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Bharatpur Keoladeo National Park: भरतपुर के घना वेटलैंड (केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान) में दुर्लभ वॉटरकॉक (Watercock) पक्षी की बढ़ती मौजूदगी ने वन्यजीव विशेषज्ञों और पक्षी प्रेमियों का ध्यान आकर्षित किया है. इस पक्षी की वापसी को वेटलैंड की बेहतर पारिस्थितिकी, पर्याप्त जल उपलब्धता और समृद्ध जैव विविधता का सकारात्मक संकेत माना जा रहा है. वॉटरकॉक आमतौर पर दलदली क्षेत्रों और घनी वनस्पतियों वाले जलाशयों में पाया जाता है. इसकी बढ़ती संख्या दर्शाती है कि घना वेटलैंड का प्राकृतिक आवास जीवों के लिए अनुकूल बना हुआ है. यह पक्षी संरक्षण, प्रकृति पर्यटन और पर्यावरण संतुलन की दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है.
भरतपुर: भरतपुर का केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान इस मानसून एक बार फिर जीवंत नजर आ रहा है. लंबे समय बाद यहां के वेटलैंड की स्थिति में सुधार देखने को मिल रहा है. जिसका सीधा असर यहां आने वाले पक्षियों पर भी दिखाई दे रहा है. खास बात यह है कि इस बार दुर्लभ वॉटरकॉक पक्षी अच्छी संख्या में देखा जा रहा है.जो पार्क की बेहतर पारिस्थितिकी का संकेत माना जा रहा है. दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में पाए जाने वाला यह शर्मीला पक्षी
आमतौर पर घनी दलदली घास और शांत जल स्रोतों के आसपास रहना पसंद करता है. इस बार केवलादेव में इसके कई जोड़े एक साथ देखे गए हैं. जो अपने आप में एकअच्छा संकेत है. यह पक्षी साफ पानी, पर्याप्त भोजन और सुरक्षित आवास मिलने पर ही किसी स्थान पर टिकता है. पार्क में इसकी मौजूदगी अच्छी मानी जा रही है.घना के नेचर गाइड ने लोकल 18 से बातचीत में बताया कि वॉटरकॉक हर साल जून-जुलाई में मानसून की शुरुआत के साथ यहां पहुंचता है.
हालांकि पहले इसकी संख्या बहुत कम रहती थी और केवल एक या दो जोड़े ही नजर आते थे लेकिन इस बार इनकी संख्या में बढ़ोतरी देखी गई है. गाइड के अनुसार पिछले 4-5 सालों से वे इस पक्षी को देख रहे हैं और इस साल पहली बार इसे यहां सफलतापूर्वक ब्रीड करते हुए भी देखा गया है. यह पक्षी मुख्य रूप से सांपन मोरी क्षेत्र के आसपास दिखाई देता है. जहां घनी घास और पानी की उपलब्धता इसे अनुकूल वातावरण प्रदान करती है.
लाल चोंच और कॉक फैमिली से मिलते-जुलते होती
इसकी पहचान इसकी लाल चोंच और कॉक फैमिली से मिलते-जुलते होती है. जो इसे अन्य जल पक्षियों से अलग बनाती है. यह वाइट-ब्रेस्टेड वॉटरहेन की तरह ही व्यवहार करता है और अगस्त-सितंबर तक यहां रहकर वापस चला जाता है. वॉटरकॉक की बढ़ती मौजूदगी से यह साफ है कि केवलादेव का पारिस्थितिकी तंत्र मजबूत हो रहा है. इससे न केवल वन विभाग बल्कि पक्षी प्रेमियों और पर्यटकों में भी उत्साह देखा जा रहा है.
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