कहा जाता है कि बाबर जब 1526 की पानीपन की लड़ाई जीतकर भारत में आया तो वह यहां स्थायी तौर पर रहना नहीं चाहता था लेकिन फिर रणनीतिक तौर पर यहां आकर उसकी साम्राज्य लिप्सा पनप गई. तब उसे भारत की कई चीजें पसंद आती थीं और कई नहीं. उसने अपने संस्मरण “बाबरनामा” (तुजुक-ए-बाबरी) में इस देश की एक चीज की जमकर तारीफ की. वो फलों का राजा आम था.
बाबर ने आम को भारत की सबसे उल्लेखनीय चीजों में एक बताया. उसने लिखा कि शुरू में उसे इसकी गंध अजीब लगी, लेकिन स्वाद में यह बेजोड़ है. उसने आम को “हिंदुस्तान का सबसे अच्छा फल” कहा.
बाबर ने इसे सबसे पहले अंब कहा
बाबर ने अपने संस्मरण “बाबरनामा” में आम (जिसे उसने फारसी में “अंब” या “आम” के रूप में संबोधित) के बारे में विस्तार से लिखा. भारत आने के बाद उसने इस फल को पहली बार देखा और चखा. इसके स्वाद और खासियत ने उसे प्रभावित किया.
प्राचीन भारत में आम को किन नामों से जानते थे
प्राचीन भारत में आम को कई नामों से जाना जाता था. सबसे पहले इसे आम्र-फल कहा जाता था. प्रारंभिक वैदिक साहित्य में आम को रसाला के नाम से भी जाना जाता था. वैदिक साहित्य में आम को सहकार भी कहा गया. दक्षिण भारत में आम को मामकाय के नाम से बुलाया जाता था. संस्कृत ग्रंथों में आम को “अमरा” भी कहा गया है.
बाबर ने अपनी आत्मकथा ‘बाबरनामा’ में भारत के आमों की बहुत प्रशंसा की है। उन्होंने आम को ‘हिंदुस्तान का सबसे बेहतरीन फल’ बताया था. (image generated by meta ai)
बहुत पसंद आया स्वाद
बाबर को शुरू में उसे आम की गंध कुछ अजीब और अप्रिय लगी. उसने कहा, जब आम को छीला जाता है, तो उसकी महक उसे थोड़ी परेशान करती थी. लेकिन जब उसने इसे खाया, तो स्वाद उसे इतना पसंद आया कि उसने इसे “हिंदुस्तान के फलों में सबसे अच्छा” करार दिया.
आम उसके लिए सुखद आश्चर्य था
बाबर ने आम की तुलना अपने मूल क्षेत्र फरगाना (मध्य एशिया) के फलों जैसे तरबूज और खरबूजे से की. उसने लिखा कि अगर आम को सही तरीके से खाया जाए (छीलकर और साफ करके), तो यह स्वाद में इन फलों को टक्कर दे सकता है.
आम का मीठा, रसीला और गूदेदार स्वाद बाबर के लिए नया और अनोखा था. ये उसके लिए एक सुखद आश्चर्य था. भारत में आम की आसान उपलब्धता और इसकी बहुतायत ने भी उसे प्रभावित किया. फरगाना जैसे शुष्क क्षेत्र की तुलना में भारत की उर्वर भूमि में फलों की इतनी विविधता उसे आकर्षक लगी. वह इसे हिंदुस्तान की खासियत के रूप में देखता था.
बाबर को पहले इस फल की गंध कुछ अप्रिय लगी लेकिन जब उसने इसे छील कर खाया तो उसे इसका स्वाद बहुत पसंद आया. (image generated by meta ai)
फिर इस तरह की तारीफ
उसने भारत में आम की कई किस्मों का जिक्र किया. उनकी उपलब्धता की तारीफ की. उसने ये भी कहा कि आम पूरे मौसम में आसानी से मिल जाता है. बाबरनामा में लिखा गया
“आम हिंदुस्तान का एक ऐसा फल है जो पहले देखने और सूंघने में अजीब लगता है, लेकिन जब आप इसे खाते हैं, तो इसका स्वाद आपको बार-बार खाने को मजबूर करता है.”
उसने इसे भारत की पहचान माना
बाबर को भारत की गर्मी और कुछ अन्य चीजें पसंद नहीं थीं, लेकिन आम जैसी चीजों ने उसे यहां की संभावनाओं से जोड़ा. उसने आम को न केवल एक फल के रूप में, बल्कि भारत की पहचान के एक हिस्से के रूप में देखा. यह भी संभव है कि आम ने उसे अपने शासनकाल में बागवानी और फल उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए प्रेरित किया, क्योंकि वह बगीचों का शौकीन था.
और क्या पसंद आया
भारत में उगने वाले केला और अनार भी उसे पसंद आए. हालांकि वह मध्य एशिया के तरबूज और खरबूजे की तुलना में इन्हें कमतर मानता था. बाबर को भारत की नदियां और पानी की प्रचुरता बहुत पसंद थी. उसने लिखा कि हिंदुस्तान में पानी की कोई कमी नहीं है.
मानसून बहुत आकर्षक लगा
बाबर शिकार का शौकीन था. भारत में जंगली जानवरों की विविधता (हाथी, गैंडा, मोर आदि) उसे बहुत भायी. उसने इनका जिक्र भी अपनी आत्मकथा बाबरनामा में किया. उसे मोर की सुंदरता और आवाज खास तौर पर पसंद थी. उसे बारिश का मौसम (मानसून) आकर्षक लगा. उसने लिखा कि बारिश के बाद हरियाली देखने लायक होती है.
भारत में सोने चांदी की कमी नहीं थी
बाबर ने भारत की संपदा की तारीफ की. उसने लिखा कि हिंदुस्तान में सोने और चांदी की कोई कमी नहीं, जो उसे आर्थिक रूप से आकर्षक लगा. उसने ऐसी जगह माना, जहां वह अपनी सत्ता और सांस्कृतिक छाप छोड़ सकता था।
बाबर के समकालीन लेखकों ने बताया कि उसे भारत में बागवानी और वास्तुकला के लिए प्रेरणा मिली. उसने फारसी शैली के बगीचों को भारत में शुरू किया, जो बाद में मुगल वास्तुकला का हिस्सा बने.
दूसरे मुगल बादशाहों को भी पसंद थे आम
अकबर ने दरभंगा (बिहार) में 100,000 आम के पेड़ों का एक बाग लगवाया था. उन्होंने ‘आईन-ए-अकबरी’ में आम के गुणों का विस्तार से वर्णन किया है. शाहजहां को आम इतने पसंद थे कि उन्होंने आम की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए विशेष व्यवस्था की थी. औरंगजेब को भी आम बहुत पसंद थे. इतिहासकारों के मुताबिक आम के सीजन में औरंगजेब सैकड़ों-हजारों किलोमीटर दूर से आम का फल मंगवाता था. आम के प्रति औरंगजेब का लगाव इतना ज्यादा था कि आम की कुछ किस्मों का नाम भी उसी ने रखा था.

