. इस हृदयविदारक क्षण में राष्ट्रपति ने भी बेहद संवेदनशीलता दिखाते हुए मां का कंधा थामकर उन्हें ढांढस बंधाया. देश के इस वीर सपूत का सर्वोच्च बलिदान भारतीय सेना के अटूट सौहार्द, निस्वार्थ सेवा और सर्वोच्च निष्ठा की एक अमर दास्तान बन गया है, जिसने हर भारतीय की आंख नम कर दी.<br>नई दिल्ली: राष्ट्रपति भवन का अशोक हॉल सोमवार, 8 जून 2026 को उस वक्त अत्यंत भावुक हो उठा जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने शहीद लेफ्टिनेंट शशांक तिवारी को मरणोपरांत देश के दूसरे सबसे बड़े शांतिकालीन वीरता पुरस्कार कीर्ति चक्र से सम्मानित किया. आर्मी सर्विस कॉर्प्स/1 सिक्किम स्काउट्स के जांबाज अधिकारी शशांक ने उत्तरी सिक्किम की एक उफनती नदी में गिरे अपने साथी अग्निवीर स्टीफन सुब्बा की जान तो बचा ली लेकिन खुद वीरगति को प्राप्त हो गए.
जब शहीद का यह सर्वोच्च सम्मान लेने उनके पिता श्री जंग बहादुर तिवारी और मां श्रीमती नीता तिवारी आगे बढ़े तो मां अपने लाडले की शहादत और अदम्य साहस को याद कर फूट-फूटकर रो पड़ीं. इस हृदयविदारक क्षण में राष्ट्रपति ने भी बेहद संवेदनशीलता दिखाते हुए मां का कंधा थामकर उन्हें ढांढस बंधाया. देश के इस वीर सपूत का सर्वोच्च बलिदान भारतीय सेना के अटूट सौहार्द, निस्वार्थ सेवा और सर्वोच्च निष्ठा की एक अमर दास्तान बन गया है, जिसने हर भारतीय की आंख नम कर दी.


